'पिंजरे में बंद पक्षी की तरह महसूस करती हूं'

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भारत प्रशासित कश्मीर में अलगाववादी गुटों ने कश्मीरी पंडितों को दोबारा कश्मीर में बसाने के सरकार के फ़ैसले का शांतिपूर्ण विरोध करने का फ़ैसला लिया है.

वर्षा कौल 1990 में 15 दिन की थी जब उन्हें अपने परिवार के साथ श्रीनगर छोड़कर जाना पड़ा था.

वो कहती हैं, "एक शाम चरमपंथियों ने हमारे घर को चारों ओर से घेर लिया. वो मेरे चाचा भरत भूषण कौल को ये कहते हुए अपने साथ ले गए कि उन्हें उनसे कुछ सवाल पूछने हैं. उन्होंने धमकी दी कि किसी ने भी उनका रास्ता रोकने की कोशिश की तो वे गोली मार देंगे. हर कोई डरा हुआ था."

सुबह भरत भूषण कौल की लाश उनके घर के बाहर एक पेड़ पर लटकी हुई मिली. 28 साल के भरत भूषण कौल एक सरकारी मुलाजिम थे और हाल ही में उनकी सगाई हुई थी. एक महीने के बाद उनकी शादी होने वाली थी.

1980 के दशक के आख़िरी दौर में मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में एक हथियारबंद आंदोलन ने जन्म लिया था जिसका मकसद और मांग भारत से आज़ादी था.

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चरमपंथी अक्सर हिंदू अल्पसंख्यकों को अपना शिकार बनाते थे. उस वक्त हमलों और धमकियों के डर से साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़कर जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में शरण ली.

आज घाटी में सिर्फ 2764 हिंदू बचे रह गए हैं.

वर्षा कौल कहती हैं, "घाटी में हालात बदतर होने के बाद मेरे परिवार ने जम्मू जाने की योजना बनाई थी. उन्होंने सोचा कि वे कुछ महीने रहने के बाद जब घाटी में हालात बेहतर होंगे तो लौट आएंगे. लेकिन जब मेरे चाचा मारे गए, तब सबने उम्मीद छोड़ दी और ट्रक पर सारा समान लादकर हमने घाटी छोड़ दी."

वो आगे कहती हैं, "यहां के हालात खराब होते चले गए और हम वापस नहीं लौट सके. हम डर गए थे कि वापस गए तो हमारा भी वहीं हाल होगा जो मेरे चाचा का हुआ था."

उन्हें घाटी लौटने में 26 साल लग गए. मैं पिछले हफ़्ते वर्षा कौल और उनकी मां किरण कौल से मिली.

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वे लोग बडगाम ज़िले में अपने पुराने पड़ोसियों से मिलने आई थीं. बडगाम श्रीनगर के पास ही है.

हालांकि वे लोग बहुत कम दिनों के लिए आए थे लेकिन उनकी उम्मीदें एक बार फिर से जग गई थीं कि वे दोबारा से घाटी लौट सकते हैं.

बीजेपी और पीडीपी की गठबंधन सरकार ने कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी में लाने का वादा किया है.

अधिकारियों का कहना था कि वे वापस आने वाले कश्मीरी पंडितों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाएंगे जहां वे सुरक्षित रह सकें. लेकिन इस योजना को उस वक्त घक्का पहुंचा जब कई लोगों ने सरकार पर यह आरोप लगाना शुरू किया कि सरकार "फलस्तीन में इसराइल जैसी व्यवस्था" बनाने की कोशिश कर रही है.

इस आलोचना के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपने फ़ैसले को लगभग बदलते हुए इस बात पर जोर दिया कि वो कश्मीरी पंडितों के तब तक सिर्फ रहने की जगह मुहैया कराने की बात कर रही थीं जब तक कि वे अपना घर ना तैयार कर लें. लेकिन घाटी में बहुत सारे लोग उनके इस सफाई से सहमत नहीं हैं.

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अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह पैदा हो गई है कि कश्मीरी अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फारूक़, यासीन मलिक और सयैद अली शाह गिलानी ने सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाथ मिला लिए हैं.

मीरवाइज़ फारूक़ ने बीबीसी से कहा, "हम चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित वापस आए. हर कश्मीरी मुसलमान इस पर सहमत है. हम मानते हैं कि यह एक मानवीय मुद्दा है. पंडितों को वापस आने का हक़ है और सरकार को उन्हें बसाने के लिए अच्छा मुआवज़ा देना चाहिए. लेकिन हम विशेष तरह की व्यवस्था के ख़िलाफ़ है क्योंकि यह कश्मीरियों में गहरी दरार पैदा करेगा."

