क्या वेश्यावृत्ति को क़ानूनी मान्यता दी जाए?

वेश्यावृत्ति दुनिया का सबसे पुराना पेशा बताया जाता है और यौनकर्मी सबसे पुराने पेशेवर. पर समाज के बीच सबसे ज़्यादा बुरा भी इसी पेशे को माना जाता है. यौनकर्मियों को अपने पेट के गुजारे के लिए शरीर बेचना पड़ता है.

असुरक्षित तरीकों से सेक्स, छिपकर काम करना और तरह-तरह की प्रताड़ना, शोषण से भी गुज़रना यौनकर्मियों की नियति बन जाती है. ऐसे में एक बहस हमेशा उठती रही है कि क्यों न इस पेशे को क़ानूनी मान्यता दे दी जाए.

इससे यौनकर्मियों की ज़िंदगी थोड़ी तो सुधरेगी, उनके शोषण के कुछ रास्ते बंद होंगे और यहाँ तक कि एचआईवी जैसे सवालों से लड़ने में भी मदद मिलेगी. दुनिया के कुछ देशों ने इस सच को स्वीकारा है और वेश्यावृत्ति को क़ानूनी मान्यता दे दी गई है.

दूसरा पहलु है एक नैतिक, संस्कारित जीवन का. जहाँ तर्क है कि वेश्यावृत्ति को मान्यता नहीं देनी चाहिए बल्कि इसे समाप्त करना चाहिए. यह समाज और नैतिक मानव सभ्यता के लिए अभिशाप जैसा है. इसे ग़लत मानव संबंध, गंदी मानसिकता और अनैतिक करार दिया जाता है.

भारत में डेरा सच्चा सौदा के स्वयंसेवकों ने इन उपेक्षित यौनकर्मियों से शादी करने की बात कहकर इस बहस को फिर से खड़ा कर दिया है. कि क्या यौनकर्मियों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए और समाज में उनका स्थान उन्हें देने के लिए उनके पेशे को क़ानूनी मान्यता नहीं दे देनी चाहिए. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने भी मौखिक रूप से एक मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही थी.

तो बीबीसी इंडिया बोल में इसबार बहस इसी विषय पर. विषय है कि क्या भारत में वेश्यावृत्ति को अब क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए...?

ऑनलाइन पर यह बहस अब आपके बीच है. इस फ़ोरम के ज़रिए बहस में हिस्सा लें. अगली कड़ी में यानी 22दिसंबर, मंगलवार, भारतीय समयानुसार रात आठ बजे हम आपके बीच फिर होंगे रेडियो की इस विशेष प्रस्तुति के साथ. रेडियो कार्यक्रम में शामिल होने के लिए टोल फ्री नंबर 1800-11-7000 पर फोन करके कार्यक्रम में लाइव शामिल हों. आप टोल फ्री पर पहले से भी अपना संदेश रिकॉर्ड करा सकते हैं. ऑनलाइन की प्रतिक्रियाएं भी होंगी रेडियो कार्यक्रम का हिस्सा.

तो इंतज़ार किस बात का. बोल, बीबीसी इंडिया बोल.

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