रूस और अमरीका में कौन कितना ग़लत?

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अमरीकी अधिकारियों ने रूस और सीरिया की ओर से अलेप्पो पर की गई संयुक्त कार्रवाई को 'बर्बरतापूर्ण' बताते हुए चेतावनी दी है और इस कृत्य को युद्ध अपराध बताया है.

रूसी राष्ट्रपति ने अमरीका और रूस के बीच ख़राब होते संबंधों की बात साफ तौर पर मान ली है और जोर देकर कहा है कि ओबामा प्रशासन संवाद की बजाए 'आदेश' देना चाहता है.

इस सबके बावजूद अमरीका और रूस सीरिया को लेकर अभी भी संपर्क में हैं. एक-दूसरे की कड़ी आलोचना और एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाने के बावजूद दोनों ही देशों को पता है कि उनकी भूमिका इस मामले में कितनी अहम है.

सीरिया में स्थाई युद्ध की हालत ना तो रूस और ना ही अमरीका के लिए फ़ायदे का सौदा है, लेकिन बिना एक बुनियादी समझ के और एक-दूसरे पर विश्वास किए दोनों देशों के बीच कोई भी बातचीत डगमगाती हुई नज़र आएगी.

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इसकी उम्मीद कभी नहीं की गई थी. शीत युद्ध के बाद ऐसा लगा था कि एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है.

एक समय के लिए रूस दुनिया में अपनी प्रभावकारी भूमिका से पीछे हट चुका था, लेकिन अब वो फिर से दुनिया में अपनी खोई हैसियत को वापस पाने के लिए व्याकुल है और पश्चिम के कथित अपमान का बदला लेने का इच्छुक है.

तो कहां ग़लती हुई थी? क्यों रूस और पश्चिम के देश एक अलग तरह का रिश्ता बनाने में नाकामयाब रहे थे? कौन इसके लिए जिम्मेदार है? क्या अमरीका असंवेदनशील और महत्वकांक्षी था या रूस सोवियत जमाने की महानता के विषाद से कभी निकल नहीं पाया? क्यों चीजें अब बिगड़ गई हैं और क्या मौजूदा हालात एक 'नए शीत युद्ध' की शुरुआत है?

मैं इन सभी सवालों का कोई माकूल जवाब देने की कोशिश नहीं कर रहा हूं बल्कि मैं बस कुछ बिंदुओं पर यहां रोशनी डालने की कोशिश कर रहा हूं.

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जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर सिक्योरिटी स्टडीज़ के सीनियर फेलो और पूर्व वरिष्ठ सीआईए अफसर पॉल आर पीलर का मानना है कि शुरुआती ग़लतियां पश्चिमी देशों ने की हैं.

वो कहते हैं, "रूस के साथ संबंध ग़लत दिशा में उस वक़्त चले गए जब पश्चिम के देशों ने सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को एक राष्ट्र के तौर पर सम्मान नहीं दिया. रूस का एक राष्ट्र के तौर पर नए देशों की बिरादरी के बीच सम्मान होना चाहिए था. लेकिन इसके बजाए उसे सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा गया है जो कि पश्चिमी देशों के अविश्वास की मुख्य वजह रही है."

इसे नाटो के विस्तार के नाम पर पोलैंड, चेक रिपब्लिक और हंगरी जैसे देशों को शामिल करके और गहरा कर दिया गया. ये सभी देश परंपरागत रूप से रूस के विरोधी रहे हैं और रूस के ख़िलाफ़ संघर्ष का इनका इतिहास रहा है, लेकिन नाटो का विस्तार सिर्फ़ यही पर नहीं रूका. इसके बाद तो नाटो में तीन बाल्टिक राज्यों को भी जोड़ा गया जो सोवियत संघ के हिस्से रह चुके थे.

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए. आलोचक कहते रहे हैं कि रूस को जॉर्जिया या यूक्रेन के पश्चिमी बिरादरी में शामिल होने का विरोध करना चाहिए.

संक्षेप में कहें तो रूस मानता है कि शीत युद्ध के बाद से उसके साथ ज्यादती की गई है.

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अमरीकी थिंक टैंकों के बीच इस बात को लेकर दिलचस्प बहस चल रही है कि कौन सा पक्ष सही है.

बहस है कि क्या पश्चिमी देशों को शुरुआती ग़लतियों को तवज्जो देनी चाहिए या फिर रूस ने हाल के दिनों में जॉर्जिया, सीरिया या यूक्रेन को लेकर जो रूख अपनाया है उसकी बात करनी चाहिए?

ब्रिटेन की ख़ुफिया इंटेलीजेंस सर्विस (एम16) के पूर्व मुखिया सर जॉन सैवर्स हाल के घटनाक्रम पर ध्यान देने की बात करते हैं.

सर जॉन सैवर्स संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन के राजदूत रहे हैं और हाल के सालों में रूस की कूटनीति पर बारीक नज़र रखे हुए हैं.

हाल में बीबीसी के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि पश्चिम के देशों ने पिछले आठ सालों में रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया.

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Image caption सर जॉन सैवर्स

वो कहते हैं, "अगर अमरीका और रूस के बीच नियमों को लेकर स्पष्ट समझदारी विकसित की जाती तो सीरिया, यूक्रेन और उत्तरी कोरिया को लेकर क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान निकालना आसान होता."

कई विशेषज्ञों से मैंने जब बात की तो उन्होंने ओबामा सरकार की सपाट कूटनीति को ओर इन हालात के लिए जिम्मेदार बताया.

हो सकता है कि अमरीका की ताकत घटी हो, लेकिन शक्ति संतुलन को लेकर उसकी भूमिका अभी भी बनी हुई मालूम पड़ती है.

सर जॉन सैवर्स ने बीबीसी से अपने इंटरव्यू में कहा, "अमरीका के अगले राष्ट्रपति पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी कि वो नए सिरे से रूस के साथ संबंधों को विकसित करें. हम रूस के साथ रिश्तों में कोई बहुत गर्माहट की उम्मीद नहीं करते और ना ही रूखे संबंध की उम्मीद करते हैं." (वो हिलेरी क्लिंटन के राष्ट्रपति बनने की उम्मीद करते हैं.)

वो कहते हैं कि अमरीकी दबदबे वाली दुनिया का काल बहुत कम दिनों का था. अब यह पूरा हो चुका है.

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