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वो कहते हैं, "उन्हें अलग सुरक्षित क्षेत्र में सुरक्षा घेरे के साथ रखने से नफ़रत की दीवार खड़ी होगी और यह सही तरीका नहीं होगा."

शुक्रवार को श्रीनगर की जामिया मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के बाद वे अपने समर्थकों को सरकार की योजना का विरोध करने के लिए कहते हैं.

आश्चर्य की बात यह है कि कई पंडित भी मीरवाइज़ की बात से सहमत हैं.

65 साल की सेवानिवृत शिक्षिका ललिता धर 1989 में घाटी छोड़कर जम्मू चली गई थीं. वो 18 महीने पहले हिंदुओं के लिए सरकार की ओर से बनाए गए शेखपुरा कैंप में रह रही हैं.

दो कमरों वाले अपार्टमेंट में वे और उनकी बेटी एक और दूसरे परिवार के साथ रह रहे हैं. उनका कहना है कि यह किसी 'पिंजरे में बंद पक्षी' की तरह है.

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उन्होंने कहा, "घाटी छोड़ने से पहले हम श्रीनगर में रहते थे. मुस्लिम पड़ोसियों के साथ हमारे बहुत अच्छे रिश्ते थे. वे हमारी मदद किया करते थे. वे हमें चरमपंथियों से बचाते थे. मैं वापस जाना चाहती हूं और वहां रहना चाहती हूं. लेकिन मुझे अपना गुजारा चलाने के लिए अपना पुश्तैनी मकान बेचना पड़ा था. मुझे यहां कैंप में रहना पसंद नहीं है. मैं पिंजरे में बंद पक्षी की तरह महसूस करती हूं. "

उनका कहना था, "सभी धर्मों के लोगों को एक साथ रहना चाहिए. हमें एक-दूसरे के साथ घुलना-मिलना चाहिए. तभी हम किसी आज़ाद पक्षी की तरह उड़ सकते हैं."

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू का कहना है कि घाटी छोड़ने वाले 95 फ़ीसदी हिंदुओं ने अपने घर और ज़मीन बेच दिए हैं इसलिए ज़ाहिर है कि वे अपने पुराने घर में तो नहीं लौट सकते हैं.

संजय टिक्कू जान से मारे जाने की धमकी के बावजूद घाटी छोड़कर नहीं गए और शादी करके अपने दो बच्चों के साथ हमेशा से यहीं रहे.

उनका कहना है कि आज की पीढ़ी के मुसलमान नौजवानों और पंडितों के बीच उतना जुड़ाव नहीं है इसलिए हिंदुओं का लौटना आसान नहीं होगा.

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Image caption संजय टिक्कू.

पिछले कुछ सालों में चरमपंथ की घटनाओं में कमी आई हैं. कश्मीर में हलचल है. गर्मी के मौसम में हज़ारों भारतीय पर्यटक घाटी की सैर करते हुए देखे जा सकते हैं.

लेकिन संजय टिक्कू का कहना है कि पल भर में हालात बदल सकते हैं.

संजय टिक्कू कहते हैं, "2008 में सरकार ने अमरनाथ हिंदू श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटित करने का फ़ैसला किया था जिसे लेकर कई दिनों तक विरोध-प्रर्दशन होते रहे थे. एक हिंदू के तौर पर यहां मुझे उस वक्त काफी असुरक्षा महसूस हुई थी. मेरे मुसलमान पड़ोसी मुझे ऐसे देखते थे कि मुझे लगा मैं 1990 के चरमपंथ के दौर में चला गया हूं."

उनका मानना है कि घाटी छोड़कर गए लोग अब घाटी में जीवन के दबाव को नहीं झेल पाएंगे और परेशानी आते ही दोबारा से भाग खड़े होंगे.

उनका कहना है, "मैं सोचता हूं कि इसका हल एक ऐसे स्मार्ट सिटी को बनाकर निकाला जा सकता है जिसमें पचास फ़ीसदी घर पंडितों के लिए हों और बचे हुए घर मुस्लिम, सिख और दूसरे हर शख्स के लिए हों जो वहां रहना चाहता है. तब जाकर हम यहां एक सच्ची साझा संस्कृति वाले समाज का निर्माण कर पाएंगे."

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