गुलबर्ग में अफ़ज़ल जैसा कड़ा रुख़ क्यों नहीं?

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गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड को लेकर वरिष्ठ पत्रकार अमितसेन गुप्ता का कहना है कि जैसे संसद पर हमले के मामले में अफ़ज़ल गुरु को फांसी दी गई, इस मामले में भी वैसा ही कड़ा रुख़ अपनानया जाना चाहिए.

गुजरात दंगे के दौरान अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी में 69 लोगों की मौत के मामले में अदालत ने 11 लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है.

जबकि एक मुजरिम को 10 साल की और 12 को सात-सात साल की क़ैद की सज़ा हुई है.

लेकिन इस फ़ैसले से पीड़ित संतुष्ट नहीं हैं और कांग्रेस के भूतपूर्व सांसद एहसान जाफ़री की पत्नी जाकिया जाफ़री ने ऊपरी अदालत में अपील करने की बात कही है.

बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद ने वरिष्ठ पत्रकार अमित सेनगुप्ता से इस बारे में बात की.

बातचीत के अंश

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Image caption अफ़ज़ल गुरु को भारतीय संसद पर हमले का दोषी क़रार दिया गया था.

भारत में कई दंगे हुए. 1984 में सिखों के ख़िलाफ़ दंगे हुए और हमको लगता है कि दंगों के इतिहास में सज़ाएं नहीं हुईं. जो क़ातिल और मास्टमाइंड थे वो खुलेआम घूमते रहे.

2002 में जो क़त्लेआम हुआ उसमें नौ मामले अहम थे जिनमें नरोदा पाटिया, नरोदा ग्राम, बिलक़िस बानो, बेस्ट बेकरी केस और गुलबर्ग सोसाइटी का मामला शामिल है.

इन तमाम मामलों की ख़ास बात ये रही ही कि इनमें इंसाफ़ का काम थोड़ा आगे बढ़ा और क़ातिलों को सज़ा मिली है. इसे मैं नाइंसाफ़ी तो नहीं कहूंगा लेकिन आधा न्याय ज़रूर कहूंगा.

उदाहरण के लिए अफ़ज़ल गुरु का तो संसद पर हमले में कोई हाथ भी नहीं था, सिर्फ साज़िश और सामूहिक भावना के आधार पर फांसी दे दी गई.

गुलबर्ग का मामला तो उन 69 भारतीय नागरिकों से जुड़़ा है जो निर्दोष थे, जिनका किसी भी मामले में कोई भी हाथ नहीं था.

गुजरात दंगा भारत में सबसे अधिक विस्तृत जांच वाला मामला है. इसमें 42 या 45 के क़रीब तो सिर्फ बड़ी बड़ी रिपोर्ट हैं. लेकिन अदालत तो वही मानेगी जो उसके सामने पेश किया जाएगा.

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Image caption 1984 के सिख विरोधी दंगे देश की राजधानी दिल्ली में हुए.

जिस तरह 1984 के दंगे कांग्रेस के दामन पर धब्बा हैं, उसी तरह बीजेपी के लिए गुजरात के दंगे एक शाप की तरह हैं, और ये ख़ून के धब्बे कभी नहीं मिट सकते.

अभी कांग्रेस नेता कमलनाथ को कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने पर भाजपा और अकाली दल के लोग आलोचना करने लगे, ऐसा इसलिए कि लोग उन दंगों को भूले नहीं हैं.

हालांकि सिख दंगों में कमलनाथ की भूमिका अभी तक साबित नहीं हुई है. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि वो इनमें शामिल थे.

इसमें एक सामूहिक भावना की भूमिका है और ये होनी ही चाहिए. तो फिर गुजरात दंगों के मामले में सामूहिक भावना क्यों नहीं होनी चाहिए.

अगर समाज पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़ जाता तो हम आज हिटलर के जनसंहार की बातें नहीं कर रहे होते और जर्मनी इस बात के लिए माफ़ी नहीं मांग रहा होता कि तुर्की में आर्मेनियाई लोगों को मारा गया.

(अमित सेनगुप्ता के निजी विचार)

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