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IST 2029: कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आप सभी का धन्यवाद.

IST 2028: एक श्रोता कहते हैं कि सवाल ये है कि हमारा लक्ष्य क्या है. हमारे यहां आज भी कितने लोग बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं.

IST 2025: राजेश जोशी सवाल उठाते हैं कि क्या हम विदेशी विश्वविद्यालयों से डरते हैं इसके जवाब में लोगों का कहना है कि जब आईआईटी और आईआईएम की शाखा दूसरे देश अपने यहां नहीं खोलने दे रहे हैं तो हम क्यों ऐसा कर रहे हैं.

IST 2023: नचिकेत का कहना है कि विश्वस्तरीय शिक्षा प्रणाली कौन तय करता है ये सवाल महत्वपूर्ण है और मेरा मानना है कि ये पूंजीवादी समाज तय करता है. नचिकेत की बातों का सभी समर्थन करते हैं.

IST 2021: पीएचडी के छात्र विस्मय कहते हैं कि इसके ज़रिए सिर्फ़ मुनाफ़े का उद्देश्य है.

IST 2020: वेशाली बिहार से एक श्रोता कहते हैं कि हज़ारों साल से भारत शिक्षा का एक बड़ा केंद्र रहा है तो आज क्या ज़रूरत आ पड़ी जो हमें विदेशी शिक्षा पर निर्भर होना पड़ रहा है.

IST 2019: अविनाश मिश्र का कहना है कि इस फ़ैसले के ज़रिए सरकार सीधे तौर पर देश की शिक्षा व्यवस्था को विदेशी हाथों में बेचना चाहती है.

IST 2017: जेएनयू की प्रोफ़ेसर शुचिता कहती हैं कि बिना किसी तैयारी के इतना बड़ा फ़ैसला करना ठीक नहीं है क्योंकि न तो पाठ्यक्रम तय है न ही फ़ीस तय है.

IST 2012: इंडिया बोल कार्यक्रम आप जेएनयू से सीधे सुन रहे हैं. श्रोता फ़ोनलाइन के ज़रिए भी कार्यक्रम में सीधे जुड़ सकते हैं.

IST 2011: फ़ोनलाइन पर ही एक श्रोता कहते हैं कि इस बात की गारंटी कौन लेगा कि विदेशी विश्वविद्यालय जो भारत में आ रहे हैं उनका शिक्षा का स्तर क्या होगा. अगर कैंब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय यहां आएं तो स्वागत है अन्यथा कोई लाभ नहीं.

IST 1815: लेकिन जेएनयू के छात्र दीपक कुमार उनके इस तर्क से असहमत हैं

IST 2010: दलित चिंतक और जेएनयू के प्रोफेसर विमल कुमार कहते हैं कि बजट में जब तक शिक्षा के लिए आवंटन बढ़ेगा नहीं तब तक सुधार नहीं होगा. गांधी जी ने विदेशी नमक का बहिष्कार किया था लेकिन आज हमारी सरकार देश की शिक्षा व्यवस्था को ही विदेशी हाथों में सौंप रही है.

IST 2009: भागलपुर से सोनू भी मुन्नी रानी की बातों से सहमत हैं और ग़रीब छात्रों के लिए अलग से व्यस्था की बात करते हैं

IST 2004: मुन्नी रानी का कहना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों के ज़रिए ग़रीबों को भी शिक्षा की सुविधा की अतिरिक्त व्यवस्था हो तब ये ठीक है क्योंकि इससे सभी ग़रीबों का नुकसान होगा.

IST 2004: फ़ोनलाइन पर एक श्रोता नीतीश कुमार कहते हैं कि सरकार को इस पर कुछ नियंत्रण रखना होगा ताकि ये सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाने का माध्यम बनकर न रह जाए.

IST 2004: जेएनयू के छात्र दीपक कुमार कहते हैं कि विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति हो लेकिन एक अन्य छात्र विक्रम इसलिए इसे नकार रहे हैं क्योंकि ये दलितों और ग़रीबों के विरोध में है और ये व्यवसायीकरण को बढ़ावा देगा.

IST 2001: कुछ श्रोता कहते हैं कि विदेशी विश्वविद्यालयों को इसलिए आना चाहिए.

IST 1959: बीबीसी इंडिया बोल में आपका स्वागत है. स्टूडियो में पहुंच चुके हैं राजेश जोशी.

IST 1942: कार्यक्रम में लाइव हिस्सा लेने के लिए टोल फ्री नंबर 1800-11-7000 पर कॉल करें

IST 1930: इस बार का विषय है क्या विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखाएं खोलने की अनुमति देना उचित है?

IST 1925: बीबीसी इंडिया बोल की ओर से आप सभी का स्वागत. अब से कुछ देर बाद हम होंगे आपसे रूबरू...लाइव.

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