उन्हें तो ख़ुदकुशी में जवाब मिल गया, पत्नी को नहीं

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अगर आपको महाराष्ट्र के बीड़ ज़िले की दलित किसान सिंधुबाई इंगले से मिलने का मौक़ा मिले तो शायद आप उनके चेहरे पर लाचारी और दुख के सिवा कुछ नहीं पढ़ पाएंगे.

वाघाला गांव में रहने वाली सिंधुबाई के पति परमेश्वर इंगले अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनके सिर पर बैंक के 25 हज़ार रुपए और गांव के लोगों से लिया गया 80 हज़ार रुपए का क़र्ज़ था.

पैसा कैसे चुकाएं? वह लगातार इस उधेड़बुन में थे. परमेश्वर को इस सवाल का जवाब मिला– आत्महत्या में.

इस साल 16 मई के दिन वे अपने खेत में गए और उन्होंने ज़हर पी लिया. लोग उन्हें अस्पताल ले गए, पर अगले ही दिन वह दुनिया से विदा हो गए.

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परमेश्वर को तो जवाब मिल गया, लेकिन वह 42 साल की अपनी पत्नी के आगे कई सवाल छोड़ गए हैं.

सिंधुबाई का बड़ा बेटा बीकॉम में है, छोटा 12वीं कर रहा है. बेटी का तलाक़ हो चुका है और वह घर आ रही है.

सिंधुबाई चाहती हैं कि किसी तरह उनके 24 साल के बड़े बेटे सुशील को सरकारी नौकरी मिल जाए. शायद तब घर के दिन सुधर जाएं. फ़िलहाल तीनों बच्चों की देखभाल उन्हें ही करनी है.

गांव के लोग कहते हैं कि अगर सिंधुबाई के परिवार को कोई मदद न मिली तो उन्हें पूरी खेती बेचनी पड़ेगी, जिसे औने-पौने दाम पर ख़रीदने वालों की कमी नहीं. मगर ये पैसा भी उनका जीवन नहीं चला पाएगा.

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अक्षय की कहानी भी सिंधुबाई से अलग नहीं है. उनका इंजीनियरिंग का दूसरा साल है और उनकी बहन का बीकॉम अंतिम वर्ष.

अम्बाजोगाई तहसील के केंद्रेवाडी गांव में अक्षय का परिवार कभी संपन्न परिवार था. इस साल 12 मई को उनके पिता संपतराव ने ज़हर खा लिया और अगले दिन आख़िरी सांस ली.

उनके पिता यह बर्दाश्त नहीं कर पाए कि वो अपने बच्चों की फ़ीस नहीं जुटा पाए थे.

पिता के जाने से बच्चों की चुनौतियां कम नहीं हुईं, बल्कि और बढ़ गईं. पढ़ाई के लिए पैसा जुटाना तो दूर, घर को चलाए रखना भी कम मुश्किलों से भरा नहीं है.

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चाहे दलित हों या सवर्ण, सूखे ने किसी को नहीं बख़्शा. हो सकता है कि इस बार बारिश हो जाए, मगर क्या इससे वो खरोंचें मिट जाएंगी, जो सूखे ने लोगों के मन पर छोड़ दी हैं. मुश्किल ही है.

हाल ही में 'जल हल' पदयात्रा के दौरान स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव यहां पहुँचे. जब उनसे मैंने इस समस्या के बारे में बात की तो उनका कहना था, ‘‘सूखे के बारे में तीन अर्धसत्य फैले हुए हैं. पहला यह कि सूखा यानी सिर्फ़ पानी का संकट. मगर ऐसा नहीं है. इसके साथ खाना, चारा, रोज़गार और शिक्षा का संकट भी खड़ा होता है."

उन्होंने कहा, "दूसरा आधा सच यह मानना है कि सूखे की वजह बारिश न होना है. यह तात्कालिक कारण है, पर इस भयावह स्थिति की बुनियाद है पिछले 50 साल से पानी के बुरे प्रबंधन का संकट. तीसरा आधा सच यह है कि बारिश के आने से यह संकट ख़त्म हो जाएगा, लेकिन बारिश आने के बाद भी भोजन संकट ख़त्म न होगा. हम जो आगे के 20 सालों का पानी पी चुके हैं, उसका संकट भी क़ायम रहेगा.’’

योगेंद्र यादव कहते हैं कि असल में हमें जल प्रबंधन सीखना होगा. राज्य सरकार की ओर से पूरे राज्य में अब जलयुक्त शिवार अभियान चल रहा है, जिसका मक़सद है पानी बचाने की योजनाओं को जोड़कर हर साल कम से कम पांच हज़ार गांवों को सूखामुक्त कराना.

इसलिए गांव-गांव में नदी, तालाबों और चौड़ा और गहरा किया जा रहा है. इसके लिए अच्छी बारिश के साथ ही हर काम में ठेकदारों को ईमानदारी से काम करना भी ज़रूरी है. इसके अलावा चारा छावनी भी चलाई जा रही हैं

पदयात्रा में योगेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट का केंद्र और राज्य सरकारों के लिए वह आदेश भी लोगों को सुनाया, जिसमें सूखाग्रस्त इलाक़े के हर व्यक्ति को अनाज देने की बात कही गई है.

हालांकि वो कहते हैं कि महाराष्ट्र में उन्हें अब तक ऐसा होते नहीं दिखा, लेकिन वह चाहते हैं कि हर गांव में पांच लोग इस पर नज़र रखें ताकि अगली तारीख़ पर सुप्रीम कोर्ट के आगे ये बातें रखी जा सकें.

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