मोदी लगा पाएंगे दक्षिण में सेंध?

पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के बीच जो सवाल कई लोगों के मन में बार बार उठ रहे हैं वो यह कि क्या भाजपा देश के दक्षिणी राज्यों- ख़ासकर तमिलनाडु और केरल में कोई नया विकल्प बना पाएगी.

भाजपा ने दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारी बहुमत हासिल की थी. लेकिन इस दौरान भले ही उत्तर भारत में भाजपा की जीत की लहर दिखी लेकिन यह दक्षिण के राज्यों में आते-आते सिमट गई.

और ऐसा तब हुआ जब कर्नाटक में भाजपा ने उल्लेखनीय जीत हासिल करते हुए 2008 के चुनाव में पहली बार अपनी सरकार बनाई थी. लेकिन कर्नाटक में भाजपा का शासन काफ़ी विवादित रहा और वह 2013 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से हार गई.

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जानकारों के मुताबिक़ दक्षिणी राज्यों में अपने पांव पसारने के लिए भाजपा ने महीनों लंबी रणनीति पर काम किया है. लेकिन इसके बावजूद दक्षिण के दो बेहद महत्वपूर्ण राज्यों तमिलनाडु और केरल के मौजूदा चुनाव में भाजपा के लिए कोई ख़ास उम्मीद नजर नहीं आ रही.

कारणों का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है.

पहली बात तो ये कि भाजपा तमिलनाडु में किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं कर सकी. वह क्षेत्रीय स्तर पर असर रखने वाले कुछ छोटे दलों के साथ चुनाव लड़ रही है.

दूसरी ओर एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता ने भी, जिन्हें कई लोग भाजपा का स्वाभाविक सहयोगी मानते रहे हैं, भाजपा के प्रति उदासीन रवैया दिखाया. भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए उन्हें लुभाने की कोशश की थी.

नतीजा ये हुआ कि भाजपा 165 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. बाक़ी सीटों को भाजपा ने अपने छोटे गठबंधन दलों के लिए छोड़ दिया है.

मतदान आज संपन्न हो रहे हैं. इसके साथ ही जीत-हार का आकलन शुरू हो गया है.

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भाजपा की जीत के बारे में जो क़यास लगाए जा रहे हैं, जिन्हें सबसे सकारात्मक कहा जा सकता है, वो ये कि तमिलनाडु में उन्हें 10 सीटें भी नहीं मिलेंगी. इसके जीतने की सबसे अधिक संभावना कन्याकुमारी, कोयंबटूर की कुछ सीट और संभवतः तनजावुर ज़िले की सीट पर जताई जा रही है.

तमिलनाडु में भाजपा को कम सीटों के मिलने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं इसका अंदाज़ा लगाना बहुत आसान है.

यह एक ऐसा राज्य है जहां की राजनीति में पिछले 50 सालों से द्रविड़ विचारधारा का बोलबाला रहा है.

भाजपा को यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस से निकली, हिंदू, उच्च वर्ग, उत्तर भारत समर्थक और अल्पसंख्यक विरोधी पार्टी के रूप में देखा जाता है.

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पिछले दो दशक से भाजपा तमिलनाडु में अपनी सियासी इमारत की नींव रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी तक उसके हाथ लोकसभा की कुछ सीटें ही आईं हैं.

इधर कम्युनिस्ट प्रभाव वाले केरल में भी भाजपा का हाल कुछ अलग नहीं दिखाई दे रहा. हालांकि भाजपा को यहां तमिलनाडु की तुलना में बेहतर नतीजों की उम्मीद है.

केरल में मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ़ और वामपंथी गुट एलडीएफ़ के बीच है.

भाजपा उनका खेल बिगाड़ना चाहती है. इसके लिए उसने यहां मुख्य सहयोगी पार्टी एसएनडीपी और भारत धर्म जन सेना (बीडीजेएस) के साथ गठबंधन किया है.

केरल की राजनीति के विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत रघुवमशम ने बीबीसी को बताया कि गठबंधन बनाने के पीछे भाजपा का उद्देश्य हिंदुओं की अगड़ी जाति और एज़ावा (ताड़ी निकालने वालों का समुदाय) जिनके हितों का प्रतिनिधित्व बीडीजेएस करता है, के वोट बैंक में सेंध लगाना है.

प्रशांत का कहना है कि भाजपा की यह रणनीति उसके वोटों की गिनती बढ़ाने में शायद कुछ काम आए लेकिन इससे कुछ ख़ास फ़ायदा होगा, ऐसा दिखाई नहीं देता.

वे कहते हैं, "भाजपा के लिए सबसे अच्छी स्थिति ये रहेगी कि वह कम से कम कुछ सीटें जीते और केरल विधानसभा में अपना खाता खोले."

और ऐसा संभव है, क्योंकि भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट पर कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी थी. तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस नेता शशि थरूर बस थोड़े से अंतर से भाजपा के राजगोपाल से जीते थे.

भाजपा को ऐसी ही कुछ मामूली सफलताओं से संतुष्ट होना पड़ेगा. और बेहतर होगा कि वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भावी चुनौतियों पर नज़र रखे.

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