हमारे हुक्मरान बेवक़ूफ़ बना रहे हैं: पाक मीडिया

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अफ़ग़ान तालिबान के नेता मुल्ला अख़्तर मंसूर को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तान में किए गए ड्रोन हमले पर वहां के उर्दू मीडिया में काफ़ी नाराज़गी है.

इस बारे में विरोध जताने के लिए सेना प्रमुख की अमरीकी राजदूत से मुलाक़ात को सभी प्रमुख अख़बारों ने ख़ासी तवज्जो दी है.

'जंग' ने आर्मी 'चीफ़ का दो टूक पैग़ाम' शीर्षक से लिखा है कि जनरल राहील शरीफ़ ने अमरीकी ड्रोन हमले पर गहरी चिंता जताई और ऐसी कार्रवाइयों को पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन और दोतरफ़ा रिश्तों के लिए नुक़सानदेह बताया.

अख़बार के मुताबिक़ अमरीकी राजदूत से साफ़ कहा गया कि अमरीकी ड्रोन हमले क्षेत्रीय स्थिरता और अफ़ग़ानिस्तान में शांति क़ायम करने की कोशिशों में मददगार साबित नहीं होंगे.

लेकिन ‘नवा-ए-वक़्त’ ने पाकिस्तान के इस विरोध को खोखली क़वायद कहा है.

अख़बार कहता है कि ये हमले पूर्व सैन्य तानाशाह जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ और पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के बीच हुए समझौते के तहत होते रहे हैं और अब भी हो रहे हैं तो पाकिस्तान का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व किस आधार पर इनका रस्मी या बाक़ायदा विरोध कर रहा है.

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अख़बार के मुताबिक़ इस विरोध के ज़रिए किसे बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा है, जबकि अमरीकी रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर ने कहा है कि अमरीका के लिए ख़तरा बनने वाले हर नेटवर्क को ख़त्म किया जाएगा.

अख़बार सवाल करता है कि क्यों अब तक ड्रोन हमलों की इजाज़त देने वाला समझौता रद्द नहीं किया गया है और पाकिस्तान क्यों अमरीका का फ़्रंट लाइन सहयोगी बना हुआ है.

‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि पाकिस्तानी इलाक़े में मुल्ला मंसूर की मौत से पाकिस्तान के लिए न सिर्फ़ आंतरिक, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सतह पर नई मुश्किलें और पेचीदगियां पैदा होंगी.

अख़बार लिखता है कि अगर अमरीका और अफ़ग़ान सरकार असल मायनों में अफ़ग़ानिस्तान में अमन चाहते हैं, तो उन्हें ताक़त के इस्तेमाल से गुरेज़ करते हुए बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए, क्योंकि ये साफ़ हो चुका है कि ताक़त के इस्तेमाल के बावज़ूद अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता नहीं आई है.

उधर ‘दुनिया’ ने लिखा है पाकिस्तानी सरकार ने राष्ट्रीय पहचान पत्र कार्डों की दोबारा वेरिफ़िकिशन करने के लिए 48 घंटों में योजना तैयार करने का आदेश दिया है.

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अख़बार लिखता है कि अमरीकी ड्रोन हमले में मुल्ला मंसूर की जिस गाड़ी को निशाना बनाया, उसके पास से फ़र्ज़ी पाकिस्तानी पहचान पत्र और पासपोर्ट बरामद होने के बाद ये फ़ैसला किया गया है.

अख़बार के अनुसार ऐसे लोगों ने भी पाकिस्तानी पहचान पत्र बनवा रखे हैं, जो पाकिस्तान के नागरिक नहीं है और इनमें अफ़ग़ान शरणार्थी सर-ए-फ़हरिस्त हैं.

अख़बार लिखता है कि जिन विदेशियों के पहचान पत्र रद्द किए जाएं, उनकी वो संपत्ति भी ज़ब्त की जाए, जो फ़र्ज़ी पहचान पत्र के आधार पर ख़रीदी गई हैं.

'औसाफ़' ने अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के इस बयान की आलोचना की है कि अफ़ग़ान तालिबान के नए नेता मौलवी हैबतुल्ला अखुंज़ादा या तो जंग को ख़त्म करें या फिर गंभीर नतीजे भुगतने को तैयार रहें.

अख़बार ने लिखा है कि ऐसे नकारात्मक बयानों से तालिबान भड़केंगे और इसलिए इनसे परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि धौंस और धमकियों से शांति क़ायम नहीं हो सकती है.

रुख़ भारत का करें तो केंद्र की मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ लिखता है कि ये बड़ी दिलचस्प बात है कि मोदी सरकार की उपलब्धियों को बताने के लिए सत्ताधारी पार्टी को प्रचार मुहिम का सहारा लेना पड़ रहा है.

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अख़बार लिखता है कि अच्छे दिनों का अहसास तो जनता को ख़ुद ब ख़ुद होना चाहिए था.

अख़बार कहता है कि आम लोगों के लिए तो यही बेहतर रहेगा कि वो दर्शक बनकर तमाशा देंखे कि सत्ताधारी पार्टी किस तरह जनता का भला होने की बात कर रही और विपक्षी पार्टियां कैसे इन दावों में छेद कर रही हैं.

वहीं ‘हमारा समाज’ की टिप्पणी है कि भाजपा के दावों से इतर, जनता की नज़रें अगले तीन साल में इसी बात पर लगी रहेंगी कि पार्टी अपने घोषणापत्र में किए विकास और जनता के कल्याण के वादों को किस तरह पूरा करती है.

अख़बार के मुताबिक़ अगर सरकार अपने लक्ष्य पूरा करने में नाकाम रही तो कहना मुश्किल है कि 2019 के चुनावों में उसके सिर फिर सत्ता का ताज सजेगा.

वहीं रोज़नामा ‘खबरें’ ने हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति और उसकी रणनीति पर सवाल उठाए हैं.

अख़बार कहता है कि अगर कांग्रेस मान रही है कि मोदी सरकार की ग़लतियों को पेश करके वो जनता के बीच फिर से अपनी जगह बना लेगी, तो ये एक बड़ी भूल होगी.

अख़बार कहता है कि पार्टी और जनता के स्तर पर कांग्रेस को मज़बूत बनाना होगा, तभी वो अपना खोया आधार पा सकती और ये तभी होगा जब वो ईमानदारी से आत्मचिंतन करे.

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