विधानसभा क्यों नहीं जाते हैं करुणानिधि

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तमिलनाडु विधानसभा में जब पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि विधायक के रूप में शपथ लेने गए तो डीएमके के कोषाध्यक्ष एमके स्टालिन ने ध्यान दिलाया कि विकलांगों के लिए विधानसभा कितनी असुविधाजनक है.

करुणानिधि को अक्सर ये कहते हुए पाया गया है कि पिछले कार्यकाल के दौरान वो विधानसभा में जाने से इसलिए कतराते रहे क्योंकि व्हीलचेयर समेत परिसर में प्रवेश करना उनके लिए संभव नहीं था.

तमिलनाडु उन राज्यों में से है, जहां शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के मुद्दों को संजीदगी से हल किया गया है.

यहां 1995 से ही विकलांग लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए क़ानून बने हैं.

फिर भी पूर्व मुख्यमंत्री कहते हैं कि वो व्हीलचेयर के कारण विधानसभा नहीं जा सके.

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जबकि 2008 में ही विकलांग विभाग को अलग विभाग का दर्जा दे दिया गया था. इससे पहले यह सामाजिक कल्याण विभाग के तहत था.

साल 2012 में एक क़ानून बनाया गया था, जिसके तहत सभी सरकारी इमारतों को विकलांग लोगों के लिए सुविधाजनक बनाया जाना था.

इस क़ानून के तहत, सभी सरकारी इमारतों में रैम्प, विकलांगों के लिए अलग शौचालय, विशेष पार्किंग आदि की व्यवस्था को अनिवार्य बनाया गया था.

लेकिन अभी भी 90 फीसद इमारतें, यहां तक कि चेन्नई में भी, इन सुविधाओं से महरूम हैं.

इस बात पर और हैरानी होती है कि राज्य विधानसभा में भी ये सुविधाएं नदारद हैं, जबकि यहां काम करने वाले 70 फ़ीसद लोग विभिन्न विकलांगताओं वाले हैं.

सचिवालय के एक विकलांग कर्मचारी ने बताया कि नमक्कल मलैगई, जहां से राज्य का सचिवालय काम करता है, वहां भी कई जगह रैम्प नहीं है.

विकलांगों के 20 संगठनों के सामूहिक संगठन 'दिसंबर थ्री' के दीपक ने बीबीसी को बताया कि आम लोग विकलांग लोगों को ही उनकी अक्षमता के लिए कोसते हैं.

वो कहते हैं कि सरकार का मानना है कि पोलियो के ख़ात्मे के साथ ही विकलांगों की संख्या कम हो रही है. लेकिन तथ्य इससे उलट हैं.

वो कहते हैं, "वो लोग जो बुढ़ापे के कारण चल नहीं सकते, वे लोग जिन्हें सुनने या बोलने में दिक्कत है, उन्हें भी विकलांग माना जाना चाहिए."

देखने में अक्षम लोगों की दुश्वारियां तो और भी भयावह हैं.

नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ ब्लाइंड के अध्यक्ष मनोहरन कहते हैं, "हम लोगों की समस्याओं को तो ठीक से समझा ही नहीं जाता है."

लेकिन अगर सार्वजनिक इमारतों के साथ समस्या है तो सार्वजनिक यातायात के साथ और दिक्कत है.

तमिलनाडु की बसों की सीढ़ियां ऊंची हैं और विकलांगों को सवार होने में ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

चेन्नई की इलेक्ट्रिक ट्रेन में तो सवार होना आसान है, लेकिन स्टेशन तक पहुंचने में कई सीढ़ियों को पार करना पड़ता है. यह अशक्त लोगों के लिए और मुश्किल वाला बन जाता है.

चेन्नई में अधिकांश रेलवे स्टेशनों में न लिफ़्ट है न एस्कलेटर है.

साल 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़, तमिलनाडु में विकलांग लोगों की संख्या 11.79 लाख है. यह संख्या राज्य की कुल आबादी की 1.6 फीसद है.

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भारत में कम से कम 2.68 करोड़ लोग किसी न किसी शारीरिक अक्षमता के शिकार हैं.

यह संख्या देश की कुल आबादी की 2.5 फ़ीसद है. लेकिन विकलांग आंदोलन के सदस्यों का कहना है कि संख्या इससे भी ज़्यादा हो सकती है.

अभी भी विकलांग लोगों की सरकार से शिकायत है कि वो आर्थिक मदद पर ध्यान देती है. लेकिन उनकी ज़िंदगी को सामान्य लोगों की तरह बनाने के लिए कुछ नहीं करती है.

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