ब्राज़ील: जिनके नाम पर बना घरेलू हिंसा क़ानून

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सितंबर 2006 में ब्राज़ील ने घरेलू हिंसा से जुड़ा एक नया कानून पेश किया. इस कानून को 'मारिया डा पेन्हा कानून' के नाम से जाना गया.

यह नाम महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली एक महिला के नाम पर पड़ा. पति की हिंसा की वजह से इनके शरीर का निचला अंग लकवाग्रस्त हो गया था. मारिया ने बीबीसी से बात की और अपनी आपबीती सुनाई.

जब मारिया डा पेन्हा को उनके पति ने जान से मारने की कोशिश की थी, उस वक़्त ब्राज़ील में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की शिकायत करने का कोई ख़ास पुलिस स्टेशन नहीं था.

मारिया बताती हैं, "उस वक़्त हम घरेलू हिंसा जैसी बातों को लेकर जागरूक तक नहीं थे. आपके पास केवल एक बुरा पति होता था".

आज से चालीस साल पहले मारिया डा पेन्हा की मुलाक़ात उस व्यक्ति से हुई थी, जो उनका जीवन नाटकीय अंदाज़ में बदल देने वाले थे.

मारिया साओ पोलो में बायो फार्मेसिस्ट बनने की पढ़ाई कर रही थीं, जब उनकी मुलाक़ात मार्कस एंटोनियो हेरेडिया विवेरोज़ से हुई थी. मार्कस एक स्कूल टीचर थे जो मूल रूप से कोलंबिया के थे.

दोनों की मुलाक़ात एक दोस्त के ज़रिए हुई. वो उस वक़्त काफ़ी अच्छे और मददगार थे और दोनों में जल्द ही प्यार हो गया. फिर 1976 में दोनों ने शादी कर ली.

जब मारिया ने अपनी पढ़ाई समाप्त कर ली, तो दोनों ब्राज़ील के उत्तर-पूर्वी तटीय इलाक़े मे अपने गृह नगर फ़ोर्टालेज़ा आ गए. यहां आकर दोनों ने परिवार बसाया. लेकिन जिस इंसान से मारिया को प्यार हुआ था, वो बदलने लगे.

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मारिया याद करती हैं, "जब उन्हें ब्राज़ील की नागरिकता मिल गई, तब उन्होंने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया. मुझे ऐसा कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि मैं कैसे उन्हें पहले की तरह बना दूं".

मारिया बताती हैं, "मुझे यह भी नहीं पता होता था कि वो किस मूड में जागेंगे. वो हिंसक हो गए थे, बच्चों को बिना किसी वजह के पीटा करते थे. उनसे मुझे वैवाहिक जीवन में असुरक्षा महसूस होने लगी".

मारिया कहती हैं कि उनके बर्ताव में बदलाव की कोई छोटी या बड़ी वजह नहीं थी. वो किसी भी बात से नाराज़ हो सकते थे.

वो बताती हैं, "उस वक़्त मेरी बेटियां सात साल, पांच साल और सबसे छोटी क़रीब दो साल की थीं. मेरी छोटी बेटी अभी भी चल नहीं पाती थी. एक दिन वो फ़्लोर पर बैठी थी और उसने ख़ुद को पेशाब से गीला कर लिया. "

मारिया याद करती हैं, "उसके बाद वो अपने छोटे-छोटे गीले हाथों से दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गई, जिससे दीवार भी गीली हो गई. इस पर मार्कस ने उसे ज़ोर से पीटा और चिल्लाने लगे".

मारिया की बीच वाली बेटी को अपना अंगूठा चूसने की आदत थी और मार्कस ने उसके हाथों को बांध दिया ताकि वो ऐसा न कर सके.

मारिया बताती हैं, "मैं उस वक़्त घर पर नहीं थी. मुझे बाद में इसके बारे में पता चला. जब मेरी बेटी ने अपने बंधे हाथ खुद ही खोल लिए, तो मार्कस ने उसे ज़ोर से मारा और उसे शावर के ठंडे पानी के नीचे डाल दिया."

जैसे जैसे यह हिंसा बढ़ी, मारिया ख़ुद को पिंजरे में क़ैद, अलग-थलग और अकेली महसूस करने लगीं.

वो बताती हैं, "मैं हिंसा को झेल रही थी, और यह बात केवल मुझे, और मेरी बेटियों को पता थी. मैंने यह बात अपने परिवार को भी नहीं बताई, क्योंकि अगर उन्हें इसके बारे में पता चलता तो वो तलाक़ लेने के लिए कहते."

लेकिन मई 1983 की एक ख़ौफ़नाक रात को सारी हदें पार हो गईं. उस रात मारिया अपने पति और बच्चों के साथ घर पर थीं.

वो याद करती हैं, "मैंने अपने कमरे में खूब ज़ोर की आवाज़ सुनी. मैंने उठने की कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं कर पाई. तभी अचानक मुझे लगा कि मार्कस ने मुझे मार डाला है".

वो बताती हैं, "मेरे पड़ोसी जो कि पेशे से डॉक्टर थे, वो आए. मैं बिस्तर पर बुरी तरह से ज़ख़्मी हालत में पड़ी थी. मेरी पीठ पर एक सुराख़ था और मेरे शरीर से काफ़ी सारा ख़ून निकल कर गद्दे पर पड़ा था".

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मारिया को उनके पति ने गोली मार दी थी, यह गोली उनकी रीढ़ में लगी थी.

