क्या ओबामा की यात्रा महज प्रतीकात्मक है?

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भारत में इस बार 26 जनवरी 2015 को लेकर काफी गहमागहमी है.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा इसी दिन गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि हैं.

जितनी गहमागहमी है उतनी ही ये जानने की उत्सुकता भी है कि बराक ओबामा की भारत यात्रा का भारत और अमरीका के आपसी संबंधों के लिहाज से क्या महत्व है.

सवाल उठ रहे हैं कि इस यात्रा से दोनों देशों के मैत्री संबंध गहरे और स्थाई बनेंगे या ये यात्रा महज़ प्रतीकात्मक रहेगी?

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अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ये है कि पहली बार भारत ने गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि होने का सम्मान अमरीका के किसी राष्ट्रपति को दिया है.

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तो इससे सबसे ज्यादा ये बात जाहिर होती है कि भारत और अमरीका के बीच सहज मैत्री संबंध विकसित हो रहे हैं.

भारत में अमूमन 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर दो तरह की शख्सियतों को बुलाने की परंपरा रही है.

पहली तो वे जिनके अतिथि के रूप में भारत आने से किसी तरह का विवाद पैदा होने की आशंका न हो और दूसरी वे जो उन देशों से संबंध रखते हैं जिनके भारत से नजदीकी रणनीतिक संबंध हैं.

भारत ने पहली वजह से अब तक न तो पाकिस्तान और न ही चीन के किसी राष्ट्र प्रमुख को बुलाया और दूसरी वजह से किसी लातिनी अमरीकी देश के प्रमुख को निमंत्रण नहीं दिया.

मुख्य अतिथि

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किसी अमरीकी राष्ट्रपति के पहली बार मुख्य अतिथि के रूप में भारत के गणतंत्र दिवस पर आने के खास निहितार्थ हैं.

सबसे पहले तो इससे अमरीका-भारत संबंधों की उस जटिलता का पता चलता है जो कुछ दिन पहले तक दोनों देशो के संबंधों पर हावी रही.

संबंधों की इसी जटिलता का असर है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के मुखिया को अपने राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस में आमंत्रित करने में सात दशक लग गए.

गणतंत्र दिवस भारत के एक पूर्ण संवैधानिक लोकतांत्रिक देश होने का प्रतीक है.

संकेतात्मक यात्रा?

पिछले साल सितंबर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमरीकी दौरा और राष्ट्रपति ओबामा से उनकी मुलाकात कई मायनों में सार्थक रही.

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उस मुलाकात ने भारत-अमरीकी संबंधों में आए लंबे ठहराव को खत्म करने के लिए सकारात्मक माहौल पैदा किया.

फिर तुरंत नवंबर में म्यांमार में ईस्ट एशिया सम्मिट में दोनों राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात हुई.

दोनों देशों के अधिकारियों ने माना कि अमरीका और भारत के मैत्री संबंधों को एक मुकाम तक ले जाने के लिए ये समय कम है.

इसके बाद ये उम्मीद की जाने लगी कि जल्द ही दोनों देश महत्वपूर्ण एजेंडे पर पहल करेंगे.

गणतंत्र दिवस के मौके पर ओबामा के भारत आने से अमरीका के साथ उसके संबंधों पर क्या और कितना असर होगा वह इस बात पर निर्भर करता है कि रक्षा, ऊर्जा और चरमपंथ से मुकाबला के मुद्दे पर दोनों देश किस हद तक जाते हैं.

रक्षा, ऊर्जा और चरमपंथ से मुकाबले का मसला लगभग हर देश की सरकार के लिए गंभीर अर्थ रखता है.

इन मुद्दों पर होने वाली बातचीत से दो देशों के बीच मैत्री संबधों की गहराई का पता चलता है.

सियासी रुकावटें

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सबसे पहले बात करते हैं, रक्षा के मुद्दे पर भारत और अमरीका की चर्चा में क्या हो सकता है.

ओबामा के भारत दौरे के समय दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग और अहम रक्षा समझौते होने की संभावना जताई जा रही है.

रक्षा के क्षेत्र में हथियारों की खरीद और बिक्री की तुलना में हथियारों का नया जखीरा तैयार करने और विकसित करने में भारत और अमरीका का साझा प्रयास कम रहा है.

दोनों देशों में राजनीतिक और नौकरशाही से जुड़ी रुकावटों के कारण इस पर कई सालों से काम नहीं किया जा सका.

अमरीका ने भारत के सामने तकनीक और हथियार प्रणाली से जुड़े दर्जनों संभावित प्रस्ताव का खाका पेश किया है.

भारत की दिलचस्पी विशेष रूप से ड्रोन, कैरियर टेक्नोलॉजी आदि उन कार्यक्रमों में है जो उसके हवाई और समुद्री सुरक्षा तंत्र को और मजबूत कर सके.

