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शुक्रवार, 17 अप्रैल, 2009 को 17:24 GMT तक के समाचार
 
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कितना कारगर सर्वजन हिताय का नारा
 

 
 
मायावती पोस्टर
मायावती ने 'सर्वजन हिताय' और 'दलित ब्राह्मण भाईचारा' का नारा देकर बहुमत प्राप्त किया था
लखनऊ से इलाहाबाद जाने के लिए इस बार मैंने अमेठी प्रतापगढ़ वाला रास्ता चुना.

अमेठी से प्रतापगढ़ जाने वाली सड़क इतनी बढ़िया बनी है कि क्या कहना. प्रतापगढ़ में गड़वारा क्षेत्र के तेज़तर्रार बहुजन समाज पार्टी विधायक ब्रजेश मिश्र सौरभ का कहना है कि यह सड़क उन्होंने बड़ी मेहनत से बनवायी है.

प्रतापगढ़ ब्राह्मण बहुल क्षेत्र है और उस पुरानी बसपा का क्षेत्र भी जहाँ सभा शुरू होने से पहले ऊंची जातियों से उठ कर चले जाने को कहा जाता था.

स्थानीय पत्रकार धीरेन्द्र द्विवेदी मुझे याद दिलाते हैं कि एक ज़माने में यहाँ चैतूराम की नौटंकी हुआ करती थी जिसमें नारा दिया जाता था, " तिलक तराज़ू और तलवार, इनको मारो जूते चार."

लेकिन जब बसपा नेतृत्व ने महसूस किया कि केवल दलित या बहुजन के सहारे बहुमत नहीं मिल सकता तो रणनीति बदली गयी.

चैतूराम पता नहीं कहाँ चले गए और नया नारा आया, " हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है."

यह नारा इतना ज़ोर से चला कि यहाँ से तीन तीन ब्राह्मण बसपा से जीत कर विधायक हो गए. बहुत बड़ी सफलता थी यह जिसकी बदौलत लखनऊ में बहनजी की सरकार बनी.

सोशल इंजीनियरिंग

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने दो साल पहले 'सर्वजन हिताय' और 'दलित ब्राह्मण भाईचारा' का नारा देकर विधानसभा में बहुमत प्राप्त कर सरकार बनाई थी.

अब दो साल बाद उन्हीं के शासन में लोकसभा चुनाव हो रहे हैं.

मायावती ने इस बार सर्वाधिक 20 यानी एक चौथाई ब्राह्मणों को टिकट दिया है. मायावती सोशल इंजीनियरिंग का फ़ार्मूला फिर से आज़मा रही हैं.

 कांग्रेस ने यहाँ पूर्व सांसद रत्ना सिंह को खड़ा किया है जो स्वर्गीय राजा दिनेश सिंह की बेटी हैं. दिनेश सिंह इंदिरा जी के क़रीबी और भारत के विदेश मंत्री थे
 

अपने इस दौरे में मैं यही जानना चाहता था कि इस बार लोकसभा में बहुजन समाज पार्टी का "सर्वजन हिताय" का नारा कितना काम कर रहा है, जबकि दो साल से बहन जी हुकूमत कर रही हैं.

सन 2004 में प्रतापगढ़ में समाजवादी पार्टी के अक्षय प्रताप सिंह कांग्रेस की रत्ना सिंह को हराकर जीते थे.

परिसीमन में प्रतापगढ़ के दो विधानसभा क्षेत्र कुंडा और बिहार गंगा पार की कौशाम्बी सीट से जुड़ गई हैं इसलिए माना जाता है कि यहाँ की राजनीति में राजा भैया का वर्चस्व कम हो गया है.

मगर समाजवादी पार्टी यह सीट नहीं छोड़ना चाहती थी. यह एक प्रमुख कारण था जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी का तालमेल कांग्रेस से नही हो पाया.

कांग्रेस ने यहाँ पूर्व सांसद रत्ना सिंह को खड़ा किया है जो स्वर्गीय राजा दिनेश सिंह की बेटी हैं. दिनेश सिंह इंदिरा जी के क़रीबी और भारत के विदेश मंत्री थे.

