जहां सांडों की लड़ाई पर टिकी है सियासत !

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'हमारे यहाँ सांडों की लड़ाई का रिवाज़ 2000 वर्ष पुराना है और ये परंपरा हमारे दिलों के करीब है.'

मदुरई के रंजीथ मणि के पास तीन सांड हैं जो ख़ास तौर से तमिलनाडु के पारंपरिक त्योहार पोंगल के दौरान सांडों को काबू करने वाले जल्लीकट्टू खेल में भाग लेते थे.

पिछले दो वर्षों से रंजीथ के सांड खाली बैठे रहते हैं क्योंकि जनवरी, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर पाबंदी लगा दी थी. इस बीच रंजीत के तीनों सांडों के खाने और रख-रखाव पर महीने का कुल खर्च आता है 25,000 रुपए.

उन्होंने कहा, "हम लोगों की भावनाएं इस खेल से जुडी हैं और अब तो लगता है कि राजनीतिक दल सिर्फ़ चुनाव की वजह से ही वादे करते हैं."

तमिलनाडु में विधान सभा चुनाव का दौर है और सभी राजनीतिक दल जल्लीकट्टू का खेल दोबारा शुरू कराने की मुहिम चलाने के नाम पर मतदताओं के पास गए हैं.

सत्ताधारी एआईएडीएमके, विपक्षी डीएमके और भाजपा तक ने अपने घोषणा पत्र में जल्लीकट्टू खेल शुरू कराने की क़ानूनी लड़ाई जारी रखने का वादा किया है.

तमिलनाडु में जल्लीकट्टू पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पिछले दो साल से पाबंदी थी क्योंकि कई संगठनों ने खेल के दौरान जानवरों पर होने वाले कथित अत्याचार पर एतराज़ करते हुए अदालत में गुहार लगाई थी.

2016 में आठ जनवरी को नरेंद्र मोदी सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए कुछ नियमों के साथ इस खेल पर लगी सालों की पाबंदी हटा दी थी.

इस अधिसूचना के ख़िलाफ़ भारत पशु कल्याण समिति, 'पीपुल फ़ॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ़ एनिमल्स (पेटा)' और बेंगलुरु की एक ग़ैर-सरकारी संस्था की ओर से याचिका दायर की गई थी.

तमिलनाडु के कम से कम 10 जिलों में भावनाओं के साथ-साथ जल्लीकट्टू से जुड़े व्यवसाय पर भी असर दिखता है. जल्लीकट्टू में भाग लेने वाले पांच सांडों के मालिक मुदकथन मनी इनके प्रोफेशनल ट्रेनर भी हैं.

उन्होंने कहा, "मेरी तो रोज़ी थी दर्जनों सांडों को साल भर तक ट्रेन करना. अब मेरे सांड भी बेकार बैठे हैं और कोई और मुझसे अपने खाली बैठे सांडों को ट्रेन भी नहीं करवाता. हर वर्ष पोंगल त्योहार में दुनिया भर से विदेशी आते थे, लेकिन इससे जुड़ी अर्थव्यवस्था भी इस प्रतिबंध के चलते ठप पड़ गई है."

मदुरई जिले में पलामेडु और अलंगनल्लुर गांवों में होने वाला जल्लीकट्टू काफ़ी लोकप्रिय रहा है और यहाँ सालाना सांडों की इस दौड़ में क़रीब 600 सांड भाग लेते थे.

इस खेले को देखने करीब दो से तीन लाख लोग भी पहुँचते थे और इलाके में कारोबार इसी पर टिका था.

हालांकि तामिलनाडु में जानकारों का मानना है कि सांडों के इस पारम्परिक खेल पर राजनीति ज़्यादा हो रही है और हर दल इसके ज़रिए प्रदेश की धरोहर को बचाने का वादा कर रहा है.

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