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शनिवार, 18 अप्रैल, 2009 को 05:13 GMT तक के समाचार
 
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फ़िल्म और राजनीति साथ चलाऊंगा
 

 
 
प्रकाश झा
प्रकाश झा ने इससे पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं

बिहार की समस्यायों को कहानी में पिरोकर गंगाजल, अपहरण और शूल जैसी सफ़ल फ़िल्में बनाने वाले प्रकाश झा ने इस बार सीधे तौर पर बिहार की राजनीति में दाँव लगाया है.

वो लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर पश्चिमी चंपारण लोकसभा क्षेत्र से किस्मत आज़मा रहे हैं और उनके भाग्य का फ़ैसला जनता 23 अप्रैल को करने वाली है.

उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ही बीबीसी से लंबी बातचीत की और कहा कि फ़िल्म से राजनीति को ओर आना कोई गुनाह नहीं है. वो कहते हैं कि एक्टर राजनीति में टिकाऊ नहीं साबित हो पाएँ हैं लेकिन वो निर्माता – निर्देशक हैं.

आप किन मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं?

पिछले पाँच वर्षों में मैंने सिर्फ़ विकास चाहा है. और वो भी सिर्फ़ बेतिया के लिए नहीं बल्कि पूरे बिहार के लिए. पिछले चुनाव के बाद से ही सांसद न होते हुए भी मैंने जो किया है, उसका हिसाब किताब आपको जनता दे देगी.

मैंने अपने प्रयास से मोतिहारी और बेतिया के अस्पतालों का जिर्णोद्धार किया. हमने मेहनत की. हमारे साथ बहुत सारे लोग आगे आए. मैं ये बता दूं कि जब नीतीश जी की सरकार आई तो उसमें ध्यान दिया गया. मेरे काम का असर हुआ है.

आपके नीतीश कुमार से अच्छे संबंध रहे हैं. फिर क्या सोच कर लोक जनशक्ति पार्टी का दामन थामा?

इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश कुमार के साथ मेरे व्यक्तिगत संबंध बहुत अच्छे रहे हैं. मैंने ज़रूरत पड़ने पर उनका साथ दिया. उनकी जो पार्टी है, मैंने कभी ज्वाइन नहीं किया. मुझे तो पटना में उनकी पार्टी (जनता दल यूनाईटेड) का दफ़्तर कहाँ है, ये भी पता नहीं.

मेरा जो संबंध था वो था कि अच्छा काम करें, उस समय बिहार में चुनाव होने थे और राज्य में परिवर्तन की ज़रूरत थी. इसलिए हमने साथ दिया.

 आप यहां की बदहाली देख लीजिए. ऐसा कैसे हो सकता है कि आज़ादी के बाद भी अब तक चंपारण पर किसी का ध्यान नहीं गया. इसलिए मुद्दा सिर्फ़ विकास है.
 
प्रकाश झा

लेकिन अब मैं मानता हूँ कि उनकी सरकार में काम अच्छा होता है. लेकिन कागजी काम होता है. योजनाएँ बेहतर बनती हैं लेकिन उतरती नहीं है. मैं तो राज्य में हर उस नेता को समर्थन दूंगा जो विकास के लिए काम करेगा, चाहे नीतीश हो, लालू हों या राम विलास पासवान.

आप मानते हैं कि सिर्फ़ विकास ही इस चुनाव में मुद्दा है?

ज़ाहिर है. आप यहां की बदहाली देख लीजिए. ऐसा कैसे हो सकता है कि आज़ादी के बाद भी अब तक चंपारण पर किसी का ध्यान नहीं गया. इसलिए मुद्दा सिर्फ़ विकास है.

कांग्रेस का कहना है कि सेक्युलर पार्टी होने के नाते अल्पसंख्यकों का वोट उसे मिलेगा. आपके क्षेत्र में अल्पसंख्यक समुदाय की बड़ी आबादी है. आप क्या कहेंगे?

हमारे क्षेत्र में सभी की सभी जातियाँ और मुसलमान विकास के मुद्दे पर आगे आए हैं. पहली बार यहां के लोग विकास के मुद्दे पर वोट देंगे.

साधु यादव आपके दो मुख्य प्रतिद्वंद्वियों में से एक हैं और वो आप पर ‘बंबइया’ हीरो यानी बाहरी होने का आरोप लगाते हैं?

लोगों की आँखों में साधु जी के कामों का ब्यौरा होगा तो ही तो उन्हें वोट मिलेगा. जहां तक बाहरी होने का सवाल है तो यहां की जनता से पूछिए. मेरा गांव जहां खड़ा हूँ उससे बस थोड़ी दूर पर है. मेरी जन्मस्थली है ये. साधु यादव कैसे लोकल हो गए. पूछिए वो कहां से आए हैं, यहां चुनाव लड़ने. वो गोपालगंज के हैं और पहले से भगोड़े हैं.

मुंबई में फ़िल्म से जुड़े हैं, यहां चुनाव लड़ रहे हैं, कैसे समन्वय बना पाएंगे?

क्यों नहीं बना पाएंगे. एक फ़िल्म में बारह यूनिट होते हैं, अभी पांच क्षेत्रों में काम कर रहा हूँ, तो कैसे कर रहा हूं. ये सारे काम मैं एक साथ कर सकता हूं. मेरा तो कनसेप्ट देने का काम है और धन प्रबंधन का काम है, बाकी जनता का सहयोग मिलेगा.

ज़रुरत है प्रतिबद्धता की. इसमें मेरा फ़िल्मी करियर आड़े नहीं आएगा. वैसे भी राजनीति का रुप बदलना चाहिए.

मैंने जो फ़िल्में बनाई हैं, जैसे दामुल, शूल, गंगाजल, अपहरण इन सभी फ़िल्मों में मैंने बिहार की सामाजिक परिस्थितियों और युवाओं की समस्यायों से अवगत कराया है.

फ़िल्मी नायक-नायिकाएं तो आसानी से राजनीति में प्रसिद्धि पा जाते हैं लेकिन आपको लगता है कि फ़िल्म निर्माता होने के कारण तुलनात्मक रुप से थोड़ी दिक्कत होती है. आप पिछला चुनाव हार गए थे?

मुझे ऐसा नहीं लगता. पता नहीं कैसे एक्टर कैसे आगे बढ़ जाते हैं. ये जनता के साथ मिल कर काम करने वाला पेशा है. जिनके पास कमिटमेंट नहीं है, उन्हें नहीं आना चाहिए राजनीति में.

इसलिए आप देखिए तो एक्टर ज़्यादा दिनों तक टिक नहीं पाते. लेकिन मेरा तो जुड़ाव रहा है जनता से.

 
 
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