'मोदी, नवाज़ को कश्मीर भूलने न देंगे'

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पाकिस्तान पिछले कई साल से देश में सभी चरमपंथी गुटों के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई करने का दावा करता रहा है, लेकिन अपने इस रुख़ को दुनिया भर में पूरी तरह से मान्यता दिलाने में असफल दिखाई देता है.

इसका ताज़ा उदाहरण भारत प्रशासित कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना पर हमले के बाद पाकिस्तान पर आरोप लगाया जाना है.

जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की विदेश नीति में नेतृत्व के अभाव की वजह से समस्याएं पैदा हो रही हैं. ज़ाहिर है ऐसा भी लगता है कि विदेश मंत्रालय न ज़्यादा बात सुनना चाहता है और न ही अपने रुख़ को स्पष्ट रूप से रख रहा है.

पूर्व राजनयिक ज़फ़र हिलाली का कहना है कि विदेश मंत्रालय का काम नीति बनाना नहीं होता, बल्कि वह सिविल और सैनिक नेतृत्व को अपने सुझाव देता है.

उनका कहना है, "विदेश मंत्रालय लिखित रूप में नेतृत्व को सुझाव देता है, मैंने 38 साल तक इसमें काम किया है. सिविल या सैनिक नेतृत्व की ओर से कोई जवाब नहीं आता था और कई उत्तर ऐसे आते थे कि उन पर कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें लागू कर पाना संभव ही नहीं होता था''.

उनका कहना है कि इस स्थिति के लिए विदेश मंत्रालय को कसूरवार ठहराना सही नहीं है, क्योंकि मौजूदा प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के पास विदेश मंत्रालय की ज़िम्मेदारी है, पर वो विदेश मामलों के बारे में कितना जानते होंगे?'

विश्लेषक हसन असकरी का विदेश नीति के मुद्दों पर कहना है कि किसी भी स्थिति में विदेश मंत्रालय को स्पष्ट रुख़ रखना चाहिए, लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है.

उनका कहना है, "विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री हाउस को किसी भी स्थिति में दो टूक रुख़ रखना चाहिए, लेकिन अगर देखा जाए तो प्रधानमंत्री हाउस भारत के मुद्दे पर बात करने में झिझकता है और अब जाकर प्रधानमंत्री ने कश्मीर के मुद्दे पर बात करना शुरू किया है. प्रधानमंत्री भारत के मुद्दे पर बात करने से बचते हैं, जिसे उनके विरोधी कथित तौर पर भारत के साथ व्यापार संबंधों से जोड़ते हैं. विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री के व्यवहार में काफ़ी अस्पष्टता है. यह स्पष्ट होनी चाहिए."

उन्होंने कहा कि हालात में जब इस तरह का फ़ासला रह जाता है, तो उसके बाद सेना अपना बयान जारी करती है जो व्यापक और सटीक होता है, इसलिए उसे अधिक महत्व दिया जाता है.

उन्होंने बताया है कि न केवल भारत बल्कि अफ़गानिस्तान के मुद्दे पर भी इसी तरह की समस्याएं हैं, जिनमें हक्कानी नेटवर्क और अफ़गान तालिबान के बारे में पाकिस्तान की स्थिति और ज़्यादा बेहतर तरीके से विश्व समुदाय के सामने नहीं रखी जा सकी है.

हसन असकरी का कहना है, "सरकार बेहतर तरीके से तथ्यों के साथ बात कर सकती है, लेकिन ऐसा नहीं है और इसी तरह से दूसरों के पक्ष को सुनने में भी यही समस्या है. अफ़गानिस्तान की कुछ बातों को सुना जा सकता है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे कान बंद किए हुए हैं. न कोई बात को ज़्यादा ध्यान से सुनना चाहता है और न ही अपनी बात को स्पष्ट रूप से रख रहा है".

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पूर्व राजनयिक अयाज़ वज़ीर के मुताबिक़ क्षेत्र के बदलते मौजूदा हालात में पाकिस्तान सरकार का अधिक ध्यान सड़कें बनाने पर है और विदेश मंत्रालय बिना किसी मंत्री के चल रहा है.

उनका कहना है, "विदेश नीति देश के आंतरिक स्थिति से भी प्रभावित होती है. देश के प्रमुख राजनीतिक दलों को प्रधानमंत्री के रुख़ के बारे में चिंता है, लेकिन चिंताओं पर गंभीरता से बात नहीं की जा रही है. आतंकवाद के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय कार्य योजना को लागू नहीं किया जा रहा है और ऐसे में विदेश नीति तो प्रभावित होगी ही".

अयाज़ वज़ीर के मुताबिक़ इस समय प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भाग लेने की वजह से कश्मीर के मुद्दे पर, कूटनीतिक मोर्चे पर काफ़ी सक्रिय हैं. लेकिन वहां से लौटने पर अगर वो मामले को भूल जाएंगे, तो भी अब भारत के प्रधानमंत्री मोदी उन्हें इसे भूलने नहीं देंगे".

देश की विदेश नीति और पड़ोसी देशों की चिंताओं के बारे में बात करते हुए जानकार डॉ मेहदी हसन का कहना है कि इस समय पाकिस्तान में 63 के क़रीब धार्मिक दल सक्रिय हैं और उनमें से बहुतों को ज़ियाउल हक़ के दौर से सराहना मिली है.

उनका कहना है कि ऐसे हालात में किसी भी गंभीर राजनीतिक दल के लिए बहुत मुश्किल होता है कि वो धार्मिक दलों के कार्यों पर आपत्ति कर सके.

डॉक्टर मेहदी हसन के मुताबिक़ किसी भी देश में नॉन स्टेट एकटर्स को विदेश नीति के बारे में बात करने की कतई इजाज़त नहीं होती, लेकिन जमातुद दावा जैसी पार्टी लगातार स्थाई विदेश नीति पर बयान देती रहती है, फिर भी उसे कभी रोका नहीं गया.

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