चाय की दुकान

इस बार बहुजन समाज पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी से दल बदल कर आए एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शिवाकांत ओझा को प्रतापगढ़ से अपना उम्मीदवार बनाया है. भाजपा से लक्ष्मी शंकर पांडे उम्मीदवार हैं.

मायावती का पोस्टर
बीएसपी नेतृत्व को लगा कि सिर्फ़ दलितों के सहारे बहुमत नहीं मिलेगा तो नया नारा आया, "हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है."

शाम क़रीब पाँच बजे का वक़्त हो चला था. लंच न कर पाने के कारण मुझे भूख लगी थी. तभी मुझे कुछ लोग जानवर चराते दिखे. पास में एक चाय की दुकान पर कई लोग बैठे गप मार रहे थे.

पास जाने पर पता चला कि यह पंडित जी की चाय की दुकान है और वहां बैठे सभी लोग ब्राह्मण हैं. यह अम्बेडकर ग्राम सभा लोहंगापुर है जहाँ तीन हज़ार मतदाता हैं.

चाय का आर्डर देने के बाद मैंने सीधे मुख्य मुद्दा सामने रख दिया. बीएसपी की सोशल इंजीनियरिंग इस चुनाव में काम कर रही है या नहीं? एक बुज़ुर्ग ने बात बढ़ाई, "ब्राह्मण बहुत कम देंगे अबकी". मैंने पूछा, "क्यों?"

फिर तो सब बोलने लगे. हर किसी के पास कुछ न कुछ दर्द था. सारांश में कहें तो लोग मायावती के दो साल के कार्यकाल से नाराज़ थे. उनका कहना है कि सर्वजन का नारा अब काम नहीं कर रहा है.

प्रशासन पर पकड़

एक बुज़ुर्ग ने कहा, "मायावती की इससे पहले वाली सरकार का काम देख कर वोट दिया था. पर अब उसमें कमी दिखाई दे रही है."

मुख्य बात यह कि मायावती अब वैसी तेज़तर्रार नहीं, प्रशासन पर पकड़ नहीं रह गई है.

 लोगों ने माना कि मुलायम राज की तुलना में गुंडई कम हुई है लेकिन लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में माफ़िया टाइप लोगों को खड़ा करके मायावती ने अपने वादे को बेअसर कर दिया है
 

एक अन्य ने शिकायत की, "छोटों की सुनी नहीं जा रही है, घूसख़ोरी बढ़ गयी है, नेताओं की सुनी नहीं जा रही है, अफ़सर उन पर भारी हैं. वे केवल वही करते हैं जो मायावती कहती हैं."

कहने का मतलब ये कि स्थानीय बसपा कार्यकर्ता या नेता जनता को कोई फ़ायदा या राहत दिलाने की स्थिति में नहीं हैं.

पुलिस से ख़ास शिकायत है, "फ़ोर्स वाले आते हैं, जनता को प्रताड़ित करते हैं. बोला जाए तो कहते हैं, जाइए जो करना है कर लीजिए."

इन लोगों ने माना कि मुलायम राज की तुलना में गुंडई कम हुई है लेकिन लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में माफ़िया टाइप लोगों को खड़ा करके मायावती ने अपने उस नारे- 'चढ़ गुंडों की छाती पर बटन दबेगा हाथी पर' को बेअसर कर दिया है.

एक बुज़ुर्ग ने ज़ोर ज़ोर से शिकायत की कि मायावती के राज में वैट लगने से गुड़ और सुरती जैसी चीज़ों की भी महंगाई बहुत बढ़ गयी है.

वरुण गांधी का मुद्दा भी इन लोगों के बीच मायावती के ख़िलाफ़ जा रहा है. उनका कहना था, "वरुण ने ऐसा क्या अपराध किया कि रासुका लगा दिया. फिर एक माँ को जेल में बेटे से मिलने क्यों नहीं दिया."

हाथी या गणेश

यह सब बातें हो रही थीं तभी मोटर साइकिल सवार बसपा के समर्थक ब्राह्मण ने ज़ोर से नारा लगाया. "हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है".

दूसरे लोगों ने जवाब दिया, "जा जा वही देइहैं जे हाथी की सवारी करके गुलछर्रे उड़ावत हैं."

