'सौ स्मार्ट सिटी के बजाए सौ हेल्थ सिटी चाहिए'

भारत में एचआईवी संक्रमित ख़ून चढ़ाने की ख़बर को लेकर हाल में काफ़ी विवाद हुआ है.

नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइज़ेशन (नाको) की जानकारी के मुताबिक़, अक्तूबर 2014 से लेकर मार्च 2016 के बीच 17 महीनों में संक्रमित ख़ून चढ़ाने के कारण एचआईवी संक्रमण के 2,234 मामले सामने आए हैं.

आरटीआई कार्यकर्ता चेतन कोठारी की ओर से दायर आरटीआई याचिका के जवाब में नाको ने यह ब्योरा दिया है.

रोकथाम की तमाम कोशिशों के बावजूद ब्लड ट्रास्फ़्यूज़न, भारत ही नहीं पूरी दुनिया में एचआईवी संक्रमण का स्रोत बना हुआ है.

हालांकि उच्च और निम्न आय वर्ग वाले देशों में इसका प्रतिशत काफ़ी अलग-अलग है.

भारत में ख़ून चढ़ाने से एचआईवी संक्रमण होने की दर में काफ़ी गिरावट आई है. वर्तमान में यह एक फ़ीसदी से नीचे है.

फिर भी, प्रतिशत के लिहाज़ से यह भले ही बहुत मामूली लग रहा हो, लेकिन भारत में बड़ी संख्या में लोग इससे प्रभावित हैं.

भारत में 20.9 लाख से ज़्यादा लोग एचआईवी या एड्स से प्रभावित हैं, यानी यह संख्या अच्छी ख़ासी है.

इसलिए 17 महीनों में 2,234 मामले आना कोई छोटी बात नहीं है. इतनी ज़िंदगियों को भारी ख़तरे और सदमें में डाल दिया गया है.

हर दिन संक्रमित लोग और इनके परिवार के लोग जो त्रासदी झेलते हैं, उसे संख्याओं में नहीं बयां किया जा सकता.

हम भूल जाते हैं कि उन्हें इस धीरे-धीरे मारने वाली और बदनाम बीमारी के साथ ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ेगी, बावजूद कि उनकी तरफ़ से इस ख़तरनाक़ बीमारी को गले लगाने जैसा कोई व्यवहार नहीं किया गया.

ये आंकड़े उस महत्वपूर्ण पहलू की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं जिसकी सावधानी बरतने की ज़रूरत है और वो है भारत में ख़ून चढ़ाने के समय सुरक्षा मापदंडों का ठीक से ख़्याल नहीं रखा जाता है और एचआईवी के ख़िलाफ़ लड़ाई सुस्त पड़ती जा रही है.

हालांकि पहले हमें इन बुनियादी तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए.

भारत में हर साल ज़रूरत से कई लाख ब्लड यूनिट की कमी होती है. इसलिए यहां ख़ून की कमी रहती हैं.

रक्तदान करने वाले लोगों की संख्या यहां बहुत कम है और ऐसे भी बहुत लोग हैं जो पैसे के लिए ऐसा करते हैं.

हालांकि भारत में ब्लड बैंकों ने ख़ून के बदले पैसे देने पर रोक लगा रखी है, फिर भी ब्लैक मार्केट में ख़ून की ख़रीद-फ़रोख़्त एक पैसे वाला धंधा बना हुआ है.

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कभी-कभी मरीज़ के परिवार वालों को रक्तदान करने वालों का इंतज़ाम करने को कहा जाता है ताकि ऐसे मरीज़ों के लिए ख़ून को स्टॉक में बचाया रखा जा सके जो बहुत ज़रूरतमंद हैं.

तकनीकी रूप से यह भी ग़ैर-क़ानूनी है, लेकिन इसे स्वीकार्य माना जाता है.

हालांकि सरकार सुरक्षा के मापदंड तय करती है लेकिन आम तौर पर इनका बहुत लापरवाही से पालन होता है और कई ख़ामियां भी आम हैं.

रक्तदान करने वाले सभी दानकर्ताओं की एचआईवी, हैपेटाइटिस और सिफलिस की जांच होनी चाहिए.

लेकिन सरकार की ओर से अधिकृत ब्लड बैंकों में इन नियमों का ख़्याल नहीं रखा जाता.

