नाम बदलकर काम निकालना चाहतीं है सरकार

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बिहार में नील गायों ने भले ही दो केंद्रीय मंत्रियों को आमने सामने ला खड़ा किया हो, लेकिन मध्यप्रदेश में सरकार नील गाय के आतंक का हल नाम बदल कर निकालना चाहती है. यही वजह है कि पिछली विधानसभा में काग्रेंस और भाजपा दोनों के ही सदस्यों ने इसका नाम रोजड़ रखने की बात की. इनका दावा है कि नील गाय नाम की वजह से किसान इन्हें मारने से डरते हैं.

वरिष्ठ आईएफ़एस और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक(वन्यप्राणी) रहे शाहबाज़ अहमद ने बताया, “गाय के नाम के साथ जुड़ी धार्मिक भावनाओं की वजह से लोग इनके शिकार से बचते रहे हैं. इसी वजह से इसके नाम को बदलने पर विचार किया गया. ये काम केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है.”

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विधानसभा में मामला आया था कि नील गाय प्रदेश के मंदसौर, रतलाम और नीमच जैसे ज़िलों में फ़सलों को बड़े पैमाने पर चौपट कर रही है. वन मंत्री गौरीशंकर शेजवार ने भी माना था कि गाय शब्द की वजह से किसान इन्हें मारने में कोई रुचि नहीं दिखाते हैं. उन्होंने ये भी कहा था कि इससे बड़ी तादाद में फ़सले ख़राब हो रही है.

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हालांकि इससे होने वाले नुक़सान के लिये मुआवज़े का प्रावधान रखा गया है लेकिन मुआवज़ा लेना भी एक आम किसान के लिये आसान नहीं है इस वजह से आमतौर पर किसानों को नुक़सान ही सहना पड़ता है. मुआवज़ा लेने के जो नियम है वो बहुत मुश्किल भरे हैं. इसलिये किसान उन्हें पूरा कर पाने में अपने आप को असमर्थ पाता है.

विधायक सुंदरलाल तिवारी कहते है, “नील गाय बहुत बड़े पैमाने पर मेरे ज़िले में नुकसान पहुंचा रही. क्षेत्र में लगभग एक तिहाई फ़सल को चौपट कर चुकी है. इसलिये ये ज़रुरी है कि इस पर लगाम लगाई जायें.”

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नीलगाय का वैसे गाय की प्रजाति से कोई लेना देना नहीं है. ये गाय की तरह दिखती है इसलिये इसके नाम के आगे गाय लगा दिया गया है. हिंदू संस्कृति में गाय को पूजनीय माना जाता है इसलिये आमतौर पर किसान इसे मारने से डरते हैं. वहीं ये कई बार उल्टा हमला कर देती है इसलिये इसे पकड़ पाना भी आसान नही होता है. जंगलों में मांसाहारी जानवरों की कमी के चलते भी इनकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

मध्यप्रदेश में इनके आतंक का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल नीमच ज़िले में किसानों ने छह दिन तक भूख हड़ताल की थी ताकि इनका कोई हल निकल सकें.

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