लेकिन उनके पति ने पुलिस को बताया कि वो आवाज़ सुनकर जगे थे और उन्होंने घर के भीतर चार अजनबियों को देखा था. उन्होंने बताया कि उनके साथ झड़प होने के बाद लोगों ने उन्हें बांध दिया और मारिया को गोली मार दी.

पुलिस को उनकी बातों पर यकीन होने लगा, क्योंकि मारिया को तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा था और उस वक़्त मारिया का बयान नहीं लिया जा सका. इसलिए इस घटना में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई.

दुनिया के कई हिस्सों की तरह ब्राज़ील में भी घरेलू हिंसा आम बात थी और आज भी है. लेकिन इस हिंसा से पीड़ित कभी-कभार ही पुलिस के पास जाते थे.

1980 के दशक की शुरुआत में ब्राज़ील में इस तरह के मामलों के लिए कोई विशेष पुलिस नहीं होती थी और साल 1988 तक हालात ऐसे ही थे. लेकिन उसी साल महिला संगठनों के प्रयास से ब्राज़ील के संविधान में संशोधन हुआ.

इसने पीड़ित महिलाओं को क़ानून के सामने बराबरी का अधिकार देने की गारंटी दी.

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लेकिन उसके बाद भी, पुलिस के पास कार्रवाई करने के लिए विशेष ताक़त नहीं थी. मसलन वो हिंसा को रोकने का आदेश नहीं दे सकते थे.

फिर 1990 के दशक में भी ब्राज़ील की अदालतों में कोई पति अपनी 'बेवफ़ा' बीवी की हत्या करने के बाद, अपने बचाव में अपनी 'बेइज़्जती' का दावा कर सकता था.

उधर अस्पताल में चार महीने गुज़ारने के बाद मारिया को कमर के नीचे लकवा हो गया और वो अपने घर लौट आईं.

इस गोलीकांड को लेकर पुलिस की जांच अभी तक किसी फैसले पर नहीं पहुंची थी. यहां तक कि मारिया को भी इस बात पर संदेह होने लगा कि गोली उनके पति ने चलाई थी. उनके पास अपने संदेह को पुख़्ता करने का कोई सबूत नहीं था.

लेकिन उनके घर लौटने के बाद हिंसा फिर से शुरू हो गई.

मारिया बताती हैं, "जिस दिन मैं घर लौटी, उसने मुझसे कहा कि मुझसे पूछे बग़ैर यहां तुम्हारा कोई मेहमान, कोई पड़ोसी, कोई दोस्त नहीं आना चाहिए".

मारिया कहती हैं, "मुझे एक तरह से घर के भीतर क़ैद करके रखा गया था. मेरे परिवार के लोग मुझे फ़ोन करते थे और पति का आदेश मानने के लिए मैं बहाने बनाती रहती थी. मैं कहती थी कि बहुत थकी हुई हूं ताकि कोई मुझे देखने न आए. "

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उन्हें बाक़ी लोगों से दूर रखने की उनके पति की कोशिश के बाद मारिया, इससे निकलने का रास्ता देखने लगीं.

अपने पति को बताए बगैर वो बच्चों की कस्टडी पाने के लिए अदालत का आदेश हासिल करने की कोशिश करने लगीं, ताकि उन्हें घर न छोड़ना पड़े.

लेकिन इससे पहले कि वो ऐसा कर पातीं, मार्कस ने एक बार फिर से उन्हें जान से मारने की कोशिश की. इस बार मारिया जब स्नान कर रही थीं तो उन्हें बिजली का करंट लगाकर मारने की कोशिश की गई.

लेकिन किसी चमत्कार की तरह वो बच गईं और फिर उन्होंने घर छोड़ दिया.

मारिया बताती हैं, "मैंने उसे सज़ा दिलाने के लिए 19 साल और छह महीने तक लड़ाई लड़ी. उस दौरान उसे ट्रायल पर रखा गया और दो बार कसूरवार पाया गया. लेकिन दोनों बार वह अदालत के आदेश पर आज़ाद बाहर निकल गया, क्योंकि उसने अपील कर रखी थी".

आख़िरकार साल 2002 में मार्कस को 8 साल की क़ैद हुई, हालांकि उसे महज़ एक साल के बाद छोड़ दिया गया. इस बीच मारिया क़ानून में बदलाव के लिए आंदोलन करती रहीं.

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फिर अगस्त 2006 में ब्राज़ील के वामपंथी राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा ने 'मारिया डा पेन्हा' कानून पर दस्तख़त किए और यह कानून 22 सितंबर 2006 से लागू हो गया.

ब्राज़ील में पहली बार महिलाओं के ख़िलाफ़ अलग-अलग तरीके की हिंसा के मामलों को कानून में जगह दी गई.

इससे हिंसा करने वालों को मिलने वाली सज़ा को बढ़ाया गया, घरेलू हिंसा के मामलों को सुलझाने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की गई और अधिकारियों को पीड़ित महिलाओं के लिए चौबीसों घंटे का आश्रय स्थल खोलने को कहा गया.

इस कानून को संयुक्त राष्ट्र ने घरेलू हिंसा पर एक ऐतिहासिक कानून भी बताया.

मारिया डा पेन्हा अब 71 साल की हो चुकी हैं. वो आज भी बिना रुके महिलाओं के अधिकारों के लिए आंदोलन करती हैं. मारिया देश भर का सफर करती हैं और अपने ख़ौफ़नाक अनुभव के बारे में लोगों को बताती हैं.

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