बीजेपी बौद्ध पॉलिटिक्स: कहां पहुंचेगी 'यात्रा'?

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86 वर्षीय बौद्ध भिक्षु भदंत धम्मवीरियो के साथ धम्म चेतना यात्रा पर निकले शांतिमित्र का कहना है कि इस यात्रा में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का भी हृदय परिवर्तन कर दिया.

बीबीसी से बातचीत में शांतिमित्र ने कहा, "जिस तरह से महात्मा बुद्ध ने अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन किया था, उसी तरह मनुवादी सोच रखने वाली भारतीय जनता पार्टी का भी हमने हृदय परिवर्तन कर दिया है."

हालांकि राजनीति को समझने वाले 'हृदय परिवर्तन' के दावे से अलग पूरी यात्रा को बीजेपी की दलितों में पैठ बनाने की रणनीति के हिस्से की तरह देख रहे हैं.

शांतिमित्र कहते हैं कि हमारी यात्रा के समापन के मौक़े पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आ रहे हैं.

शांतिमित्र उन भिक्षुओं में से एक हैं जो कभी कांशीराम के साथियों में से एक भदंत धम्मवीरियो के साथ पिछले 24 अप्रैल को सारनाथ से धम्मचेतना यात्रा पर निकले थे.

इस यात्रा को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने रवाना किया था.

174 दिनों तक उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाक़ों में हज़ारों किलोमीटर घूमने के बाद शुक्रवार को कानपुर में यात्रा का समापन हो रहा है.

यात्रा के दौरान जगह-जगह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इसका स्वागत किया और भीड़ जुटाई. कानपुर में भी यही प्रयास जारी है.

यात्रा के दौरान बौद्ध भिक्षुओं ने दलित समुदाय के लोगों से भेंट की और कई तरह के विषयों पर उन बैठकों में चर्चा की गई.

बीजेपी का कहना है कि यात्रा का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं.

यात्रा के सूत्रधार बताए जाने वाले बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह कहते हैं, "बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए यह यात्रा निकली थी और इस नाते जगह-जगह बीजेपी कार्यकर्ताओं ने इसका स्वागत किया. लेकिन इसका पार्टी से या राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है."

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समझा जा रहा है कि पाटी यात्रा के ज़रिए उन दलितों को अपने साथ जोड़ना चाहती है जो बौद्ध धर्म में आस्था रखते हैं या उसकी ओर उनका झुकाव है.

यात्रा का नेतृत्व करने वाले धम्मवीरियो वर्षों तक बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के क़रीबी रहे.

उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनावों से ठीक पहले निकली इस यात्रा में जगह जगह बीजेपी के कई शीर्ष नेता, सांसद और केंद्रीय मंत्री भी शामिल हुए.

बीजेपी नेताओं का शायद ऐसा मानना है कि धम्मवीरियो जैसे व्यक्ति जब बीएसपी की कथित दलितविरोधी नीतियों और बीजेपी की दलित समर्थक नीतियों के बारे में बात करेंगे तो बहुजन समाज पार्टी का दलित मतदाता बीजेपी की ओर आकर्षित होगा.

लेकिन जानकार इससे सहमत नहीं.

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "ये पता नहीं कैसी रणनीति है."

वो कहते हैं, "इस तरह की रणनीतियां एक रात में नहीं तैयार होती हैं कि कोई एक वर्ग अचानक जगह बदलकर कहीं दूसरी जगह चला जाए."

शरद प्रधान के मुताबिक़, "बीएसपी से दलित वोटों को खींचना इतना आसान नहीं है और फ़िलहाल ये बीजेपी के पक्ष में तो क़तई जाता नहीं दिख रहा है."

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