तमिलनाडु में जया की जीत के मायने?

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चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 16 मई को आए चुनावी नतीजे अनुमान के मुताबिक ही रहे.

असम, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में सर्वेक्षकों के अनुमान लगभग सही रहे. लेकिन तमिलनाडु के नतीजे अप्रत्याशित रहे. वहां ज़्यादातर एक्ज़िट पोल ग़लत साबित हुए.

पांच में से चार एक्ज़िट पोल में कहा गया था कि मतदाताओं का रुझान डीएमके की तरफ़ है जबकि केवल एक एक्जिट पोल में अनुमान लगाया गया था कि एआईएडीएमके चुनाव जीतेगी.

बहरहाल छह कोणीय चुनाव में जयललिता की एआईएडीएमके ने वह कर दिखाया जो 1984 से अब तक कोई पार्टी नहीं कर पाई, और वो है लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटना.

1984 में जयललिता के मेंटॉर और एआईएडीएमके के संस्थापक रहे एमजी रामचंद्रन ने यह करिश्मा दिखाया था. अभिनेता से राजनेता बने एमजीआर तब शिकागो के अस्पताल से अपना चुनाव लड़ रहे थे.

उसके बाद से तमिल लोग हर पांच साल बाद सरकार बदलते रहे हैं. बहरहाल इस बार ऐसा क्या हुआ कि जयललिता ने इस ट्रेंड को बदल दिया?

विधानसभा चुनाव से पहले जयललिता सरकार के ख़िलाफ़ नाराजगी थी. चेन्नई और दूसरे उत्तरी ज़िलों में दिसंबर में आई बाढ़ के दौरान जिस तरह का कुप्रबंधन दिखा था, उसने नाराजगी को बढ़ाया था.

इस भयानक विपदा में जयललिता इस तरह दिखीं जैसे उन तक पहुंचना संभव नहीं है और उन्हें लोगों की दुर्दशा की कोई चिंता नहीं है.

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इसके अलावा राज्य द्वारा संचालित शराब की दुकानों को लेकर भी रोष था जिसके चलते विजयकांत के नेतृत्व वाली डीएमडीके, विदुथालाई सिरुथाईगल और वामपंथी दलों ने राज्य में शराबबंदी की मांग की थी.

लेकिन इन सबका जयललिता पर कोई असर नहीं पड़ा. उन्होंने चुनाव में अकेले उतरने का फ़ैसला लिया. बीजेपी और तमिल मनीला कांग्रेस के साथ गठबंधन का रास्ता नहीं चुना.

दूसरी तरफ उनके विरोधी एम करुणानिधि का भरोसा उतना मज़बूत नहीं दिखा. वे ज़्यादा सजग होकर गठबंधन बनाने में जुट गए. उन्होंने उसी कांग्रेस से हाथ मिलाया जिसके साथ 2013 में उन्होंने 2जी और अन्य मुद्दों पर संबंध तोड़ लिया था.

करुणानिधि ने इसके बाद विजयकांत को भी मिलाने की कोशिश की.

लेकिन विजयकांत ने तीसरा मोर्चा बनाया और इसने जयललिता की राह आसान कर दी. तीसरे मोर्चे ने जयललिता विरोधी मतों में सेंध लगाई और इसका फ़ायदा जयललिता को ही हुआ.

तीसरे मोर्चे को छह प्रतिशत से ज़्यादा वोट मिले. एआईएडीएमके और डीएमके के बीच मतों का अंतर करीब 1.1 प्रतिशत रहा. करुणानिधि ने शनिवार को इस मामूली अंतर की ओर संकेत किया.

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चुनावी आंकड़े ये भी बताते हैं कि एआईएडीएमके से डीएमके को ज़्यादा वोट मिले. डीएमके के सहयोगियों को एआईएडीएमके की तुलना में कम वोट मिले. यह दरअसल आंकड़ों का खेल है, लेकिन चुनाव में सबसे अहम यही होता है कि जीता कौन.

बहरहाल अब सबकी दिलचस्पी इस बात में है कि पांच साल के बाद क्या होगा?

दोनों द्रविड़ पार्टियां के मुखिया उम्रदराज हो रहे हैं. करुणानिधि के बाद डीएमके में पार्टी की कमान उनके बेटे एमके स्टालिन के हाथों में जाएगी, जो डीएमके की राजनीति को बीते 35 सालों से नज़दीक से देख रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि स्टालिन में करुणानिधि जितनी चतुराई नहीं है लेकिन उन्होंने मिडिल क्लास के बीच में सौम्य राजनेता की अपनी छवि विकसित कर ली है. उन्हें अधिकांश पार्टी कैडरों का समर्थन हासिल है, इसलिए उन्हें विरासत संभालने में बहुत मुश्किल नहीं होगी.

हालांकि वे राजनीतिक चुनौतियों को किस तरह से संभालते हैं, ये देखने की बात होगी.

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एआईएडीएमके में जयललिता के बाद की तस्वीर साफ़ नहीं है. एमजीआर के समय में भी पार्टी वन मैन शो की तरह थी लेकिन तब उनके साथ वरिष्ठ नेता वीआर नेदुनचेजियान, एसडी सोमसुंदरम और पनरुती रामाचंद्रन जैसे लोग कैबिनेट में शामिल थे.

उनके मंत्रिमंडल के एक सहयोगी ए थिरुनावुकारासु ने एक बार कहा था, "एआईएडीएमके में सभी मंत्री ज़ीरो हैं और एमजीआर नंबर एक हैं. उन्होंने ये भी कहा था, “ज़ीरो का मूल्य तभी होता है जब उसके आगे एक लगा हो."

जयललिता के नेतृत्व में एआईएडीएमके कहीं ज़्यादा एक ही पर्सनाल्टी के इर्द गिर्द घूमने वाली पार्टी बन गई है और राज्य में अम्मा ब्रांड का जलवा है. वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक तौर पर जयललिता के सामने साष्टांग दंडवत होना पड़ता है.

पिछले शासन के दौरान जयललिता ने कितनी बार अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल किया था, पत्रकार इसकी गिनती भूल चुके होंगे. मंत्रियों को जब तब बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है और हटाने की वजह कभी सार्वजनिक नहीं हो पाती.

इस तरह से कामकाज करने पर पार्टी के अंदर दूसरी पंक्ति के नेता नहीं उभर पाते. ऐसे में कइयों को ये आशंका होती रहती है कि जयललिता की ग़ैरमौजूदगी में पार्टी बिखर तो नहीं जाएगी?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक वानियार समुदाय समर्थित पीएमके और दलित पार्टी विदुथालाई सिरुथाइगल काटची (वीसीके) जैसी पार्टियां एक नए तरह का संकेत है, ख़ास तौर पर ईवी रामासामी पेरियार जैसे समाज सुधारक के राज्य में जो जाति विरोधी राजनीति के लिए जाना जाता रहा है.

अगले साल द्रविड़ क्षेत्रवाद को राज्य में आए 50 साल पूरे होने वाले हैं. अब देखना है कि द्रविड़ पार्टियों के पतन के बाद राज्य में राष्ट्रीय पार्टियां जगह बनाती हैं या जाति-समुदाय पर आधारित पार्टियां.

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