कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में कामयाब?

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हाल में अपने एक दोस्त के फेसबुक पन्ने पर पढ़ा, 'राहुल जी का हाथ मोदी जी के साथ.' आगे लिखा था कि किस तरह राहुल गांधी कांग्रेस का नुक़सान कर रहे हैं जिससे भारतीय जनता पार्टी को फ़ायदा हो रहा है.

असम और केरल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का ज़िम्मेदार राहुल गांधी को ठहराया जा रहा है. इन चुनावी नतीजों के बाद सोशल मीडिया पर सक्रिय राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर पारंपरिक मीडिया के कई विशेषज्ञों ने कांग्रेस पार्टी का शोक संदेश लिख डाला. अब इसका केवल जनाज़ा निकलना बाक़ी है.

ऐसा महसूस होता है कि कांग्रेस पार्टी 2014 में लोकसभा चुनाव में भारी शिकस्त से अब तक उभर नहीं पाई है. विपक्षी दल के रूप में इसके दो साल मोदी सरकार के दो साल के साथ पूरे हो रहे हैं. क्या इसने एक मजबूत और प्रभावी विपक्षी दल की भूमिका निभाई है?

कांग्रेस पार्टी पर गहरी नज़र रखने वाले पत्रकार रशीद किदवई के अनुसार कांग्रेस ने मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में भी मायूसी दिखाई है.

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भारतीय सियासत में ये सोच आम है कि विपक्ष के रूप में सभी पार्टियां नकारात्मक भूमिका अदा करती आई हैं. विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने बांग्लादेश के साथ हो रहे सीमा समझौते पर ख़ूब हंगामा किया था. यहाँ तक कि असम में इसके विरोध में हड़ताल भी की थी. लेकिन सत्ता में आने के बाद इसी भाजपा सरकार ने इस समझौते को अमली जामा पहनाया.

अतीत में जाएँ तो प्रधानमंत्री वीपी सिंह जब मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को संसद से पारित कराना चाह रहे थे तो कांग्रेस ने इसका ज़बरदस्त विरोध किया था. इस पर छिड़े आंदोलन को काफी हवा भी दी थी. लेकिन 1991 में जब कांग्रेस सत्ता में लौटी तो उसने इन सिफ़ारिशों को संसद में आसानी से मंज़ूर करवा लिया.

संसद के पिछले कुछ सत्रों में राज्यसभा में जीएसटी बिल पर कांग्रेस ने इतना हंगामा किया कि भाजपा सरकार इसे अब तक पारित नहीं करा सकी है. भाजपा ये बात नहीं भूली होगी कि जब कांग्रेस सत्ता में थी और बिल का मसौदा तैयार किया गया था तो उसने इसका काफ़ी विरोध किया था.

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पिछले दो सालों में कांग्रेस पार्टी संसद के अंदर वही कर रही है जो भाजपा ने विपक्ष में रह कर किया था - यानी सरकार के लगभग हर बिल और हर प्रस्ताव का विरोध.

राज्यसभा में भाजपा की संख्या पर्याप्त न होने के कारण और कांग्रेस के पास दबंग तरीक़े से बोलने वाले सांसदों की वजह से मोदी सरकार को काफ़ी दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

कांग्रेस पार्टी राज्यसभा में जितनी दबंग है उतनी लोकसभा में कमज़ोर. अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी के बावजूद लोकसभा में सत्तारूढ़ भाजपा को कोई ख़ास विरोध का सामना नहीं है.

पिछले दो सालों में संसद के बाहर कांग्रेस पार्टी एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में बेहद कमज़ोर दिखाई दी. हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्रियों पर उठे सवाल पर कांग्रेस जिस तरह से ख़ामोश तमाशायी बनी रही उसे आम लोगों ने भी महसूस किया.

रशीद किदवई कहते हैं कांग्रेस की चुप्पी का कारण था उसका ये डर कि कहीं मुंह खोला तो भाजपा सोनिया और राहुल गांधी की शैक्षणिक योग्यता पर पलट वार न कर दे.

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माँ-बेटे की शैक्षणिक योग्यता पर पहले सवाल उठाये जा चुके हैं. इस मुद्दे पर उनका ख़ामोश रहना ही बेहतर था. विपक्ष की भूमिका बख़ूबी निभा रहे थे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जिन्होंने इस मुद्दे पर ख़ासा हंगामा किया.

दरअसल कुछ लोग ये कहने लगे हैं कि संसद के बाहर केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी की जितनी नाक रगड़ी है उतनी किसी विपक्षी दल ने नहीं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि 1885 में जन्म लेने वाली कांग्रेस पार्टी अपने अस्तित्व की समस्या से जूझ रही है. रशीद किदवई के विचार में भाजपा एक ठोस विचार धारा लेकर चल रही है जिसमें उसे कामयाबी मिली है.

