मथुरा हिंसा: राजनीतिक षडयंत्र का हिस्सा तो नहीं!

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बाबा जयगुरुदेव के अनुयायी रामवृक्ष यादव दो साल पहले महज़ दो सौ लोगों के साथ मथुरा आए थे और दो दिन रुकने के लिए प्रशासन से जवाहर बाग़ में जगह मांगी थी.

दरअसल वो अपनी कुछ मांगों को लेकर साथियों समेत सत्याग्रह करना चाहते थे. प्रशासन ने जगह दे दी, लेकिन रामवृक्ष और उनके साथियों के दो दिन कभी पूरे नहीं हुए.

दो साल के भीतर उसी जवाहर बाग़ में उन्होंने क़रीब तीन हज़ार लोगों को अवैध तरीक़े से बसा दिया और लगभग तीन सौ एकड़ ज़मीन पर उनका प्रभाव स्थापित हो गया या यों कहें कि उनका एकछत्र अधिकार हो गया.

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रास्ते में आने वाली हर बाधा को वो काटते गए. स्थिति यहां तक आ गई कि जिस उद्यान विभाग के अधिकार में जवाहरबाग़ आता था उसके दफ़्तर और कर्मचारियों को भी वहां से भगा दिया गया.

यही नहीं पिछले कुछ समय से उनकी स्थानीय लोगों के साथ भी कई बार भिड़ंत हुई लेकिन किन वजहों से कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हो पाई, ये सवाल उलझा हुआ है. ये सब उस जवाहरबाग़ में हो रहा था जो डीएम कार्यालय से महज़ सौ दो सौ मीटर की दूरी पर है.

कथित तौर पर सत्याग्रह करने वाले इन लोगों के पास से बड़ी संख्या में मिले हथियार के बाद कुछ लोग कह रहे हैं कि असलहे उनके इस ‘साम्राज्य विस्तार‘ की गवाही दे रहे हैं.

रामवृक्ष यादव और उनके साथियों के इस अवैध कब्ज़े के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर करने वाले विजयपाल सिंह तोमर कहते हैं कि 'ये लोग लामबंद होकर किसी पर भी हमला कर देते थे, यहां तक कि ज़िले के बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के ऊपर भी.'

विजयपाल तोमर सीधे तौर पर आरोप लगाते हैं कि 'इन लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ था और इसी डर के कारण प्रशासन कई बार ख़ुद पर हमले होने के बावजूद कड़ी कार्रवाई नहीं कर पा रहा था.'

तोमर के अलावा कई स्थानीय लोग भी कहते हैं कि इन्हें जानबूझकर इलाक़े में बसाया जा रहा था ताकि एक ख़ास समुदाय और एक ख़ास पार्टी का वर्चस्व क़ायम हो सके.

स्थानीय पत्रकार विजय कुमार विद्यार्थी कहते हैं कि 'इनके राजनीतिक संपर्क के कोई प्रमाण तो नहीं मिले हैं लेकिन यहां आम राय यही है कि यादव होने के नाते इन्हें समाजवादी पार्टी की ओर से बराबर संरक्षण और बढ़ावा मिलता रहा है.'

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लोगों का कहना है कि यही वजह है कि सब कुछ जानते हुए भी इनके ख़िलाफ़ कभी कड़ी कार्रवाई नहीं हो सकी और कार्रवाई तब हुई जब ये ‘हाथ से निकलने’ की स्थिति में आ गए.

कहा यह भी जा रहा है कि यह कार्रवाई समाजवादी पार्टी के ‘मुखिया परिवार’ में आंतरिक कलह का नतीजा है. चूंकि इन लोगों को समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव का समर्थन था, इसीलिए मुख्यमंत्री ने तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए.

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ये बात अलग है कि इस बारे में राज्य सरकार को हाई कोर्ट का निर्देश मिला हुआ था.

बाग़ में बड़ी संख्या में जमा असलहों के मसले पर हालांकि राजनीतिक दल सरकारी मशीनरी और स्थानीय खुफियातंत्र पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन स्थानीय लोगों की इनके प्रति हमदर्दी है.

विजयपाल तोमर का कहना है कि 'खुफिया तंत्र की असफलता का तो सवाल ही नहीं क्योंकि यह बात तो यहां के सभी लोगों को मालूम है कि तीन हज़ार लोग किस तरह से हथियार इकट्ठा कर रहे हैं और पूरे इलाक़े में बसाए जा रहे हैं. ऐसे में ख़ुफ़िया वाले भला कैसे नहीं जानेंगे.'

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ इस संगठन के मुखिया रामवृक्ष यादव का चलने का तरीका किसी डॉन से कम नहीं था. उनके साथ हर समय हथियारबंद लोग रहा करते थे.

मथुरा में लेखपाल संघ के अध्यक्ष चौधरी वीरेंद्र सिंह कहते हैं कि स्थानीय लोग इन्हें नक्सलियों की तरह देखते थे क्योंकि इनके काम भी उसी तरह के थे.

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दरअसल इसके पीछे कुछ लोग गहरी राजनीतिक साज़िश की आशंका भी जता रहे हैं. ऐसे लोगों का कहना है कि इस इलाक़े में ख़ासतौर पर मथुरा में समाजवादी पार्टी का प्रभाव कमज़ोर है, इसलिए पर्दे के पीछे इन लोगों को एक सशक्त समर्थक के तौर पर खड़ा किया जा रहा था.

इस बात में कितनी सच्चाई है, इसका पता नहीं लेकिन जहां तक समाजवादी पार्टी के प्रभाव की बात है तो इसके प्रमाण साल 2012 के विधानसभा चुनाव से मिल जाते हैं. राज्य में पूर्ण बहुमत पाने के बावजूद पार्टी मथुरा ज़िले में एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत सकी थी.

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इस बीच भारतीय जनता पार्टी के इस सवाल ने इस आशंका को और मज़बूत कर दिया है कि उपद्रवियों को न सिर्फ़ बसाया गया और उन्हें तमाम तरह की सुविधाएं दी गईं बल्कि बड़ी संख्या में उनके 'राशन कार्ड' भी बनाए गए ताकि वो यहां के स्थाई नागरिक बन सकें.

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