  बग़ल में ठाकुर साहब का बड़ा पक्का मकान था. दरवाज़े पर कार खड़ी थी. उनका कहना था- जब पूरे प्रदेश में जाति का बोलबाला है तो हम भी जाति पर जाएंगे
 

एक बुज़ुर्ग ने कहा, "अबकी उसी को देंगे जिसकी केंद्र में सरकार है, यानी कांग्रेस".

इन सबका मानना था कि लड़ाई इस बार कांग्रेस और बसपा की है, हालाकि वहां मुलायम सिंह की पार्टी का भी एक समर्थक था.

इन लोगों से बात करके मैं दूसरे टोले यानी दलित बस्ती में गया. इनमें से केवल एक ने गाँव का माहौल देखते हुए कांग्रेस के समर्थन की बात कही जबकि बाकी सबका कहना था कि हम तो हाथी के ही साथी रहेंगे. उनके लिए, "बहन जी जो कर रही हैं, वही बहुत है."

फिर एक ने कहा, " वह काम करें या न करें बिरादरी की हैं इसलिए वोट तो देंगे ही खुल्लम खुल्ला, किसी का डर नहीं है."

वहीं बगल में ठाकुर साहब का बड़ा पक्का मकान था. दरवाजे पर कार खड़ी थी. उनका कहना था, "जब पूरे प्रदेश में जाति का बोलबाला है तो हम भी जाति पर जाएँगे."

लेकिन उनकी दुविधा थी कि दो दो क्षत्रिय खड़े हैं. कांग्रेस से और समाजवादी पार्टी से भी.

इनका निजी रुझान इस बार कांग्रेस की रत्ना सिंह की तरफ़ है क्योंकि उनकी छवि साफ़ सुथरी है. और इससे ज़्यादा शायद इसलिए कि उनके अवसर ज़्यादा हैं और केंद्र में कांग्रेस ही सत्ता की दावेदार है.

ब्राह्मणों की नाराज़गी

दिलचस्प बात यह दिखी कि ब्राह्मण प्रत्याशी देने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी प्रतापगढ़ में बसपा से ब्राह्मणों की नाराज़गी का फ़ायदा नहीं ले पा रही क्योंकि उसके उम्मीदवार के चुनाव का माहौल नहीं बन पाया.

 यह बात भी ध्यान रखने की है कि मायावती की पिछली सरकार भाजपा के साथ थी. अटल जी दिल्ली में प्रधानमंत्री थे इसलिए भाजपा ने मंत्रियों के माध्यम से सवर्णों को सत्ता में भागीदारी भी दी थी और उनकी सुनवाई भी होती थी
 

पिछले विधानसभा चुनाव में मैं उन्नाव गया था और देखा था कि वहां दलित-ब्राह्मण गठजोड़ काम कर रहा था. न केवल ब्राह्मण बल्कि अन्य सवर्ण और मध्यमवर्गीय वोटरों ने पिछली बार ग़ुंडों माफ़िया पर क़ाबू और नौकरशाही पर लगाम कसकर चुस्त सरकार की उम्मीद में मायावती का साथ दिया था.

यह बात भी ध्यान रखने की है कि मायावती की पिछली सरकार भाजपा के साथ थी.

अटल जी दिल्ली में प्रधानमंत्री थे इसलिए बीजेपी ने मंत्रियों के माध्यम से सवर्णों को सत्ता में भागीदारी भी दी थी और उनकी सुनवाई भी होती थी.

इस बार बसपा में सवर्ण विधायक तो ख़ूब हैं, मंत्री भी हैं, पर मुख्यमंत्री मायावती ने सारी ताक़त पंचम ताल पर अपने अधिकारियों को दे दी है और बसपा समर्थक सत्ता के क़रीब भी नहीं पहुँच पाते. फिर टिकट देने में बड़े बड़े और पैसे वालों को महत्व मिला है.

इस सबका सीधा असर चुनाव पर पड़ रहा है. लेकिन पिछली विधानसभा की तरह इस बार सपा और बसपा की लड़ाई नही है और इसलिए सत्ता विरोधी रुझान का सीधा लाभ सपा को नहीं मिल रहा.

माया से निराश मतदाता राष्ट्रीय दलों की तरफ झुक रहा है. कौन कितना फ़ायदा पाता है कितना नहीं यह उसके उम्मीदवार और संगठन की क्षमता पर निर्भर है.

 
 
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