हिलेरी या ट्रंप, भारत के लिए कौन बेहतर?

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हिलेरी क्लिंटन या डोनल्ड ट्रंप के अमरीकी राष्ट्रपति बनने से दुनिया और ख़ास कर भारत पर क्या असर पड़ेगा? इसे आसानी से समझा जा सकता है क्योंकि एक के पास नीतियां बनाने का लंबा अनुभव है जबकि दूसरे का पास कोई अनुभव ही नहीं है.

अपने 30 साल के सार्वजनिक जीवन में हिलेरी महिलाओं के स्वास्थ्य से लेकर एशिया में अमरीका की भूमिका तक, कई मुद्दों पर नीतियां बनाने से जुड़ी रहीं. ओबामा प्रशासन में विदेश मंत्री की हैसियत से उन्होंने 100 से ज़्यादा देशों की यात्रा की और वे दुनिया के कई नेताओं को व्यक्तिगत तौर पर जानती हैं.

दूसरी ओर, ट्रंप अंतरराष्ट्रीय मामलों से मोटे तौर पर अनभिज्ञ हैं. वे एक व्यापारी हैं, नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नैटो) और कश्मीर जैसे मुद्दों को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन वे अपने अज्ञान को फ़ायदे की चीज बना ले रहे हैं और अपने आप को इस रूप में पेश कर रहे हैं जो सब कुछ बदल कर रख देगा. उनका कहना है कि वे व्यवस्था को झकझोर कर रख देना चाहते हैं.

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इससे वे वोटर उनकी ओर खिंचे चले आ रहे हैं, जिनका दोनों ही पार्टियों से मोहभंग हो चुका है. पर अनुभव की कमी और कई बार बग़ैर सोचे समझे बोल देने की वजह से उनके समर्थक भी उन्हें बोझ मानने लगे हैं.

तीसरी और अंतिम बहस के बाद वे तमाम सर्वेक्षणों में क्लिंटन से पीछे थे. न्यू यॉर्क टाइम्स का अनुमान है कि हिलेरी क्लिंटन के जीतने की संभावना 92 प्रतिशत है.

भारत के मामले में ट्रंप लीक से हट कर चलने वाले इंसान हैं, जिसकी महत्वपूर्ण मुद्दों पर राय मूड के हिसाब से बदलती रहती है. अमरीका के सहयोगियों पर सवालिया निशान लगाने की वजह से एशिया के सत्ता समीकरण में जो जगह खाली हो सकती है, उसे चीन भर सकता है. यह भारत के हितों के ख़िलाफ़ होगा.

भारतीय मूल के एक अमरीकी व्यवसायी ने रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन नाम का एक संगठन बनाया है. इसकी एक रैली में ट्रंप ने कहा कि यदि वे राष्ट्रपति चुने गए तो भारत के 'सबसे अच्छे दोस्त" साबित होंगे.

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ट्रंप ने इसी रैली में यह भी कहा कि उन्हें भारत और हिंदुओं से 'प्रेम' है. साफ़ है, धर्म और देश के नाम पर वे उलझन में हैं.

कश्मीर के मुद्दे पर भारतीय पत्रकारों के सवालों पर वे बचते रहे. लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर दोनों देशों में मध्यस्थता करने की पेशकश कर दी. ऐसा लगता है कि इस विषय पर उन्होंने तैयारी नहीं की है, क्योंकि वे कश्मीर पर मध्यस्थता भी करें और भारत का दोस्त भी बने रहें, ऐसा नहीं हो सकता.

प्रचार अभियान के शुरू में ही ट्रंप ने पाकिस्तान को "शायद सबसे ख़तरनाक" देश क़रार दिया था. उन्होंने संकेत दिया था कि "पाकिस्तान को रोकने में" "भारत को लगाएंगे". इस बयान से भारत के कुछ लोगों को शायद खुशी हुई हो, पर यह सिर्फ कल्पना है.

दूसरी ओर, हिलेरी को दक्षिण एशिया की समझ है. उन्होंने ही अपने पति बिल क्लिंटन को समझाया था कि वे राष्ट्रपति पद पर रहते हुए अंतिम साल में भारत का दौरा करें.

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सीनेटर रहते हुए हिलेरी अमरीकी कांग्रेस के इंडिया कॉकस की प्रमुख थीं. ओबामा प्रशासन में विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान "सांप" पालता है. उनका इशारा चरमपंथियों की ओर था.

उन्होंने एशिया प्रशांत में चीन की बराबरी करने के लिए एशिया में अमरीका की एक "धुरी" बनाने का सुझाव ओबामा को दिया था. उन्होंने भारत से कहा था कि वह अपने "लुक ईस्ट" नीति में "एक्ट ईस्ट" भी जोड़े.

क्लिंटन अपनी एशिया में धुरी बनाने की नीति पर चलेंगी, इससे भारत को सुरक्षा के लिहाज से फ़ायदा है. नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान भारत अमरीका के और नज़दीक आया है. एशिया प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र पर क्या दृष्टि होगी, इस पर बीते साल दोनों देशों ने एक साझा बयान जारी किया. यह चीन को संकेत देने के लिए था.

क्लिंटन की जीत को भारत सकारात्मक रूप से देखे और चीन इसके उलट सोचे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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क्लिंटन ने चीन में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जताई है. हाल ही में विकीलीक्स के जारी किए गए ई-मेल के मुताबिक़, हिलेरी ने गोल्डमैन सैक्स के अधिकारियों के साथ 2013 में हुई बैठक में दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावों को ज़बरदस्त चुनौती दी थी.

