चंदू को अब कुआं देखकर डर लगता है..

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बीड ज़िले के विडा गांव के चंदू महादेव केंगार को अब कुआं देखकर सिहरन होती है. अप्रैल की 21 तारीख थी, जब वह अपने 10 साल के भाई सचिन के साथ कुएं पर पानी लाने गए थे.

न जाने क्या हुआ कि चिकने पत्थर से सचिन का पैर फिसला और वह कुएं में गिर गया.

चंदू ने काफ़ी कोशिश की, पर वे सचिन को निकालने में नाकाम रहे. 14 साल के चंदू ने आसपास के लोगों को आवाज़ें दीं पर कोई नहीं आया.

तब वह आधा किलोमीटर दौड़कर घर पहुँचे और मामा को लेकर वापस आए, जिन्होंने सचिन को कुएं से निकाला. मगर तब तक सचिन की मौत हो चुकी थी.

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Image caption चंदू अपनी मां और भाई-बहन के साथ.

चंदू की मां आशाबाई बेहद ग़रीब हैं और पति से अलग रहती हैं. सचिन के जाने के बाद अब वह ख़ुद चंदू के साथ पानी लेने कुएं पर जाती हैं. उसी कुएँ पर जहां उनके छोटे बेटे की मौत हो गई थी.

इस कुएं के अलावा कहीं और से पानी हासिल करने का रास्ता नहीं है. बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं, रोज़ चंदू और आशाबाई को इस कुएं के दो-तीन चक्कर लगाने पड़ते हैं. आशाबाई कहती हैं कि चंदू जब-जब पानी लेकर लौटता है तो परेशान हो जाता. रात को वह कई बार नींद में डरकर उठ जाता है.

हालांकि सचिन की मौत के बाद से मराठवाड़ा के इस गांव में टैंकर दिखने लगा है, पर 8-10 दिनों में एक बार आता है. इससे गांव की प्यास नहीं बुझ पाती. लोगों को कुएं से पानी लाना ही पड़ता है.

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Image caption इस कुंए में गिरकर हुई थी सचिन की मौत.

पानी लाने वालों में ज़्यादातर बच्चे होते हैं. सातवीं के छात्र और 13 साल के शुभम विकास पटोले भी उसी कुएं से पानी लाते हैं, जहाँ सचिन की मौत हुई थी. हमारे सवाल पर वह कहते हैं, ‘‘डर तो लगता है,लेकिन पानी लाना ज़रूरी है. मेरे गाँव के सौ से ज़्यादा बच्चे पानी लाने जाते हैं.’’

मगर 40 से 60 फ़ीट गहरे कुएं में उतरकर बच्चों को पानी भरते देखना ख़ौफ़नाक अनुभव है. मगर छठी क्लास की शेख निहारयार के लिए यह मामूली बात है.

वह प्लास्टिक के डिब्बों में पानी भर रही अपनी मम्मी की मदद कर रही हैं, ताकि पानी ऊपर पहुँचा सकें. इतने गहरे कुएं में उतरते हुए क्या निहार को डर नहीं लगता? वो जवाब में कहती हैं-‘‘हाँ लगता है, मगर मैं अम्मी के साथ आती हूँ.’’

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यह कुआं सूखे से जूझ रहे उस्मानाबाद के क़रीब औसा में एक क़िले के पास है, जिसकी देखभाल पुरातत्व विभाग के पास है.

सुबह और शाम रोज़ बड़ी तादाद में आसपास की महिलाएं इस कुएं में उतरती हैं. यहां टैंकर नहीं आते. ज़ाहिर है कि यह कुआं ही अकेला सहारा है.

20 साल के शेख सद्दाम फ़क़ीर हसन कुएं के ऊपरी किनारे से लटके हुए बोअर के पाइप से हंडी भर रहे हैं. वो कहते हैं कि औसा क़िले के पास रहने वालों ने मिलकर पानी सप्लाई कराने की मांग की है, पर अब तक कुछ नहीं हुआ.

दोपहर का वक़्त है. हमने पाया कि सारोला से उस्मानाबाद की सड़क पर 13 साल के अभिजीत जुम्बाडे अपनी 12 साल की बहन अंजलि के साथ साइकिलों पर प्लास्टिक के हंडे टांगकर तेज़ी से जा रहे हैं. नल में पानी नहीं है और टैंकर भी नहीं आया. इसलिए कुएं से पानी लाना ज़रूरी हो गया है.

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कुछ दूर मौजूद शिंदी गांव के 18 वर्षीय नागेश जाधव 12वीं तक पढ़े हैं और 15 साल के मयूर शिंदे ने 10वीं की परीक्षा दी है. दोनों पास के एक रेस्टोरेंट में काम करने लगे हैं, इसलिए घरवाले उन्हें कुएं से पानी लाने को नहीं कहते.

नागेश रसोइये का काम सीख रहा है और मयूर को वेटर का. महीने में कुछ हज़ार रुपए मिल जाते हैं.

ख़बरें तो ये भी हैं कि इस साल अप्रैल और मई के महीनों में सूखाग्रस्त मराठवाड़ा में पानी भरते समय कुएं में गिरकर कम से कम दो बच्चों की मौत हुई है, जबकि एक लड़की की मौत सनस्ट्रोक से हुई. बताया जाता है कि भरी दोपहर में उसे कुएं के पांच बार चक्कर मारने पड़े थे.

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