नतीजतन अभी तक ख़ून चढ़ाने के कारण हज़ारों लोग एचआईवी संक्रमण के शिकार होते हैं.

'वींडो पीरियड' का सवाल भी बहुत अहम है. यानी वो समय जब ख़ून देने वालों में हफ़्तों तक एचआईवी संक्रमण के लक्षण नहीं दिखते हैं.

'वींडो पीरियड' के समय को सात दिनों तक भी लाया जा सकता है, लेकिन इसकी जांच महंगी है और हर राज्य इस जांच का इस्तेमाल भी नहीं करते हैं.

सबसे बढ़िया तरीक़ा तो यह है कि ख़ून देने वाले लोगों की पहले ही जांच कर लेनी चाहिए और उनके बीमारियों के इतिहास के बारे में पता लगाकर रखना चाहिए, ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि वो किसी बीमारी से संक्रमित नहीं हैं.

इसके बाद भी ब्लड बैंक को उस ख़ून की जांच करनी चाहिए.

सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि भारत में रक्तदान करने वालों की पहले से कमी है, बावजूद अक्सर अनावश्यक तरीक़े से इसे चढ़ाया जाता है.

इससे ना सिर्फ़ मरीज़ों में एचआईवी संक्रमण होने का ख़तरा रहता है बल्कि ज़रूरतमंदों को भी ख़ून मिलने में दिक़्क़त होती है.

हमें यहां पर दो मुख्य मुद्दों पर विचार करना चाहिए.

पहला तो यह कि भारत में सुरक्षित ख़ून चढ़ाने के मापदंड हमेशा से कमज़ोर रहे हैं और इसे दुरुस्त करने और कठोरता से लागू करने की ज़रूरत है.

दूसरा यह कि एचआईवी के ख़िलाफ़ भारत की लड़ाई धन के अभाव में सुस्त हो गई है और आत्मसंतोष की भावना बढ़ती जा रही है.

ये दोनों ही मसले एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं.

जहां तक सुरक्षित ख़ून का सवाल है तो भारत को स्वेच्छा से नियमित तौर पर रक्तदान करने वालों को प्रोत्साहित करना चाहिए. बिना पैसा लिए रक्तदान करने वाले इन लोगों के संक्रमित होने की गुंजाइश कम होती है.

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दान किए गए ख़ून की एचआईवी, हैपेटाइटिस बी, हैपेटाइटिस सी और सिफलिस की जांच सख़्ती से की जानी चाहिए.

अनावश्य ख़ून चढ़ाने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए.

भारत को एचआईवी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई को भी नए सिरे से मज़बूत करने की ज़रूरत है.

जैसे ही एचआईवी के नए मरीज़ों की संख्या कम हुई वैसे ही इसके फंड में कटौती कर दी गई, इससे इसके ख़िलाफ़ ज़मीनी स्तर पर चलने वाले कार्यक्रम प्रभावित हुए.

दो सालों में एचआईवी से मुक़ाबला करने वाली दवाइयों के भंडार में कमी आई है और प्रशासनिक ख़ामियों की वजह से इसके परीक्षण किट की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है.

जब तक कि मामला गर्म नहीं हो जाता है तब तक अधिकारी इंतज़ार करते रहते हैं और फिर उसके बाद अपना पुराना रवैया अपना लेते हैं.

भारत को सौ स्मार्ट सिटी के बजाए सौ हेल्थ सिटी चाहिए जहां जन स्वास्थ्य की सुविधाओं पर बहुत बोझ ना हो और मरीज़ों को कम पैसे में बिना किसी संक्रमण के ख़तरे के बेहतर स्वास्थ्य लाभ मिलें.

साफ़ है कि मज़बूत राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बिना यह संभव नहीं है और इन दोनों का ही फ़िलहाल घोर अभाव दिखाई पड़ता है.

इस मामले के शांत होते सभी चीज़ें अपने पुराने ढर्रे पर लौट जाएंगी और लापरवाही के कारण होने वाले संक्रमण के नए मामले सामने आते रहेंगे.

फ़िलहाल हमें इस पर ग़ौर करना चाहिए कि जिन 2,234 लोगों को एचआईवी संक्रमित ख़ून चढ़ाए गए थे क्या वाक़ई में उनको ख़ून की इतनी ज़रूरत थी.

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