'भारत रूस की गोद से उछलकर अमरीका की गोद में जा बैठा'

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भारत और पाकिस्तान का तनाव और दक्षिण एशिया में बनते नए समीकरण पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में चर्चा का विषय हैं.

'इंसाफ़' लिखता है कि भारत कभी सोवियत यूनियन की गोद में बैठा था लेकिन जब सोवियत यूनियन के टुकड़े टुकड़े हो गए और वो सिमट कर रूस बन गया तो भारत अमरीका की सरपरस्ती में चला गया.

अख़बार कहता है कि अमरीका दुनिया मे अपने दबदबे का कितना भी दम भरे लेकिन सात समंदर पार से आकर दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में उसके हस्तक्षेप को कभी पसंद नहीं किया जा सकता है.

अख़बार ने चीन से पाकिस्तान की दोस्ती को मिसाल बताया है तो भारत के पुराने दोस्त रूस से पाकिस्तान के बेहतर होते संबंधों को क्षेत्र में नए समीकरणों का संकेत बताया है.

अख़बार लिखता है कि चीन के बढ़ते असर से ख़ौफ़ खाकर ही अमरीका और भारत ने हाल में एक समझौता किया है जिसके तहत अमरीका भारत के फ़ौजी अड्डे इस्तेमाल कर सकेगा.

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वहीं, अफ़ग़ान राष्ट्रपति के हालिया भारत दौरे पर 'एक्सप्रेस' ने लिखा है कि अफ़ग़ान सरकार भारत से रिश्ते मज़बूत कर रही है लेकिन ये रिश्ते पाकिस्तान से दुश्मनी की बुनियाद पर नहीं होने चाहिए.

अख़बार लिखता है कि नई दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने मुलाक़ात के बाद संयुक्त घोषणापत्र में पाकिस्तान का नाम लिए बग़ैर उसे आलोचना का निशाना बनाया.

अख़बार की राय में, यूं लगता है कि भारत और अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एक हो गए हैं और उसे नुक़सान पहुंचाना चाहता है, ऐसे में अमरीका अगर दहशतगर्दी का ख़ात्म चाहता है तो उसे अफ़ग़ानिस्तान पर नज़र रखनी चाहिए.

दूसरी तरफ़ 'दुनिया' ने अपने संपादकीय में अफ़ग़ानिस्तान को भारत की तरफ़ से एक अरब डॉलर की मदद देने पर तालिबान के विरोध को अपने संपादकीय में जगह दी है.

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अख़बार के मुताबिक़ अफ़ग़ान तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अमरीका की ग़ुलाम काबुल सरकार को कोई भी देश अगर मदद देगा तो ये अफ़ग़ान लोगों से दुश्मनी के बराबर होगा क्योंकि वो सरकार इससे हथियार ख़रीदकर अफ़ग़ान लोगों को ही मारेगी.

अख़बार कहता है कि वैसे पाकिस्तान सरकार अफ़ग़ान तालिबान की बहुत सी नीतियों से सहमत नहीं है, लेकिन भारत की मदद पर उनका विरोध स्वागतयोग्य है.

अख़बार लिखता है कि ये रक़म यक़ीनी तौर पर उन कामों पर ख़र्च नहीं होगी जो बताए गए हैं बल्कि इसका इस्तेमाल पड़ोसी देश पाकिस्तान में दहशतगर्दी, चरमपंथी और अफरातफरी को बढ़ाने के लिए किया जाएगा.

वहीं 'जंग' ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद में भारत की तरफ़ से बलूचिस्तान का मुद्दा उठाए जाने को पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप बताया है.

अख़बार कहता है कि हक़ीक़त तो ये है कि भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ बलूचिस्तान में दख़लंदाजी कर रही है और भारत के एक हाज़िर सर्विस अफ़सर कूलभूषण जाधव का यहां से पकड़ा जाना इसका जीता जागता सबूत है.

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वहीं पाकिस्तान की तरफ़ से मानवाधिकार परिषद में भारत प्रशासित कश्मीर के हालात को उठाए जाने को अख़बार ने स्वाभाविक बताया है.

वहीं 'नवा-ए-वक़्त' ने भारत प्रशासित कश्मीर में हालिया अशांति के दौरान होने वाली मौतों को क़त्ल-ए-आम बताया है और संयुक्त राष्ट्र से इसकी जांच कराने की मांग की है.

अख़बार लिखता है कि संयुक्त राष्ट्र को अपने मंज़ूर प्रस्तावों के मुताबिक़ कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का रास्ता तैयार करना चाहिए ताकि कश्मीरियों को अपने भविष्य का फ़ैसला करने का मौक़ा मिल सके.

रूख़ भारत का करें तो 'सहाफ़त' ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के इस फ़ैसले को अहम बताया है कि चुनावी वादे पूरे न करने वाली पार्टियों पर कार्रवाई होनी चाहिए.

अख़बार के मुताबिक़ अदालत ने चुनाव आयोग को हिदायत दी है कि वो इन पार्टियों के ख़िलाफ़ संविधान की धारा 324 के तहत कार्रवाई करे.

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अख़बार कहता है कि सत्ता मिलने पर चुनावी वादे भूल जाना किसी एक पार्टी की नहीं, बल्कि सभी की फ़ितरत है.

अख़बार लिखता है कि भारतीय जनता पार्टी ने भी वादा किया था कि सत्ता में आने पर विदेशों से काला धन वापस लाया जाएगा और हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए आएंगे, बाद में भाजपा अध्यक्ष ने इसे चुनावी जुमला बता दिया.

वही 'रोज़नामा ख़बरें' ने समाजवादी पार्टी में मचे घमासान पर संपादकीय लिखा - किसकी जीत किसकी हार.

अख़बार लिखता है कि ताक़त की लड़ाई पहली पर बार सड़कों पर आई और चाचा भतीजे ने ख़ूब हाथ आज़माए.

फिलहाल दोनों पक्षों में समझौते पर अख़बार कहता है कि देखना ये है कि युद्धविराम अस्थायी है या स्थायी क्योंकि आग दबा दी गई है, बुझाई नहीं गई है और चिंगारी कभी भी भड़क सकती है.

अख़बार की राय में मुलायम को अब फ़ैसला करना ही होगा कि पार्टी में उनका असली उत्तराधिकारी कौन है.

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