इस हिंदुत्व विचार धारा का काट कांग्रेस निकाल नहीं सकी है. कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की अपनी विचार धारा पर डटे रहने में कमज़ोरी दिखाई है.

पिछले दो सालों में भाजपा और हिंदुत्व परिवार के कई नेताओं ने घर वापसी से लेकर गोहत्या तक, विपक्ष को उभरने के कई अवसर दिए लेकिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां इसका फायदा नहीं उठा सकीं.

किसानों की आत्महत्या से लेकर सूखे के मुद्दे सामने आये हैं जिन्हें विपक्ष सत्तारूढ़ दल के खिलाफ इस्तेमाल कर सकती थी लेकिन विपक्ष ने ये मौक़ा भी गँवा दिया है.

कांग्रेस ने दो साल पहले दिल्ली में किसानों की एक विशाल सभा कराई थी लेकिन उसे बनाये रखने में विफल रही.

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दूसरी तरफ गांधी परिवार जहाँ पार्टी की ताक़त है वहीँ ये इसके गले की हड्डी भी बनी हुई है.

रशीद किदवई गांधी परिवार को नज़दीक से जानते हैं. वो कहते हैं कि गांधी परिवार कमज़ोर नहीं है. सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द वरिष्ठ नेता पार्टी की सबसे बड़ी समस्या बने हुए हैं.

ये नेता राहुल गांधी के अध्यक्ष बनाये जाने के खिलाफ हैं क्यूंकि उन्हें डर है कि राहुल के हाथ में कमान आने के बाद उनका पत्ता कट जाएगा.

राहुल गांधी 2014 के चुनाव के पहले ही पार्टी में तालुका स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी यूनिट में चुनाव कराना चाहते थे.

वो युवा नेताओं को आगे बढ़ाना चाहते हैं. सोनिया गांधी के निकट डटे हुए कांग्रेसी नेता राहुल के नेतृत्व पर भरोसा नहीं करते.

सोशल मीडिया पर जिस तरह से राहुल की खिल्ली उड़ाई जाती है, उनके मुताबिक, उससे पार्टी को नुक़सान हो रहा है और राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी की साख़ और भी कमज़ोर हो सकती है.

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लेकिन राहुल के समर्थक ये मानते हैं कि उनके साथ जुड़े युवा नेताओं के आगे आने से पार्टी की तक़दीर एक बार फिर बदल सकती है.

पार्टी में मौजूदा संकट इसके लम्बे इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा संकट हो सकता है लेकिन पार्टी पिछले 50 सालों में कई संकट का सामना कर चुकी है.

इसके टुकड़े भी हुए हैं. करारी हार के बाद ये विपक्ष में बैठ भी चुकी है. इमरजेंसी के बाद 1977 में इसे बुरी हार का सामना करना पड़ा था. तब ये स्वतंत्र भारत में पहली बार विपक्ष की भूमिका में आई.

इसके बाद 1989 में भी इसे विपक्ष में बैठना पड़ा. इन दोनों संकट के बाद पार्टी ने अगला चुनाव जीता और संकट टली.

इंदिरा गांधी के समय से अक्सर पार्टी की किस्मत गांधी परिवार की किस्मत से जुडी रही थी.

साल 1991 से 1998 तक नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी की अध्यक्षता में गांधी परिवार का भविष्य अंधकार में नज़र आ रहा था.

खुद कांग्रेस पार्टी चुनाव में हार के बाद संकट में थी. इसके बाद सोनिया गांधी ने 1998 में पार्टी की कमान संभाली और 2004 में उनके नेतृत्व में पार्टी सत्ता में वापस आई.

वो पिछले 18 वर्ष से पार्टी की अध्यक्ष हैं और कांग्रेस के इतिहास में इतने लम्बे समय तक अध्यक्ष कोई और नहीं रहा है.

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रशीद किदवई कहते हैं कि वो चाहती हैं कि अध्यक्षता राहुल को मिले लेकिन ऐसा अब तक संभव नहीं हो सका है.

कुछ पार्टी कार्यकर्ता राहुल की बहन प्रियंका को सामने लाना चाहते हैं. अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाला है.

भारतीय मीडिया के अनुसार इस बार प्रियंका को सामने लाने का सुझाव पार्टी की यूपी में रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने दिया है.

ये कहना मुश्किल है कि प्रियंका के सियासी अखाड़े में कूदने से पार्टी को कितना फायदा होगा. हां, कार्यकर्ताओं का मनोबल ज़रूर बढ़ेगा. वो बदलाव चाहते हैं. किसी चमत्कार के इंतज़ार में हैं.

असम और केरल में हार के बाद सोनिया गांधी के एक मात्र बयान से किसी बदलाव के संकेत नहीं मिलते. अगर यथास्थिति बनी रही तो मोदी सरकार के बचे तीन साल भी आसानी से बीत जाएंगे.

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