'भाषण यूएन में, ऑडियंस पाकिस्तान में'

अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हुसैन हक्कानी का कहना है कि असल दिक्कत ये है कि पाकिस्तान के लोगों ने ये बात अपने दिमाग़ में बैठा ली है कि भारत पाकिस्तान को दिल से नहीं स्वीकारता और दूसरी तरफ़ भारत के लोगों ने ये बात दिमाग़ में बैठा ली है कि पाकिस्तान को भारत से अलग नहीं होना चाहिए था.

संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के बुधवार को दिए भाषण पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने ये बातें कहीं.

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Image caption पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने भारत-पाकिस्तान के 70 साला रिश्तों पर चर्चा की.

उन्होंने कहा कि चाय बेचने वाले, पान खिलाने वाले, ऑटो चलाने, अख़बार बेचने वाले आम आदमी एकदम साधारण आदमी को भारत और पाकिस्तान के बीच झगड़े की जड़ को ऐसे समझना चाहिए जैसे कि भारत मानता है कि 1947 का बंटवारा नहीं होना चाहिए था.

हक्कानी का आगे कहना था, ''लेकिन मैं ये कहता हूं कि बंटवारा तो अब हो चुका है, 70 साल हो चुके हैं. इस बंटवारे को दोनों देशों को कुछ ऐसे लेना चाहिए जैसा गांधी जी कहते थे. अगर संयुक्त परिवार में कोई एक ये कहे कि मैं तो अपना घर अलग बनाना चाहता हूं तो उसको घर अलग बनाने दो, लेकिन उसके साथ ऐसा बर्ताव करो जैसे परिवार को करना चाहिए और अलग होने वाले उस शख्स को भी अपने ख़ानदान को अपने परिवार को भूलना नहीं चाहिए.''

गांधी जी की मिसाल देते हुए हक्कानी कहते हैं, ''पाकिस्तान उसी परिवार का हिस्सा है, जिसका हिस्सा भारत है. उससे इंकार करने की सज़ा हम और आप भुगत रहे हैं.''

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पाकितान के बारे में हक्कानी कहते हैं, ''ये सच है कि पाकिस्तान एक आज़ाद देश है, उसकी आज़ादी को कोई छीनना नहीं चाहता, लेकिन पाकिस्तान में कुछ लोग ये समझते हैं कि जब तक वो भारत से नहीं लड़ेंगे उन्हें अपनी आज़ादी नहीं महसूस होगी.''

संयुक्त राष्ट्र में नवाज़ शरीफ़ के भाषण पर वह कहते हैं, "नवाज़ शरीफ़ का भाषण तो संयुक्त राष्ट्र में था लेकिन उनकी ऑडियंस पाकिस्तान में थी. वह पाकिस्तान में पाकिस्तान की सेना के सरपरस्तों, जनरल और ऐसे लोग जो ये चाहते हैं कि पाकिस्तान हमेशा भारत के साथ बराबरी करें, आंखों में आंखें डालकर देखे, उनको सुनाना चाहते थे कि वह अभी तक कश्मीर पर हार्ड लाइनर हैं. ''

हक्कानी के अनुसार नवाज़ शरीफ़ के भाषण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत ज्यादा तव्वजो नहीं मिली क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में 1947 से लोग ये सुन रहे है.

आतंकवाद पर उनका कहना था, ''रह गया आतंकवाद का मामला तो उस पर पूरी दुनिया सहमत है कि आतंकवाद का कोई औचित्य नहीं है. पाकिस्तान को अब ये कारोबार बंद करना होगा. दुनिया सब कुछ जानती है."

वो कहते हैं कि इस स्थिति पर मीर तक़ी मीर का शेर "जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है" सटीक बैठता है.

उनका कहना था कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर एक ही बात लगभग 70 सालों से लगातार दोहराते आ रहे हैं और इसे दोहराते रहने का वास्तव में कोई फ़ायदा नहीं है.

वो आगे कहते हैं, ''अपनी बात को दोहराते रहना कभी भी ताक़त का प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि कमज़ोरी होती है और ये बात भारत पर भी लागू होती है. क्योंकि भारत को भी कश्मीर के अंदर अपनी मुश्किलों को कभी न कभी हल करना होगा और कश्मीर के राजनीतिक लीडर्स के साथ बात करनी होगी. देखना होगा कि क्या वहां कोई ऐसी बैचेनी है जिसका का कोई फ़ायदा उठाता है.''

पाकिस्तान का ज़िक्र करते हुए हक्कानी ने कहा कि पाकिस्तान के आतंकवाद पर अब दुनिया खुल कर बोलती है.

उनके अनुसार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी उड़ी के वाक़ये की निंदा की है और कहा है कि पाकिस्तान को ऐसा नहीं करना चाहिए .

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Image caption अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी

हक्कानी के अनुसार अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी के साथ नवाज़ शरीफ़ की बैठक के बाद जो बयान आया उसमें भी साफ़-साफ़ लिखा है कि 'सेफ हैवन' यानि आंतकवादियों के लिए पाकिस्तान ने जो पनाहगाहें बनाई हुई हैं उनको ख़त्म करना होगा.

भारत और पाकिस्तान के रवैये के बारे में हक्कानी ने कहा, ''ये बातें दोहराने का अब कोई फ़ायदा नहीं है. भारत भी अगर ये दोहराए कि कश्मीर में कुछ भी समस्या नहीं है और लोग ऐसे ही बस पाकिस्तान के हाथों बहकावे में आ रहे हैं तो उसकी भी कोई अहमियत नहीं है. दुनिया को पता है कि कश्मीर में कुछ सियासी मुद्दे हैं जिनको भारत को हल करना होगा.''

उन्होंने आगे कहा, ''पाकिस्तान बार-बार ये कहता रहे कि वो इसलिए आतंकवाद को बढ़ावा देता है क्योंकि कश्मीर का मसला हल करवाना उसका मक़सद है तो इसकी भी अब दुनिया की निगाह में कोई अहमियत नहीं है.''

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित )

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