बाग को बना दिया 'आज़ाद हिंद सरकार' का मुख्यालय

मथुरा जवाहर बाग इमेज कॉपीरइट AFP

मथुरा में फलदार पेड़ों का सबसे बड़ा एक बाग गुरुवार को उपद्रवियों की हिंसा की वजह से श्मशान में तब्दील हो गया.

पुलिस और उपद्रवियों के बीच हुए टकराव में दो पुलिस अधिकारियों समेत 24 लोग मारे गए और कई अन्य घायल हो गए. हिंसा और आगजनी ने अपने पेड़ों के लिए पूरे शहर में मशहूर इस बाग की सूरत पूरी तरह बदल दी है.

मथुरा के जिला उद्यान अधिकारी मुकेश कुमार मायूसी के साथ बयान करते हैं, "जवाहर बाग उजड़ गया है."

'जवाहर बाग' की गिनती कई दशकों से मथुरा शहर के सबसे बड़े बाग के तौर पर होती है.

देखिए: मथुरा हिंसा की तस्वीरें

इसकी सरहद मथुरा कलेक्ट्रेट परिसर के करीब तहसील भवन से शुरू होती है. इस बाग का नाम भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाम पर है. बाग के बाहर जवाहर लाल नेहरू की एक मूर्ति भी लगी है.

इमेज कॉपीरइट AFP

स्थानीय लोगों का कहना है कि ये बाग ब्रिटिश शासन के दौरान लगाया गया था. इसमें हज़ारों फलदार पेड़ थे, जिनमें से ज्यादातर अब काट दिए गए हैं या फिर सूख गए हैं.

मुकेश कुमार के मुताबिक, "करीब 42.6 हेक्टेयर में फैला ये बाग 1954 से उद्यान विभाग के पास है. इसमें आम, अमरूद, बेल, बेर और मौसमी के हज़ारों पेड़ हैं. इन पेड़ों के फलों को बेचकर विभाग को हर साल 6 से 7 लाख रुपए तक की आय होती थी."

'जवाहर बाग' परिसर में ही उद्यान अधिकारी का आवास और कार्यालय भी है. खाद्य प्रसंस्करण विभाग का कार्यालय और प्रसंस्करण यूनिट भी यहां लगी है.

इस बाग में कर्मचारियों के लिए छह क्वार्टर, एक गेस्ट हाउस और दो गोदाम बने हैं. बाग में एक पौधशाला भी है. मथुरा और आसपास के इलाके में वृक्षारोपण के लिए इसी पौधशाला में पौधे तैयार होते थे.

स्थानीय पत्रकार चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार बताते हैं कि इस बाग की किस्मत साल 2014 में जिला प्रशासन के एक फैसले से अचानक बदल गई.

सिकरवार कहते हैं, "जिला प्रशासन ने कलेक्ट्रेट में अलग-अलग मुद्दे पर होने वाले धरना प्रदर्शनों के लिए जवाहर बाग की जगह तय कर दी, जिससे कलेक्ट्रेट में भीड़ का दबाव कम हो. जवाहर बाग पर कब्जा करने वाले रामवृक्ष यादव और उनके साथियों को तत्कालीन ज़िलाधिकारी ने मार्च 2014 में तीन दिन धरना देने की इजाजत दी थी."

इमेज कॉपीरइट AFP

यादव और उनके साथी एक बार जवाहर बाग में दाखिल हुए तो फिर बाहर निकलने को तैयार नहीं हुए.

मुकेश कुमार कहते हैं, "15 मार्च 2014 की शाम पांच बजे 4000 लोग आए. सबके हाथ में डंडे और झंडे थे. उनका कहना था कि उन्हें प्रशासन से दो दिन के पड़ाव की अनुमति मिली है. बाद में ये पड़ाव धरने में बदल गया."

मुकेश कुमार के मुताबिक बाद में यादव ने 'जवाहर बाग' को 'आज़ाद हिंद सरकार' का मुख्यालय घोषित कर दिया.

वो कहते हैं, "ये लोग हमें धमकी देते थे या तो परिसर खाली करो या फिर हमारे साथ मिल जाओ."

लगातार मिलने वाली धमकियों से परेशान होकर उद्याग विभाग के कर्मचारियों ने कई बार प्रशासन से सुरक्षा मुहैया कराने की गुहार लगाई.

मुकेश कुमार कहते हैं, "हमें धमाकाया गया. रिकॉर्ड फाड़े गए तो हम एफ़आईआर कराते गए. हमने कुल दस एफआईआर कराई. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई."

इमेज कॉपीरइट VIJAY KUMAR ARYA

सुरक्षा नहीं मिली तो उद्यान अधिकारी ने इस साल फ़रवरी में अपने आवास में ताला लगाया और परिसर छोड़ दिया. बाद में कर्मचारियों ने भी आवास खाली कर दिए.

उद्यान विभाग कर्मचारियों के बाहर निकलने के बाद पूरे बाग पर रामवृक्ष यादव और उनके सहयोगियों का कब्ज़ा हो गया.

सिकरवार कहते हैं, "मैं दो-तीन बार वहां आलू लेने गया तो मैंने देखा उन लोगों ने पेड़ काट दिए हैं. ट्यूबवेल पर कब्जा कर लिया है. बाग में तीन-चार गेट बना दिए हैं."

पुलिस के अभियान के बाद अब एक बार फिर इस बाग पर प्रशासन का कब्जा है. लेकिन अब बाग की सूरत पूरी तरह बदल गई है.

मुकेश कुमार कहते हैं, "अभी पूरे बाग का मुआयना तो नहीं किया लेकिन सबकुछ उजाड़ है. ट्यूबवेल इनके कब्जे में था तो पेड़ भी सूख गए हैं. मेरे घर का सब सामान राख हो गया है."

बाग खाली होने के बाद उम्मीद है कि उसमें दोबारा बहार आएगी, लेकिन कब अभी ये कहना मुश्किल है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार