क्या भ्रष्टाचार हमारा स्वभाव बन चुका है?

बीबीसी इंडिया बोल के पाठकों और श्रोताओं का एकबार फिर स्वागत है. इसबार हमने आपको यह ज़िम्मेदारी दी कि अगले अंक यानी 27 अक्टूबर को प्रसारित होनेवाले कार्यक्रम का विषय आप लोग तय करें. इस बारे में ढेर सारे सुझाव आप लोगों की ओर से हमें मिले.

इनमें से एक सुझाव इसबार भी और पिछली बार भी कई लोगों ने सुझाया और वो है भ्रष्टाचार का. निश्चय ही भ्रष्टाचार एक बड़ा और गंभीर विषय है और इसपर बीबीसी कई मौकों पर आपसे रूबरू होता रहा है. पर इस बार बहस इसके छोटे से दिखनेवाले पर अधिक गंभीर पहलू पर.

इस बार हम प्रशासन या नेताओं या व्यापारियों के बजाय यह सवाल खुद से करें... पूछें कि क्या भ्रष्टाचार को हम स्वीकार चुके हैं. क्या भ्रष्टाचार भारतीय समाज का स्वभाव बन चुका है. क्या हम व्यक्तिगत रूप से भ्रष्ट हो चुके हैं या भ्रष्टाचार को स्वीकार कर चुके हैं.

ऐसे कितने मौके हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आते हैं जब हमें भ्रष्टाचार की किसी गतिविधि में चाहे-अनचाहे लिप्त होना पड़ता है. क्या हम इनका विरोध करते हैं, इनके ख़िलाफ़ लड़ते हैं या झुक जाते हैं, समर्पण कर देते हैं और भ्रष्टाचार को समाज की नियति मानकर अपने काम का रास्ता आसान करते हैं.

अपनी राय और प्रतिक्रिया ही नहीं, अपने अनुभव भी हमें लिख भेजें.

ऑनलाइन पर यह बहस अब आपके बीच है. अगली कड़ी में यानी 27 अक्टूबर, मंगलवार, भारतीय समयानुसार रात आठ बजे हम आपके बीच फिर होंगे रेडियो की इस विशेष प्रस्तुति के साथ.

रेडियो कार्यक्रम में शामिल होने के लिए टोल फ्री नंबर 1800-11-7000 पर फोन करके कार्यक्रम में लाइव शामिल हों. भारत के बाहर से जो लोग शामिल होना चाहते हैं, वे हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर संपर्क करें. आप टोल फ्री पर पहले से भी अपना संदेश रिकॉर्ड करा सकते हैं. इन्हें कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा. ऑनलाइन की प्रतिक्रियाएं भी होंगी रेडियो कार्यक्रम का हिस्सा.

तो इंतज़ार किस बात का. बोल, बीबीसी इंडिया बोल.

वर्चुअल की-बोर्ड

* का निशान जहाँ है वहाँ जानकारियाँ अवश्य दें

(अधिकतम 500 शब्द)

आपकी राय

निहाल रंजन

मैं बिलकुल पूरी तरह से सहमत हूँ कि भ्रष्ट्राचार हमारी आदत बन चुका है. घूस लेना, गिफ्ट लेना हमारी दिनचर्या में शामिल हो चुका है. यदि यह आदत हमारी नहीं बदली तो देश रसातल में चला जाएगा और हमें बरबाद कर देगा.

जगदीश शाह, हरिद्वार

भ्रष्ट्राचार हमारी आदत नहीं बल्कि मजबूरी है. आम आदमी हमेशा दो जून की रोटी की जुगाड़ में लगा रहता है. मैं समझता हूँ कि पूरी व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है. भ्रष्ट्र लोगों को कानून का कोई भय नहीं है इसलिए वे भ्रष्ट्राचार में लिप्त रहते हैं

सुनील कुमार गुप्ता, जम्मू

क्या भ्रष्टाचार हमारा स्वभाव बन चुका है? इसमें दो बातें है- दरअसल, भ्रष्टाचार हमारा स्वभाव बन चुका था लेकिन अब धीरे धीरे इससे उबर रहे है. जैसे -जैसे शिक्षा और मीडिया का प्रभाव समाज में बढ़ रहा है वैसे वैसे समाज में जागरूकता और दूरदर्शिता भी बढ़ रही है और अब सरकार भी सचेत हो गई है उसने भी भष्टाचार निरोधी संस्थाओं जैसे सीबीआई और आरटीआई एक्ट को मजबूत किया है वरना भ्रष्टाचार तो 1990 से पहले भी होते थे ,पर बहुत ही कम मामले प्रकाश में आते थे. जबसे मीडिया का निजीकरण हुआ और स्टिंग ऑपरेशन का दौर शुरू हुआ तब से भ्रष्टाचार में कमी आई है और भ्रष्ट्राचार के बड़े बड़े मामले भी सामने आये है. यही कारण है कि शहरों में गांवों की तुलना में भ्रष्टाचार कम है.

उमा शाला

शायद हां. कम से कम भारत, पाकिस्तान और नेपाल के लिए तो यह सच है

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

भ्रष्टाचार यूं तो सारे विश्व में ही व्याप्त है पर उन देशो में अधिक है जहां आबादी अधिक संसाधन कम, और भ्रष्टाचार के पनपने के मौके ज्यादा हैं . भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सरकारी नियम कमजोर हैं . भारत के संदर्भ में बात करे तो मै समझता हूं कि हम सदा से किसी न किसी से डर कर ही सही काम करते रहे हैं चाहे राजा से , भगवान से , या स्वयं अपने आप से . पिछले सालो मे आजादी के बाद से हमारा समाज निरंकुश होता चला गया . हर कही प्रगति हुई बस आचरण का पतन हुआ . नैतिक शिक्षा को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल जरूर किया गया पर जीवन से नैतिकता गायब होती जा रही है . धर्म निरपेक्षता के चलते धर्म का दिखावे का सार्वजनिक स्वरूप तो बढ़ा पर धर्म के आचरण का व्यैक्तिक चरित्र पराभव का शिकार हुआ . यह बात लोगो के जहन में घर कर गई कि सरकारी मुलाजिमो को खरीदा जा सकता है , कम या अधिक कीमत में . हाल के टेलीकाम घोटाले ने भ्रष्टाचार की इस चर्चा को पुनः सामयिक , प्रासंगिक बना दिया है , बीबीसी को बधाई कि इस मुद्दे पर विचार के लिये हमे प्रेरित किया

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