बीबीसी इंडिया बोल... लाइव टेक्स्ट

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IST 2029: बीबीसी इंडिया बोल में आज इतना ही. नमस्कार.

IST 2028: शांतनु गुहा कहते हैं कि विकास के लिए ज़मीन उपजाऊ तो है पर इसे इस्तेमाल कैसे करें, सरकार इस बारे में सोचे. यानी विकास की दिशा और प्रवाह पर दें ध्यान.

IST 2028: एक श्रोता कहते हैं कि कॉमनवेल्थ के लिए दाल, दूध से पैसे क्यों, शराब और गुटके पर टैक्स क्यों नहीं बढ़ाए जाते.

IST 2027: शांतनु कहते हैं कि ग़रीब का स्तर नीचे नहीं गया है पर विकास जहाँ जाना चाहिए, वहाँ नहीं पहुँच रहा है.

IST 2026: एक श्रोता सबल सिंह कहते हैं कि ग़रीब और अमीर के बीच का बढ़ता भेदभाव चिंता का विषय है.

IST 2025: एक अन्य श्रोता कुणाल कहते हैं कि जबतक नीचे के स्तर तक नहीं पहुँचेगा विकास, कैसे बनेगी बात.

IST 2024: हिम्मत सिंह भाटी कहते हैं कि ग़रीबों के पास आज निम्न मध्यमवर्ग से कहीं ज़्यादा रोज़गार के अवसर हैं.

IST 2023: एक श्रोता कहते हैं कि खेल पर ध्यान नहीं दे रहे, केवल निर्माण पर ही हमारा ध्यान लगा हुआ है.

IST 2022: शांतनु कहते हैं कि दिल्ली से विकास की धारा लखनऊ या नागपुर क्यों नहीं पहुंचती. विकास का विकेंद्रीकरण क्यों नहीं होता.

IST 2021: वैशाली से एक श्रोता कहते हैं कि भ्रष्टाचार और नौकरशाही नियंत्रित करने की ज़रूरत है.

IST 2020: भरत कोठारी कहते हैं कि अगर किसी के पास मोबाइल है तो वो विकास का पैमाना कैसे हो सकता है.

IST 2019: इंद्रजीत फिर से खंडन करते हैं हिम्मत सिंह का और कहते हैं कि मजदूर तो शोषण का शिकार हैं.

IST 2018: हिम्मत सिंह कहते हैं कि ग़रीब खुद भी अपनी बदहाली के ज़िम्मेदार हैं. जो ग़रीब आगे बढ़े हैं वो भी शोषण कर रहे हैं.

IST 2017: बीबीसी इंडिया बोल में अब वक़्त ऑनलाइन पर फ़ोरम के ज़रिए आने वाली प्रतिक्रियाओं की.

IST 2016: वो याद दिलाते हैं कि पिछले खेलमंत्री ने खुद कहा था कि ऐसे खेलों की क्या ज़रूरत है.

IST 2014: शांतनु कहते हैं कि आंतरिक सवाल मूल्य और विकास तक पहुँच को लेकर है.

IST 2013: दिल्ली से एक श्रोता कहते हैं कि सरकार अपने काम करने में लोगों की कमर तोड़ रही है.

IST 2012: इंद्रजीत कहते हैं कि अगर विकास सही से होता तो नक्सली आंदोलन क्यों पनपता.

IST 2012: पर क्या कुछ लोगों की अनदेखी को पूरी व्यवस्था के सिर फोड़ें. बहस अब गर्म है और पूरे ज़ोरों पर.

IST 2011: इंद्रजीत कहते हैं कि मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिल रही है. बदतर हालात में काम करने को मजबूर हैं वो.

IST 2010: गुजरात से एक सरकारी कर्मचारी कहते हैं कि लोगों में जागृति होनी चाहिए. योजनाएं तो हैं.

IST 2010: वो कहते हैं कि दूसरे और तीसरे पायदान के शहर हैं वंचित इसीलिए बढ़ा है पलायन.

IST 2009: शांतनु कहते हैं कि दिल्ली के बजाय किसी और शहर में होता कॉमनवेल्थ तो उस शहर की तस्वीर बदल जाती.

IST 2008: सवाल शांतनु से कि विकास आम आदमी तक नहीं पहुँच रहा है. क्या यह है अहम सवाल.

IST 2007: मनोज कुमार कहते हैं कि कागज़ी विकास हो रहा है. ग़रीब की हालत यथावत है.

IST 2006: इंद्रजीत कहते हैं कि मध्यमवर्ग अमरीका और सूचकांकों के विकास को आधार क्यों मानता है.

IST 2005: कुणाल कुमार कहते हैं कि अमरीका मंदी झेल रहा था तब भी भारत आगे जा रहा है.

IST 2005: हिम्मत सिंह कहते हैं कि नरेगा जैसी योजनाएं हैं और काम सबको मिल रहा है.

IST 2004: पर एक अन्य श्रोता कहते हैं कि विकास का लाभ तो कुछ लोगों तक सीमित है. आम इससे वंचित है.

IST 2004: हिम्मत सिंह भाटी कहते हैं कि विकास तो हो रहा है.

IST 2003: बीबीसी स्टूडियो में आज हैं शांतनु गुहा रे, जो अर्थ नीति के जाने-माने पत्रकार हैं. बहस में शामिल.

IST 2002: पहले बारी रिकॉर्डेड मैसेजों की. 1800-11-7000 पर आप सप्ताह भर रिकॉर्ड कराते हैं अपने संदेश.

IST 2001: बीबीसी इंडिया बोल में विकास बनाम ज़मीनी सच्चाई की लड़ाई पर है आज बहस

IST 1959: बीबीसी इंडिया बोल में आपका स्वागत है. मैं हूँ पाणिनि आनंद. स्टूडियो में बहस की बागडोर संभालेंगे अविनाश दत्त

IST 1945: कार्यक्रम में लाइव हिस्सा लेने के लिए टोल फ्री नंबर 1800-11-7000 पर कॉल करें

IST 1945: इस बार का विषय है- क्या बड़े ख़्वाबों के खेल में पिस रहा है आम भारतीय..?

IST 1940: बीबीसी इंडिया बोल की ओर से आप सभी का स्वागत. अब से कुछ देर बाद हम होंगे आपसे रूबरू...लाइव.

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