चीन को रोकने के लिए एशिया में अमरीकी मौजूदगी भारत के हित में है. अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी फ़ौज के हटने पर वहां चल रही परियोजनाओं और सुरक्षा के लिहाज से भारत को नुक़सान होगा.

ट्रंप ने नैटो समेत तमाम अमरीकी गठबंधनों पर सवाल उठाए हैं. इसलिए यह साफ़ नहीं है कि वे ओबामा की किस विदेश नीति पहल को आगे बढ़ाएंगे. ठीक इसी वजह से चीनी विश्लेषक उनके पक्ष में हैं. ट्रंप अलग थलग रहने की नीति में यक़ीन करते हैं और वे चीन को चुनौती नहीं देंगे.

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व्यापार और आर्थिक नीतियो पर मिला जुला हाल है. दोनों ही उम्मीदवार "आउटसोर्सिंग" के ख़िलाफ़ हैं. यह भारत के सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियों के लिए अहम मुद्दा है.

दोनों ने एक दूसरे पर आरोप लगाया है कि उनकी वजह से ज़्यादा नौकरियां देश के बाहर गईं. उन्होंने कहा कि वे देश में नौकरी के और अधिक अवसर बनाने के लिए अमरीकी कंपनियों पर दवाब डालेंगे.

हिलेरी के एक प्रचार विज्ञापन में दावा किया गया है कि "डोनल्ड ट्रंप की कमीज़ चीन से आती है, उनके सूट मेक्सिको और कोट भारत से आते हैं." एक भाषण में क्लिंटन ने ट्रंप की यह कह कर आलोचना की है कि वे "अपने पिक्चर फ्रेम विस्कोन्सिन नहीं, भारत में बनवाते हैं".

ट्रंप के एक प्रचार विज्ञापन में क्लिंटन को 2008 में नई दिल्ली में एक निजी कार्यक्रम में बोलते हुए दिखाया गया है. इसमें वे कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि आप आउटसोर्सिंग को कारगर तरीके से रोक सकते हैं. सच्चाई के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने का कोई उपाय नहीं है." इस कार्यक्रम के पहले क्लिंटन फाउंडेशन को कथित तौर पर 10 लाख डॉलर का दान दिया गया था.

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भारत के लिए दिलचस्पी का दूसरा मुद्दा एचवन-बी वीज़ा है. यह वीज़ा अमरीका में अस्थाई रूप से काम करने के लिए दिया जाता है. इसका ज़्यादातर इस्तेमाल भारत की प्रौद्योगिकी कंपनियां करती हैं. आलोचकों का कहना है कि भारतीय कर्मचारी कम पैसे में काम करने को राजी हो जाते हैं और अमरीकियों को मिलने वाली नौकरी उन्हें मिल जाती है.

ट्रंप के वेबसाइट पर एचवन-बी वीज़ा सिस्टम को पूरी तरह बदलने की बात कही गई है. इसमें विदेशियों को दी जाने वाली नौकरियों के लिए अधिक वेतन देने की बात कही गई है. इससे एचवन-बी वीज़ा के तहत लोगों को नौकरी पर रखना अमरीकी कंपनियों के लिए महंगा हो जाएगा. ट्रंप यह भी चाहते हैं कि ये कंपनियां अमरीकी कर्मचारियों को पहले नौकरी दें.

प्रौद्योगिकी कंपनियों की ज़बरदस्त प्रतिक्रिया के बाद ट्रंप ने अपना रवैया नरम कर दिया. उन्होंने कहा कि प्रतिभावान विदेशी, ख़ास कर वे जिनके पास विज्ञान में डिग्री हो वे अमरीका में रहें, इसकी व्यवस्था होनी चाहिए.

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हिलेरी क्लिंटन ने एचवन-बी वीज़ा पर कुछ नहीं कहा है. पर उन्होंने यह ज़रूर कहा कि यह "दुखद" है कि अमरीकी कर्मचारी नौकरी गंवा दें और अपनी जगह एचवन-बी वीज़ा पर काम करने वालों को प्रशिक्षण दें.

उन्होंने न्यू यॉर्क से सीनेटर रहते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ काम किया था और उनके प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाया था.

ग़ैरक़ानूनी अप्रवासी की समस्या से निपटने के लिए होने वाले सुधारों के तहत वे एचवन-बी वीज़ा सिस्टम में बदलाव को स्वीकार कर सकती हैं.

बौद्धिक संपदा की सुरक्षा जैसे दूसरे व्यापार मुद्दों पर दोनों उम्मीदवार ओबामा प्रशासन जैसा ही कड़ा रुख अपना सकते हैं. अमरीकी दवा कंपनियां भारत के पेटेंट नियमों में बड़े बदलाव चाहती हैं. इस बदलावों से भारत में में जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियों को नुक़सान होगा.

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भारत में व्यापार करने में होने वाली दिक्क़तों के मुद्दे पर दोनों अमरीकी दलों को भारत से काफ़ी शिकायतें हैं. इसी तरह अड़चन पैदा करने वाली व्यापार नीतियों, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर रोक जैसे मुद्दों पर भी रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के विचार एक से हैं.

लेकिन ये शिकायतें अमरीकी कंपनियां करती हैं और कई बार अमरीकी अधिकारी भारतीय अधिकारियों से इसे बताते भी हैं. इसमें बदलाव नहीं होगा.

(सीमा सिरोही वाशिंगटन में रहने वाली विश्लेषक हैं वे गेटवे हाउस में लिखती हैं)

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