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शुक्रवार, 15 मई, 2009 को 04:39 GMT तक के समाचार

वंदना
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली से

पचास का आँकड़ा पार करेंगी महिला सांसद?

लोक सभा चुनाव के मतदान के बाद अब सभी पार्टियाँ राजीनिक जोड़-तोड़ में लगी हुई हैं. नतीजे क्या होंगे, किसकी झोली में कितनी सीटें जाएगी और कौन बनाएगा सरकार....सबको इसका इंतज़ार है.

इस सब के बीच ये देखना दिलचस्प होगा कि 15वीं लोक सभा में कितनी महिला सांसद अपनी उपस्थिति दर्ज करवा पाती हैं- क्या वे पचास का आँकड़ा पार कर पाएँगी?

पचास इसलिए क्योंकि राजनीतिक पिच पर अब तक के किसी भी लोकसभा चुनाव में महिला सांसद अर्धशतक नहीं बना पाईं हैं. महिला सांसदों की गिनती कभी 50 का आँकड़ा नहीं छू पाई.

2004 के लोक सभा चुनाव में 355 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था जिनमें से 45 चुनी गईं यानी केवल 8.3 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व.

1962 के बाद हुए लोकसभा चुनावों में से सबसे ज़्यादा महिलाएँ 1999 में चुन कर आई थीं- कुल 49 सासंद यानी अर्धशतक से एक कम.

पिछले आँकड़ों पर नज़र दौड़ाएँ तो (1984 को छोड़कर) 1996 से पहले हुए चुनावों में महिला सांसदों की गिनती 40 तक भी नहीं पहुँची थी. 1996 में 40 तो 1989 में 29 महिला सांसद चुनी गई थीं.

सबसे कम महिलाएँ 1977 में चुनी गई जब ये संख्या केवल 19 रह गई थी.

महिला सांसद

लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने वाला महिला आरक्षण विधेयक आज भी पारित होने का इंतज़ार कर रहा है.

इसमें महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित किए जाने की व्यवस्था है.

हालत ये थी कि जब पहली बार इसे 11वीं लोक सभा में पेश किया गया था तो इसकी प्रतियाँ फाड़ी गई थीं.

भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर कई महिला राजनेताओं का दबदबा रहा है लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि मायावती, जयललिता या ममता बैनर्जी जैसी नेताओं को छोड़कर ज़्यादातर का नाता किसी न किसी राजनीतिक परिवार से ही रहा है.

इस बार जिन महिलाओं ने लोक सभा चुनाव में किस्मत आज़माई हैं उनमें शामिल है- सोनिया गांधी, दलित नेता चौधरी दलबीर सिंह की बेटी कुमारी शैलजा (अंबाला से), भटिंडा से सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर, चितौरगढ़ से गिरिजा व्यास, शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले, सुनील दत्त की बेटी प्रिया दत्त और, विदिशा से सुषमा स्वाराज और ममता बैनर्जी.

15वें लोक सभा चुनाव में करीब 480 महिलाएँ मैदान में रहीं. कई राज्यों में एक भी महिला प्रत्याशी नहीं थी हिमाचल जैसे राज्य में महिलाएँ हर मायने में काफ़ी सक्रिय मानी जाती हैं. लेकिन यहाँ किसी भी पार्टी ने महिलाओं को उम्मीदवार नहीं बनाया.

लेकिन इस सब के बीच उम्मीद की एक हल्की किरण कहीं कहीं नज़र आ रही है. मसलन हरियाणा जो अकसर बेहद कम लिंग अनुपात के लिए सुर्खियाँ बटोरता है. लेकिन इस बार वहाँ रिकॉर्ड 14 महिला उम्मीदवार थीं. 1967 में जब पहली बार हरियाणा में लोकसभा चुनाव हुए थे तो केवल एक महिला ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था.

विभिन्न पार्टियों के घोषणापत्रों पर नज़र डालें तो ये मुद्दा ज़रूर शामिल होता है कि महिलाओं को राजनीति में और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.

लेकिन ज़मीनी स्तर पर तब तक बदलाव नहीं आ सकता जब तक राजनीतिक इच्छा शक्ति और सामाजिक सोच में बदलाव के बूते पर ये बातें दस्तावेज़ों से निकलकर हकीकत नहीं बन जाती.

अभी बहुत ज़्यादा उम्मीद करना तो बेमानी होगा. इस दफ़ा तो देखना इतना है कि राजनीतिक पिच पर महिला सांसद अर्धशतक लगा पाती हैं या नहीं.