हितों का टकराव

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जहां तक ओबामा और मोदी के बीच ऊर्जा क्षेत्र पर चर्चा की बात है तो यहां भारत और अमरीका दोनों के हित टकराते हैं. इसमें जीवाश्म ईंधन और जलवायु परिवर्तन के खतरे से जुड़ा मसला प्रमुख रूप से शामिल है.

मोदी और ओबामा दुनिया के दूसरे नेताओं के मुकाबले ग्लोबल वार्मिंग को ज्यादा तरजीह देते रहे हैं.

अमरीका भारत की अक्षय ऊर्जा, खासकर सौर ऊर्जा से जुड़े महत्वाकांक्षी परियोजना का मजबूत पैरोकार रहा है.

क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए सितंबर में भारत-अमरीका के बीच सहमति बनी.

अमरीका और भारत के बीच मैत्री संबंध गहरे और लंबे हों इसके लिए ओबामा चाहेंगे कि मोदी कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर जरूरी प्रतिबद्धता दिखाएं.

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर चीन ने हाल ही में समझौता किया है.

अमरीका से उम्मीद

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Image caption पिछले साल सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमरीकी दौरा कई मायनों में सार्थक रहा.

भारत जीवाश्म ईंधन से बिजली उत्पादन करने के मामले में पीछे है.

सस्ते प्राकृतिक गैस के लिए भारत की अमरीका से उम्मीदें बढ़ती जा रही है. वह काफी समय से अमरीका पर इसके दीर्घकालिक आयात के लिए दबाव डालता रहा है.

ऐसे में संभव है कि अमरीका बदले में ये चाहे कि भारत अपना दोषपूर्ण परमाणु उत्तरदायित्व कानून (न्यूक्लीयर लाएबिलिटी लॉ) बदले.

क्योंकि इस कानून के कारण ऊर्जा की कमी से जूझ रहे भारत को रिएक्टर्स बेचने के अमरीका और दूसरे देशों के रास्ते में अड़चनें पैदा हो रही हैं.

इस तरह का कोई मसला इस यात्रा में हल नहीं होने वाला लेकिन इस पर संवाद जरूर होगा.

खुफिया तंत्र की साझेदारी

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अब तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है चरमपंथ से मुकाबला. भारत और अमरीका के संबंधों की गहराई जानने में चरमपंथ से मुकाबला एक बेहतर जरिया है. ऐसा दो कारणों से है.

पहला, अमरीका और पाकिस्तान के बीच खुफिया मामलों में बढ़ते सहयोग से भारत हमेशा से चिंतित रहा है.

ऐसे में भारत और अमरीकी खुफिया एजेंसियां जितना अधिक मिलकर काम करेंगी द्विपक्षीय संबंधों पर पाकिस्तान का असर उतना ही कम होता चला जाएगा.

चरमपंथ के मसले पर भारत और अमरीका में पहले से ही उच्च स्तर पर खुफिया साझेदारी होती रही है.

विशेष रूप से, जब यूरोपीय सरकार अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी यानि एनएसए के बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के खुलासे के बारे में शिकायत कर रहा था, चरमपंथ से जूझ रहे भारत की कथित तौर पर ये इच्छा थी कि एनएसए छिप कर बात सुनने (इव्सड्रॉपिंग) की अपनी गतिविधि तेज करे.

साईबर सुरक्षा

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साईबर सुरक्षा का क्षेत्र ऐसा है जहां भारत और अमरीका दोनों कदम से कदम मिला कर काम कर रहे हैं.

भारत जितना अधिक कनेक्टेड हो रहा है वह साइबर मामले में अपनी कमजोरियों के प्रति उतना ही अधिक सचेत हो रहा है.

उसे इस मामले में अंतरराष्ट्रीय समर्थन की जरूरत का महत्व समझता है.

हालांकि गणतंत्र दिवस पर होने वाली ओबामा-मोदी की मुलाकात के जो भी नतीजे सामने आएंगे वे दोनों देशों के बीच बड़ी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेंगे.

निजी एजेंडा

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मोदी और ओबामा दोनों का ध्यान घरेलू या निजी एजेंडे पर सबसे अधिक है. भारत और अमरीका दोनों के लिए उसकी आर्थिक और सामाजिक एजेंडे के सामने विदेश नीति मायने नहीं रखती.

जहां तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर अमरीकी नीतियों की बात है तो दोनों देश में कुछ मतभेद है.

जबकि पूर्वी एशिया और चीन के मामले में दोंनो पक्षों की रुचि है.

दिल्ली के राजपथ पर जब राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होंगे तो उनके एजेंडे में ये बातें सबसे महत्वपूर्ण नहीं रहेंगी.

अंत में भारत और अमरीका के बीच जो मतभेद हैं वे किस हद तक दूर होंगे ये तो इस यात्रा के खत्म होने के बाद ही पता चलेगा.

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