गुलबर्ग कांड: नेता छूटे, कार्यकर्ताओं को सज़ा

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28 फरवरी, 2002 में गुजरात के अहमदाबाद में गुलबर्ग सोसायटी को आग लगाई गई थी, जिसमें कुल 69 लोगों की मौत हुई थी. इस कांड में पकड़े गए कुल 64 अभियुक्तों पर अदालत में मुक़दमा दायर किया गया और इनमें से 24 को दोषी ठहराया गया.

विशेष एसआईटी अदालत में इन दोषियों की सज़ा का फ़ैसला शुक्रवार को होना है.

इस पूरे मामले में फ़ैसला आने में 14 साल बीत गए और इतना ही नहीं इस कांड में शामिल भाजपा नेता शक के आधार पर बरी हो गए, केवल अदना कार्यकर्ताओं को सज़ा हुई.

27 फरवरी, 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस को आग लगाने की घटना को लेकर गुजरात के कई शहरों में दंगे हुए थे, जिस में अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी भी थी.

सभी दंगों की घटना की जांच के लिए राज्य सरकार ने ख़ास जांच दल बिठाया था, हालांकि इस केस की सुनवाई के बाद फ़ैसला देने वाले न्यायाधीश पी बी देसाई ने ख़ास दल की पूर्व नियोजित साज़िश मानने से इनकार कर दिया था. जांच दल द्वारा की गई जांच योग्य रूप से नहीं हुई जिस कारण अभियुक्तों को फ़ायदा मिला.

भाजपा के प्रवकता भरत पंडयानी बीबीसी को बताया कि अदालत ने भी माना कि गुलबर्ग कांड साज़िश नहीं थी.

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उन्होंने बताया, “अदालत ने जो भी आदेश दिया है, वह किसी के प्रभाव में आए बिना अदालत के सामने रखे तथ्यों के आधार पर लिया है. कोई पक्ष या पद को ध्यान में रखकर जांच नहीं हुई है, इसी कारण जो भी अदालत के निर्णय से नाराज़ है वो उपरी अदालत में याचिका कर सकता है.”

कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष दोशी का कहना था, “दंगों की जितनी घटनाएं घटीं उसकी जांच सही प्रकार से हुई ही नहीं, इसके चलते बड़े नेताओं को पहले ही निर्दोष साबित कर दिया, जबकि कुछ को अदालत ने छोड दिया.”

इसी जांच दल ने पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, आईपीएस अफ़सर एम के टंडन और पी बी गोंदिया को भी निर्दोष बताकर उनपे लगे आरोपो को बेबुनियाद बताया था. अदालत के कठघरे में भी जांच दल अपनी जांच सही होने का सबूत नहीं दे पाया.

दूसरी तरफ कमज़ोर जांच का फ़ायदा इस केस के अभियुक्त भाजपा के कॉरपोर्टेर बिपिन पटेल को हुआ जिन्हें शक का फ़ायदा दे के बरी किया गया, हालांकि विश्व हिन्दु परिषद के कार्यकर्ता अतुल वैध्य सहित सभी भाजपा कार्यकर्ताओं को सजा हुई.

गुलबर्ग हत्याकांड के वक्त पूरा दिन सोसायटी के सामने खड़े रहे स्थानीय पुलिस इंसपेक्टर के जी एरडा को भी अदालत ने शक का फ़ायदा दिया और बरी किया.

नरोदा हत्याकांड में भी कुछ एसा ही हुआ, लेकिन नरोदा कांड में भाजपा की मंत्री माया बहन कोडनानी और बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी को भी सजा हुई, इस बारे में एक भाजपा नेता ने नाम नहीं बताने की शर्त के साथ बताया था की 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की भाजपा के द्वारा घोषणा हुई उस सूची में मायाबहन कोडनानी का नाम नहीं था.

इस भाजपा नेता के मुताबिक़, नरेन्द्र मोदी कोडनानी को टिकट देना चाहते नहीं थे, लेकिन कोडनानी के लालकृष्ण आडवाणी के साथे संबंध होने कारण बाद में उन्हें टिकट देना पड़ा और मंत्रीमंडल में भी उन्हें स्थान देना पड़ा, बस इसकी क़ीमत 2009 में उन्होंने चुकाई और जांच दल ने उन्हें अभियुक्त बना दिया.

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