आ ही गया एक रुका हुआ फ़ैसला...

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चौदह साल, तीन महीने और सत्रह दिन पहले दंगाइयों ने अहमदाबाद में गुलबर्ग सोसायटी नाम की एक रिहायशी इमारत में आग लगा दी थी जिसमें 69 लोगों की मौत हो गई थी.

उस वारदात के लिए अदालत ने 11 लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी. एक मुजरिम को 10 साल की और 12 को सात-सात साल की क़ैद दी गई है.

अदालत का ये फ़ैसला ऐतिहासिक है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में बिरले ही ऐसे मौक़े आए हैं जब धार्मिक फ़साद के दौरान हुए क़त्ल-ए-आम के दोषियों को सज़ा मिली हो.

ये छोटी उपलब्धि नहीं है कि गुजरात में 2002 में हुई हिंसा के मामलों में अब तक एक दर्जन से अधिक मुक़दमों में सवा सौ से ज़्यादा मुजरिमों को आजीवन कारावास की सज़ा मिल चुकी है.

सभी मुक़दमों में ये ज़ाहिर हुआ है कि कई दोषी दंगाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके घटक, जैसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हुए थे.

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इन दोषियों में सबसे चर्चित गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडनानी हैं, जिन्हें 91 लोगों के नरसंहार के आरोप में 28 वर्ष की सज़ा पहले ही सुनाई जा चुकी है.

तो क्या गुजरात के दंगा पीड़ितों को अदालत से इंसाफ़ मिल रहा है? सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ का मानना है कि अदालत का फ़ैसला निराश करता है.

थोड़ी देर पहले उन्होंने मुंबई से फ़ोन पर कहा, "अदालत ने सज़ा ज़रूर सुनाई है लेकिन ये कह कर केस को कमज़ोर कर दिया है कि आगज़नी करने वालों ने साज़िश नहीं रची थी."

तीस्ता की संस्था सिटिज़ेंस फ़ॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने पीड़ितों की मदद करते हुए पिछले 14 सालों में कई मुक़दमे लड़े हैं.

उन्हीं की कोशिशों के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने कई मुक़दमे अपनी निगरानी में चलवाए. कुछ मुक़दमे गुजरात से बाहर की अदालतों में भी भेजे.

इसके चलते तीस्ता का भाजपा-आरएसएस से छत्तीस का आँकड़ा रहा है. एक दिन पहले ही केंद्र सरकार ने सीजेपी का विदेशी चंदा लेने का लाइसेंस रद्द कर दिया.

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गुजरात सरकार ने तीस्ता पर पीड़ितों से जमा किए गए चंदे में ग़बन करने के आरोप लगाए हैं.

उनकी गिरफ़्तारी पर फ़िलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई हुई है. गुजरात दंगों के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई सालों से तीस्ता के निशाने पर हैं.

2002 में जब राज्य में हुए दंगों में एक हज़ार से ज़्यादा मुसलमान मारे गए थे, तो नरेंद्र मोदी वहाँ के मुख्यमंत्री थे.

गुलबर्ग सोसायटी के जिस मकान में आग लगाई गई थी वो एहसान जाफ़री नाम के एक पूर्व सांसद का था.

आग में मरने वाले उनके यहाँ शरण पाए घबराए हुए मुसलमान थे, जिनमें औरतें और बच्चे भी थे.

जब जाफ़री की विधवा ज़ाकिया ने आरोप लगाया कि मोदी ने जानबूझकर दंगों करवाए तो सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष पुलिस टीम गठित करके जाँच करवाई.

2012 में इस टीम ने मोदी के ख़िलाफ़ आरोपों को बेबुनियाद कह दिया. इसके बाद धारणा बन गई है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी को दंगे होने देने के आरोप से बरी कर दिया है. लेकिन ये धारणा ग़लत है.

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जाँच टीम ज़रूर सर्वोच्च न्यायालय ने बनाई लेकिन उसकी रिपोर्ट निचली अदालत में जमा हुई थी.

उस रिपोर्ट के ख़िलाफ़ ज़ाकिया जाफ़री की अपील गुजरात उच्च न्यायालय में सुनी जा रही है.

वहाँ से जो भी फ़ैसला होगा उसके बाद ही रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के सामने आएगी.

गुलबर्ग सोसायटी के हत्याकांड का फ़ैसला भले ही आ गया है. लेकिन मोदी के ख़िलाफ़ ज़ाकिया जाफ़री का मुक़दमा अभी जारी है.

देशभर में मुसलमानों की नज़र उस मुक़दमे पर टिकी है, उसका नतीजा आने में चाहे कितने ही साल लग जाएँ.

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