'मोदी से क्या उम्मीद करें मुसलमान'

पिता एहसान जाफ़री के साथ नसरीन जाफ़री. इमेज कॉपीरइट Nishrin Jafri Hussain facebook

साल 2002 के गुजरात दंगों में अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में दंगाइयों के हाथों मारे गए पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफ़री की बेटी नसरीन जाफ़री का कहना है कि भारत में अल्पसंख्यक बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं.

उन्होंने कहा कि जब गुजरात जल रहा था तो नरेंद्र मोदी और उनके अफसर लोगों को सुरक्षा नहीं दे सके, तो अब उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं?

गुलबर्ग सोसाइटी में दंगाइयों की भीड़ ने 28 फ़रवरी 2002 को हमला बोला था. इसमें एहसान जाफ़री समेत 69 लोग मारे गए थे.

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अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने इस मामले में दो जून को फ़ैसला सुनाते हुए 24 लोगों को दोषी ठहाराया था और 36 लोगों को बरी कर दिया था.

नसरीन ने इस फ़ैसले के बाद बीबीसी न्यूजऑवर से बातचीत की और फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी. पेश है इस बातचीत के अंश:

हमारी बात सुनी गई. कुछ देर से ही सही, लेकिन हमें सुना गया. 14 साल लंबा इंतज़ार था, मेरी मां के लिए और हम सभी के लिए. हम आगे भी लड़ाई जारी रखेंगे.

इस फ़ैसले में छोटे-मोटे लोगों को जेल भेजा गया है, लेकिन जिन लोगों ने इस नरसंहार को अंजाम दिया वो अब भी बाहर हैं. बल्कि उनकी तरक़्क़ी हुई है और उन्हें बड़े ओहदों पर तैनात किया गया है.

जिस समय घटना हुई मैं वहाँ नहीं थी, लेकिन मैं हालात से अच्छी तरह वाकिफ़ हूं.

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मेरे पिता शहर की जानी-मानी हस्ती थे. ये शहर उनके परिवार की तरह था और वह तब से वहाँ रह रहे थे, जब वो 18 साल के थे.

घटना भी दिनदहाड़े हुई थी. भीड़ इकट्ठा हो रही थी, उन्होंने हर किसी को इसकी जानकारी दी. हर किसी को पता था कि वो पुलिस से लेकर केंद्र और राज्य सरकार तक से मदद की गुहार लगा रहे थे.

मैं कह सकती हूँ कि जो भी उनके आस-पास थे, उन्होंने मेरे पिता से हर किसी को फ़ोन करने को कहा, इसमें राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे.

मेरा घर अहमदाबाद में ऐसी जगह है जो काफी सुरक्षित कहा जा सकता है. यहा से 2-3 किलोमीटर की दूरी पर सैन्य परिसर है और 2 मील दूर सिविल अस्पताल है. वो किसी गांव में नहीं रह रहे थे.

सुबह के 10 बजे थे. भीड़ इकट्ठा हो रही थी, हर कोई हालात जानता था. भीड़ महिलाओं को खींच रही थी, महिलाओं का बलात्कार कर रही थे, वो बच्चों को मार रहे थे, उन्हें जला रहे थे...

हर कोई इस फ़ैसले का इंतज़ार कर रहा था. विधवाओं की पूरी कॉलोनी, अनाथ बच्चे, वे लोग जिन्होंने दंगों में अपने भाइयों, बहनों को गंवाया था, उन सभी को इस फ़ैसले का बेसब्री से इंतज़ार था.

अदालत के इस फ़ैसले से पूरी संतुष्ट तो नहीं हुआ जा सकता, लेकिन ये कुछ संतोष देने वाला ज़रूर है.

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सबसे ज़्यादा संतोष की बात ये है कि देश का एक हिस्सा हमारे साथ है. कई लोगों ने यहाँ तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है. चाहे वो ग़ैर सरकारी संगठन हों, राजनीतिक पार्टियां हो या किसी हद तक न्यायपालिका भी.

यहाँ तक पहुँचना कतई आसान नहीं था. ये मेरे भाई के लिए आसान नहीं था, जिन्होंने देश छोड़ने से इनकार कर दिया था. ये मेरी मां और हमारे बच्चों के लिए आसान नहीं था.

मैं यहाँ ये बात बताना चाहूँगी कि भीड़ में अधिकांश लोग बाहर से आए थे, वे ट्रकों में भरकर आए थे. उनके पास मोबाइल फ़ोन, वोटर लिस्ट, हथियार थे. वे पूरी तैयारी से वहाँ आए थे.

14 साल में गुजरात में बहुत कुछ बदल गया है. अब हालात ऊपर से सामान्य लगते हैं, लेकिन दिल बंटे हुए हैं. लोगों के बीच फ़ासला बढ़ गया है.

रही बात प्रधानमंत्री मोदी की, तो मुसलमान भला उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं.

जब गुजरात जल रहा था तो नरेंद्र मोदी ही राज्य के मुख्यमंत्री थे और उनके अफ़सर लोगों को सुरक्षा नहीं मुहैया करा सके.

अगर वो उस समय लोगों को सुरक्षा नहीं दे पाए तो अब मुसलमान उनसे भला क्या उम्मीद करें. भारत में अल्पसंख्यकों के लिए ये बहुत मुश्किल दौर है.

पूरे अहमदाबाद में आपको हिंदू बहुसंख्यक इलाक़ों में एक भी मुसलमान परिवार नहीं मिलेगा. शहर पूरी तरह हिंदू-मुसलमान में बंट गया है और इस खाई को पाटने की कोई कोशिश नहीं हुई है.

यहाँ तक कि मौजूदा सरकार के साथ काम कर रहे मुसलमान राजनेता भी मुस्लिम बहुल इलाकों में ही रहते हैं. उन्हें भी डर है.

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हालाँकि पहली बार नहीं हुआ था कि मेरे पिता का घर जलाया गया था. 1969 में भी हमारा घर जलाया गया था.

इसी जगह से मेरे माँ-बाप अपना सारा सामना छोड़ कर भागे थे. हम शरणार्थी शिविरों में रहे थे. मैं चार साल की उम्र में शरणार्थी शिविर में रही.

लेकिन मेरे पिता फिर लौटकर उसी जगह आए, क्योंकि उन्हें लोकतंत्र में यकीन था.

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