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मंगलवार, 12 मई, 2009 को 16:22 GMT तक के समाचार

सुनील रामन
बीबीसी संवाददाता, तमिलनाडु से लौट कर

तमिलनाडु में श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा अहम

भारत में कुछ चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, तो कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर. लेकिन दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में श्रीलंका में 'तमिलों की दुर्दशा' एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना गया है.

राज्य की राजनीति पर पिछले चार दशक से दो क्षेत्रीय पार्टियाँ द्रविण मुनेत्र कषगम (डीएमके) और अन्नाद्रुमक (एआईएडीएमके) क़ाबिज़ है और चुनावी मुहिम के दौरान इन पार्टियों ने श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाया है.

दोनों पार्टियाँ इस मुद्दे पर बाज़ी मारने की कोशिश में हैं और मतदाताओं को अपने वादे के ज़रिए बताने में लगे हुए हैं कि 'वे ही श्रीलंकाई तमिलों के हित की रक्षा कर सकते हैं'.

पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार का चुनावी रंग बिल्कुल अलग है. तमिलनाडु जो होर्डिंग और कटआउट के लिए जाना जाता है, इस बार चुनाव आयोग और अदालती फ़ैसले की वजह से ये चीज़ें नहीं दिख रही हैं.

वादों और आश्वासनों की होड़

राजनीतिक पार्टियों को टेलीविज़न, न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिनमें अधिकतर के मालिक इन्हीं राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हैं और ये ही मीडिया हर रोज़ तमिलों से जुडे वादों और आश्वासनों की होड़ को बता रहे हैं.

दोनों पार्टियों में राजनीतिक होड़ का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर अन्नाद्रमुक की नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता एक दिन के भूख हड़ताल पर बैठतीं तो मौजूदा मुख्यमंत्री और डीएमके नेता करुणानिधि बिना मौक़ा गँवाए वैसा ही कर बैठते हैं.

जयललिता ने ज्यों ही वादा किया कि श्रीलंका में अलग तमिल राष्ट्र के गठन के लिए सेना भेजा जाएगा. उस समय 84 वर्षीय करूणानिधि अस्पताल में थे, लेकिन बिना कोई वक़्त बर्बाद किए वादा कर डाला कि तमिलों के लिए 'वो अपनी पूरी ताक़त' झोंक देंगे.

जयललिता तमिल मुद्दे पर डीएमके पर भी निशाना साधने से नहीं चूकतीं, क्योंकि डीएमके केंद्र की गठबंधन सरकार में शामिल हैं. जयललिता के अनुसार 'शुरुआत में ही संघर्ष विराम सुनिश्चित करने में भारत निष्क्रिय रहा'.

जयललिता अपने भाषणों में कहती हैं, "क्या भारत सरकार ने तमिलों के हितों को देखा, जबकि वो पहले भी संघर्ष विराम करा सकती थी और हज़ारों क़ीमती ज़िंदगियाँ बचाई जा सकती थीं."

तुग़लक पत्रिका के संपादक चो रामास्वामी का मत बिल्कुल भिन्न है, उनका कहना है, "राजनीतिक पार्टियों में इस बात को कहने की हिम्मत नहीं है कि श्रीलंकाई तमिलों का मामला चुनावी मुद्दा नहीं है."

रामास्वामी कहते हैं कि यदि राज्य की सत्तारुढ़ गठबंधन डीएमके और कांग्रेस हार जाती है तो हो सकता है कि वो इसकी वजह तमिल मुद्दों को बताएँ, लेकिन बहुत से लोगों के लिए ये कोई मुद्दा नहीं है.

भारत में तमिलनाडु ही ऐसा राज्य है जिनके लोगों का जातीय जुड़ाव श्रीलंकाई तमिलों से है और ऐसे में राजनीतिक पार्टियाँ इसका फ़ायदा उठाने की कोशिश में हैं, ताकि मतदाताओं को लुभाया जा सके. लेकिन देखने वाली बात होगी कि मतदाताओं पर इसका कितना असर पड़ता है.

श्रींलंका की स्थिति पर नज़र

तमिलनाडु के शहरों और देहात में घूमने के बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि यह मामला आम लोगों में भावनात्मक रुप ले चुका है. भारत के दूसरे राज्यों से अलग तमिलनाडु के लोग श्रींलंका की स्थिति पर पैनी नज़र रखते हैं.

आम लोग उत्तरी श्रीलंका की स्थिति से काफ़ी जुड़े हुए हैं जबकि मीडिया और नेताओं का ध्यान पीड़ित आम जनों पर रहना निश्चित है.

ये देखना बड़ा दिलचस्प है कि जिनकी रोज़ाना की आमदनी 50 रुपए से कम है वो भी श्रीलंका की स्थिति से परिचित हैं.

विलुपुरम ज़िले के इरैयूर गाँव में एक 65 वर्षीया महिला मज़दूर पार्वतम्मा को ज़रा कुरेदन पर उनका कहना था, "जब हमारे भाई मारे जा रहे हों तो भारत चुप कैसे रह सकता है?"

लेकिन जब चुनाव का सवाल आता है तो पार्वतम्मा बिना किसी देरी के महँगाई की शिकायत करती हैं.

उनका कहना है, "हमें सरकार के वादे के अनुसार एक रुपए किलो चावल मिल रहा है, लेकिन दाल 70 रुपये और टमाटर 14 रुपए किलो है, जबकि खाने का तेल ख़रीदना बूते से बाहर की चीज़ है."

उनकी जैसी भावनाएँ कईयों की थीं. चेंगलपेट में एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी अप्पास्वामी का कहना था कि तमिलों के साथ उनकी सहानुभूति है लेकिन तमिल होने के नाते नहीं बल्कि मानवता के नाते है.

लेकिन उनका कहना था कि दोनों पार्टियाँ इस मुद्दे को वोट के लिए उठा रही हैं.

चेन्नई में युवा पेशेवर चंद्रबोस का भी कहना था कि तमिलों का मुद्दा उठाना सिर्फ़ राजनीति है. उनके अनुसार वो उन मुद्दों से अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं जो उनके जीवन स्तर के सुधार में सहायक हों.