महबूबा कश्मीरी पहचान का सौदा कर रही हैं?

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महबूबा मुफ़्ती लगभग दो महीने से जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की बागडोर संभाल रही हैं.

बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने वाली महबूबा के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां हैं.

सबसे पहले तो अभी वो यह सफाई देने में व्यस्त हैं कि उनके पिता मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने बीजेपी के साथ राजनीतिक नाता क्यों जोड़ा या सईद के निधन के बाद उन्होंने काफी देरी के बावजूद इस संबंध को किसलिए बहाल रखा?

दूसरा उनसे पूछा जा रहा है कि वो कश्मीर में भाजपा के राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अपनी सत्ता का इस्तेमाल क्यों कर रही हैं?

और तीसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वो अपने पिता की सीट से चुनाव जीत सकती हैं या नहीं?

श्रीनगर में अभी चल रहे विधानसभा के बजट सत्र में घाटी छोड़कर जाने वाले कश्मीरी पंडितों की वापसी और भारतीय सैनिकों के लिए कालोनियां बनाने के प्रस्ताव पर कई हफ़्तों से विवाद जारी है.

महबूबा मुफ़्ती ने सदन में 26 साल से राज्य से बाहर रह रहे कश्मीरी पंडितों की वापसी की बात करते हुए कहा, "मैं कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहती हूं लेकिन मैं कबूतरों को बिल्ली के सामने नहीं डाल सकती."

उनके इस बयान पर राजनीतिक हल्कों में ज़बरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली है.

बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने वास्तव में हथियारबंद चरमपंथियों की ओर इशारा किया था जिनके डर से कश्मीरी पंडित वापस नहीं आना चाहते हैं.

सोशल मीडिया पर उनके इस बयान को भाजपा की नीतियों से जोड़कर देखा जा रहा है.

महबूबा पर आरोप है कि वे आरएसएस के इशारे पर कश्मीर की मुस्लिम बहुल पहचान का सौदा कर रही हैं.

दो साल पहले जब कश्मीर में चुनाव हुए थे तो पहली बार बीजेपी को हिंदू बहुल इलाके जम्मू में 25 सीटें हासिल हुई थीं.

महबूबा मुफ़्ती की पार्टी पीडीपी को कश्मीर और जम्मू के कुछ क्षेत्रों में कुल मिलाकर 28 सीटें मिली थीं.

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उनके पिता मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने नेशनल कांफ्रेंस या कांग्रेस के साथ राजनीतिक गठबंधन के बजाए भाजपा के साथ हाथ मिलाया और कहा, "ये उत्तर धुव्र और दक्षिण धुव्र का गठबंधन है, लेकिन इस गठबंधन से जम्मू और कश्मीर के क्षेत्रों के बीच सहअस्तित्व की भावना जागेगी."

मुफ़्ती मुहम्मद सईद के निधन के बाद उनकी विधानसभा सीट अनंतनाग खाली हो गई है.

महबूबा मुफ़्ती इस वक्त राज्य विधानसभा की सदस्य नहीं हैं. वो दरअसल दक्षिण कश्मीर की संसदीय सीट से सांसद हैं.

संविधान के अनुसार उन्हें मुख्यमंत्री पद संभालने के छह महीने के अंदर विधानसभा की सदस्यता लेनी होगी.

महबूबा ने देर से चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग से अप्रैल में ही आवेदन किया था, लेकिन अब चुनाव आयोग ने उपचुनाव की घोषणा की है.

19 जून को वहां मतदान होने वाला है. बुधवार को महबूबा मुफ़्ती और उनके कुछ प्रतिद्वंद्वियों ने नामांकन किए हैं.

ऐसे में क्या वास्तव में महबूबा मुफ़्ती चुनाव जीत जाएंगी.

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विश्लेषक और स्तंभकार एजाज़ अहमद कहते हैं, "मुख्यमंत्री को अगर चुनाव लड़ना हो तो यह सरकार और सरकारी मशीनरी की प्रतिष्ठा का सवाल हो जाता है. यही वजह है कि जब भी कोई मुख्यमंत्री चुनाव लड़ा है, उसे जीत मिली है."

लेकिन आम धारणा के बावजूद अक्सर लोग कहते हैं कि महबूबा मुफ़्ती के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' वाली चुनौती है.

विधायक इंजीनियर राशिद ने अचानक से महबूबा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है. वे अभी उत्तरी कश्मीर के लंगेट से विधायक हैं.

इसके अलावा कांग्रेस के हिलाल शाह और नेशनल कांफ्रेंस के इफ़्तिख़ार मसगर भी महबूबा के ख़िलाफ़ लड़ेंगे.

इंजीनियर राशिद के चुनावी मैदान में उतरने से यह मुक़ाबला दिलचस्प हो गया है.

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इंजीनियर राशिद विधानसभा के सबसे सक्रिय सदस्य हैं. वो अक्सर भारत सरकार की आलोचना करते रहते हैं. वो अपनी इस राजनीति की वजह से सिर्फ़ अपने निर्वाचित क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरी घाटी में मशहूर हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि इंजीनियर राशिद के कारण महबूबा की जीत आसान हो सकती है, क्योंकि अनंतनाग में पीडीपी की लोकप्रियता गिर रही थी जिसका सीधा फ़ायदा नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस को जाने वाला था.

चूंकि अब इंजीनियर राशिद भी चुनाव लड़ेंगे, तो महबूबा के प्रतिद्वंद्वियों के वोट बंट जाएंगे और ये स्थिति तकनीकी रूप से उनके पक्ष में आ सकती है और वे जीत सकती हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि महबूबा मुफ़्ती ने जो बातें बीजेपी के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाने के पक्ष में कही हैं, उन्हें सही साबित करने के लिए भी उनका जीतना ज़रूरी है.

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