देह व्यापार के सदमे से कैसे उबरती हैं लड़कियां?

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पश्चिम बंगाल के 24 परगना की सायमा (बदला हुआ नाम) को इसका बिलकुल आभास नहीं था कि जिसकी मोहब्बत में वो अपने गाँव से भागकर मुंबई जा रही हैं. दरअसल वही उसका सौदागर बन जाएगा.

सायमा को जिस्म फरोशी की मंडी में बेच दिया गया था. तब उनकी उम्र महज़ 16 साल थी. शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर सायमा उन यातनाओं को याद कर सिहर उठती हैं जो उन्होंने बेचे जाने के बाद सहीं थीं. सायमा अकेली नहीं हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि पूरे भारत में मानव तस्करी की शिकार लड़कियों में से 42 प्रतिशत सिर्फ पश्चिम बंगाल की हैं.

देह व्यापार के लिए तस्करी का शिकार हुई ज़्यादातर पीड़ितों को वही सब कुछ झेलना पड़ता है जो सायमा ने झेला. इनमे से कुछ का अनुभव और भी बुरा है.

सामजिक कार्यकर्ता बैताली गांगुली कहती हैं कि पश्चिम बंगाल न सिर्फ देह व्यापार के लिए की जा रही मानव तस्करी का बड़ा केंद्र है बल्कि यह बांग्लादेश और नेपाल से तस्करी का शिकार हुई लड़कियों का 'ट्रांजिट प्वॉइंट' भी है.

उनका कहना है कि तस्करी का शिकार हुई ज़्यादातर लड़कियों को या तो कोलकाता में एशिया की देह व्यापार की सबसे बड़ी मंडी 'सोनागाछी' में बेच दिया जाता है या फिर उन्हें उन महानगरों में बेचा जाता है जहां 'डांस बार' का धंधा जोर शोर से चल रहा है.

पश्चिम बंगाल की सरकार और कुछ समाजिक संगठनों ने ऐसी लड़कियों को मानव तस्करों के चंगुल से बचाने के लिए व्यापक अभियान चलाया है.

अभियान के दौरान देश के विभिन्न 'रेड लाइट' इलाकों और डांस बारों से बहुत सारी लड़कियों को बचाया भी गया है.

मगर सामजिक संस्थाओं के सामने इन लड़कियों के पुनर्वास की समस्या सबसे बड़ी चुनौती के रूप में रही है क्योंकि यातना और शोषण के बाद इनमें मनोवैज्ञानिक अस्थिरता के लक्षण पैदा हो जाते हैं.

देह व्यापार के लिए तस्करी का शिकार हुई ऐसी ही लड़कियों को 'ट्रामा' यानि अवसाद से बाहर निकलने के लिए सामाजिक संगठनों ने संगीत और नृत्य का सहारा लिया है.

'समवेद' नामक एक ग़ैर सरकारी संगठन ने तस्करी का शिकार हुई इन लड़कियों को उनके पुनर्वास केंद्रों पर ही जाकर संगीत और नृत्य के माध्यम से ज़िन्दगी को दोबारा जीने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया है.

'समवेद' की सोहिनी चक्रवर्ती मुझे उस जगह ले जाती हैं जहां ऐसी लड़कियों को नृत्य और संगीत की 'थेरेपी' दी जा रही है. वो कहती हैं, "ये नृत्य और संगीत इस तरह से पिरोया गया है ताकि इन्हें यह मुक्ति का अहसास दिला सके. मुक्ति पिछली ज़िंदगी से. पिछले अनुभवों और कड़वी यादों से."

सोहिनी का कहना है कि यातनाएं झेलने के बाद इन बचाई गई लड़कियों का व्यवहार बिलकुल बदल जाता है. ये ना किसी से बात करना चाहती हैं. ना, घुलना मिलना, "इनके अंदर चिड़चिड़ापन आ जाता है. संगीत और नृत्य इन्हें इन सबसे मुक्ति देने में मदद करता है."

मगर इस पूरी थेरेपी की प्रक्रिया में इस बात का ख़याल रखा जाता है कि केवल वाद्य संगीत ही बजाया जाए क्योंकि उसके बोल इन पीड़ित लड़कियों को फिर से उसी दौर की याद दिलाते रहेंगे जो वो याद नहीं करना चाहती हैं.

इसमें कुछ विदेशी संगीत के अलावा शास्त्रीय संगीत और कत्थक और भरतनाट्यम जैसी नृत्य शैलियों को इसमें शामिल किया गया है.

यहाँ मेरी मुलाक़ात नीतू से हुई जो तस्करी का शिकार होने के बाद कोलकाता के एक पुनर्वास केंद्र में रहती हैं.

नीतू ने बताता कि जब उन्हें 'रेड लाइट' के इलाके से बचाया गया था तब वो बिकुल टूटी हुई थीं.

वो बताती हैं, "मेरे साथ जो कुछ हुआ उसके बाद मैं जीना नहीं चाहती थी. न किसी से मिलना चाहती थी न अपने घर ही वापस लौटना चाहती थी. लगता था मानो ज़िन्दगी अब ख़त्म हो गई. मगर जब मैंने नृत्य और संगीत का सहारा लिया तो सबकुछ बदलता नज़र आया. ऐसा लगा जैसे मुझे मुक्ति मिल रही हो."

आज नीतू की तरह कोलकाता के पुनर्वास केंद्रों में रहने वाली कई ऐसी लडकियां हैं जो खुद संगीत और नृत्य के जरिए इस अवसाद से उबर गईं हैं.

अब वो बतौर प्रशिक्षक पुनर्वास केंद्रों में रह रही दूसरी लड़कियों को अपनी ज़िंदगी दोबारा जीने के लिए प्रोत्साहित करने का काम कर रही हैं.

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