'कश्मीर पर काबू नहीं तो भारत तितर बितर'

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इस हफ़्ते पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों की बात की जाए तो भारत प्रशासित कश्मीर के उड़ी सेक्टर में हुए चरमपंथी हमले, संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का भाषण, रुस और पाकिस्तानी सेना का संयुक्त अभ्यास की ख़बरें छाई रही हैं.

रविवार को उड़ी में हुए हमले में 18 भारतीय सैनिक और चार चरमपंथी मारे गए थे. इसके ठीक दूसरे दिन यानी 19 सितंबर को पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू दैनिक 'औसाफ़' ने लिखा- 'उड़ी हमला भारत की चाणक्य नीति का हिस्सा, पाकिस्तान को रक्षात्मक पोज़िशन में ले आया.'

अख़बार का दावा है कि जंग में सब जायज़ होता है, 'चाहे दुश्मन को नीचा दिखाने, नुक़सान पहुंचाने के लिए और उसके बढ़ते दबाव को रोकने और नाकाम बनाने के लिए अपने सैनिकों या लोगों को ही क्यों न मरवाना पड़े. ये नीति कई हज़ार साल पहले कूटनीति के माहिर चाणक्य ने सुझाई थी, जो कि उनकी किताब अर्थशास्त्र में मौजूद है.'

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उर्दू दैनिक 'औसाफ़' का आरोप है कि भारत ने उसी नीति पर चलकर भारत प्रशासित कश्मीर के उड़ी में उसे सही साबित कर दिया.

अख़बार के मुताबिक, उड़ी सैन्य ठिकाने पर हुए हमले के तुरंत बाद पाकिस्तान को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराकर, भारत ने कश्मीर की समस्या को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की पाकिस्तानी कोशिशों को रोकने में अहम कामयाबी हासिल की है.

'औसाफ़' और दूसरे अख़बारों ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के उस बयान को भी प्रमुखता से जगह दी है जिसमें उन्होंने कहा कि उड़ी हमला कश्मीरियों पर भारत के कथित ज़ुल्म का बदला हो सकता है.

'जंग' ने संपादकीय लिखा है कि उड़ी हमले को बहाना बनाकर भारत जंग जैसा माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहा है, लकिन उसे मालूम होना चाहिए कि पाकिस्तानी जनता और उसकी सेना देश की सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं.

'जंग' ने नवाज़ शरीफ़ के उस बयान को भी पहले पन्ने पर जगह दी है जिसमें शरीफ़ ने लंदन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि भारत ने बलूचिस्तान का शोशा छेड़ा है जिसे दुनिया में कोई नहीं मानता.

'जंग' ने पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ के उस बयान का भी ज़िक्र किया है जिसमें उन्होंने कहा कि 'उड़ी हमले में पाकिस्तान के शामिल होने के कोई सबूत सामने नहीं आए हैं और अगर कश्मीर में हालात पर क़ाबू नहीं पाया गया तो भारत तितर-बितर हो जाएगा.'

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'नवा-ए-वक़्त' ने लिखा है कि भारत प्रशासित कश्मीर में बिगड़ते हालात से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए उड़ी हमले के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाए जा रहे हैं.

कई अख़बारों ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ के उस बयान को भी पहले पन्ने पर जगह दी है जिसमें उन्होंन कहा कि भारत की किसी भी कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा.

वहीं 'एक्सप्रेस' ने संपादकीय में लिखा है कि हालात इतने गंभीर हैं कि पहली बार अख़बार को अपना संपादकीय पहले पन्ने पर लिखना पड़ा है.

अख़बार ने 'आएं हम सब एक ज़ुबान होकर बोलें' शीर्षक के साथ लिखा है कि एक परमाणु शक्ति दूसरी परमाणु शक्ति को धमकियां दे रही है. इसको जिस नज़र से भी देखा जाए दोनों देशों के लिए ये फ़ायदेमंद नहीं हो सकता. अख़बार लिखता है कि भारत के मौजूदा रवैये का मक़सद शक्ति प्रदर्शन है और इसका असल संबंध पाकिस्तान के बजाए भारत में होने वाले चुनाव हैं.

अख़बार आगे लिखता है कि पाकिस्तान अगर परमाणु शक्ति नहीं होता तो भारत सैन्य कार्रवाई करने में ज़रा भी देर नहीं करता. अख़बार ने ये भी लिखा है कि 'हम युद्ध नहीं चाहते, मगर हम भूटान या नेपाल भी नहीं हैं और ये संदेश पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी जनता की तरफ़ से एक आवाज़ में जाना चाहिए.'

शनिवार से शुरु हुए पाकिस्तान और रूस के सैनिकों के संयुक्त अभ्यास को भी लगभग हर अख़बार ने अपने पहले पन्ने पर जगह दी है. 'औसाफ़' ने लिखा है कि चीन की मदद से एक इतिहास रचा गया जिसे रूस ने दोस्ती 2016 का नाम दिया है.

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अख़बार लिखता है कि भारत ने इस संयुक्त अभ्यास को रोकने के लिए रूस से गुहार भी लगाई थी और अपना विरोध भी दर्ज कराया था लेकिन रूस ने इसे ठुकरा दिया. अख़बार ने अमरीका का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि पाक-रूस सैन्य अभ्यास पर अमरीका भी चिंतित है, जिसने अपने मक़सद के लिए पाकिस्तान को सालों तक इस्तेमाल किया और फिर टिशू पेपर की तरह फेंक दिया.

अख़बार लिखता है कि अमरीकी रक्षा मंत्रालय ने एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट तैयार की है जिसमें ये अंदेशा जताया गया है कि अगले 20 वर्षों में रूस, चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के बीच एक नया गठजोड़ संभव है जिससे अमरीका की हैसियत को गंभीर ख़तरा हो सकता है.

दिल्ली से छपने वाले उर्दू अख़बारों की बात की जाए तो इसमें भी पूरे हफ़्ते लगभग उड़ी हमले और उससे पैदा हुए हालात की ख़बरें ही हर तरफ़ छाई रहीं.

'रोज़नामा ख़बरें' ने संपादकीय लिखा है 'सरकार की आज़माइश की घड़ी है.' अख़बार लिखता है कि उड़ी हमला मामूली घटना नहीं है. ख़ासकर जब सरकार इस दावे के साथ सत्ता में आई हो कि हम एक सिर के बदले 10 सिर लेकर आएंगे और सरकार कोई कार्रवाई करती हुई नज़र नहीं आ रही है तो उसकी स्थिति समझी जा सकती है. अख़बार आगे लिखता है हिंदुस्तान जब चाहे पाकिस्तान की गर्दन मरोड़ सकता है लेकिन ये युद्ध का दौर नहीं, आर्थिक शक्ति हासिल करने का दौर है.

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अख़बार लिखता है कि मोदी सरकार पर कार्रवाई करने का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन जो लोग पाकिस्तान पर हमला करने की वकालत कर रहे हैं उन्हें सोचना चाहिए कि देशों के फ़ैसले भावनाओं से नहीं लिए जाते. अख़बार लिखता है, 'ये भारत के राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए परीक्षा की घड़ी है.'

इनके अलावा हिंदुस्तान एक्सप्रेस ने महाराष्ट्र में चल रहे मराठा आंदोलन पर संपादकीय लिखा है. अख़बार लिखता है कि पहले गुजरात, फिर हरियाणा और अब महाराष्ट्र में संपन्न और शक्तिशाली वर्ग के ज़रिए चलाया जा रहा आंदोलन भारत के तमाम जनतांत्रिक मूल्यों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है.

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