क्या अमरीकी चुनाव में धांधली संभव है?

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अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में इस बार आरोप और प्रत्यारोप के तीर जमकर चल रहे हैं. रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप का आरोप है कि चुनाव में बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ीवाड़ा हो रहा है. ताकि उन्हें हराया जा सके.

तो क्या अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में धांधली हो सकती है?

ट्रंप और उनकी टीम काफ़ी दिनों से चुनाव में धांधली का आरोप लगा रही है. उनका कहना है कि मीडिया भी इस काम में हिलेरी क्लिंटन की मदद कर रहा है. हाल के दिनों में ट्रंप की टीम ने इस बात को और भी ज़ोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है. सोशल मीडिया पर बाक़ायदा मुहिम चलाकर ट्रंप और उनकी टीम चुनाव में धांधली को बड़ा मुद्दा बना रही है.

चलिए एक नज़र डालते हैं ट्रंप के धांधली के दावों और सच्चाई के बीच फ़र्क़ पर--

1. डोनल्ड ट्रंप कहते हैं कि मतदाताओं की सूची में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की जा रही है. वो ये आरोप लगाने में अकेले नहीं. रिपब्लिकन पार्टी के सिर्फ एक तिहाई समर्थकों को ही भरोसा है कि वोटों की गिनती ईमानदारी से होगी. हालांकि अमरीका में वोटिंग में फ़र्ज़ीवाड़ा मामूली तौर पर ही होता है. बड़े पैमाने पर धांधली अब तक तो नहीं देखी गई है.

2014 में लोयोला लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर जस्टिन लेविट ने अपने रिसर्च में पाया था कि दूसरे के नाम से वोट डालने के केवल 31 मामले देखे गए थे. और ये आंकड़ा साल 2000 से 2014 के बीच अमरीका में हुए सभी चुनावों को मिलाकर था.

इस दौरान अमरीकियों ने एक अरब वोट डाले. इसी तरह न्यूज़21 के रिसर्च में पता चला कि साल 2000 से अब तक दूसरे के नाम से वोट डालने के कुल दस मामले ही सामने आए हैं.

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जानकार कहते हैं कि अमरीका में हर राज्य के चुनाव के अपने अलग नियम हैं. ज़्यादातर राज्यों में पर्यवेक्षक, राजनैतिक कार्यकर्ताओं पर भी निगाह रखते हैं. हर राज्य में वोटर पहचान पत्र और वोटिंग मशीनें भी अलग-अलग होती हैं. ऐसे में बड़े पैमाने पर धांधली मुमकिन नहीं दिखती.

2. नॉत्रेडम यूनिवर्सिटी के लॉयड हितोशी मेयर कहते हैं कि मर चुके लोगों के नाम पर वोटिंग के बेहद कम मामले ही देखने को मिलते हैं. ये संख्या इतनी कम होती है कि असल नतीजों पर इनका असर न के बराबर होता है.

जैसे फिलाडेल्फिया में 2012 के चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी को एक शहर के 59 इलाक़ों में एक भी वोट नहीं मिला था. हालांकि जांच के बाद रिपब्लिकन पार्टी ने ख़ुद पाया कि वहां कोई गड़बड़ी नहीं हुई थी.

3. चुनाव के दिन राजनैतिक दल मतदाताओं को बसों में बैठाकर पोलिंग बूथ तक ले जाते हैं. आम तौर पर पार्टियां अपने रुझान वाले इलाक़ों में ही गाड़ियां भेजती हैं. ऐसे में भी फर्ज़ीवाड़े का डर कम हो जाता है

4. हाल ही में रिपब्लिकन नेता न्यूट गिंगरिच ने आरोप लगाया कि 1960 में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जॉन एफ कैनेडी ने फर्जीवाड़े से चुनाव जीता था. उनका रिपब्लिकन उम्मीदवार रिचर्ड निक्सन से कड़ा मुक़ाबला था.

लेकिन स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर कैनेडी ने इलिनॉय राज्य में 51 इलेक्टोरल वोट अपने हक़ में डलवा लिए थे. गिंगरिच के मुताबिक़, कैनेडी, बेहद क़रीबी मुक़ाबले में धांधली करके जीते थे.

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हालांकि राइस यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डगलस ब्रिंकले कहते हैं कि अब तक ये आरोप सही नहीं पाए गए हैं.

प्रोफ़ेसर लॉयड मायर्स कहते हैं कि आज के ज़माने में जब सरकारी एजेंसियां और अफ़सरों के पास निगरानी के इतने तरीक़े मौजूद हैं, ऐसी धांधली कमोबेश नामुमकिन है.

डोनल्ड ट्रंप की टीम का आरोप है कि इस बार दूसरों के नाम पर वोट डालने की कोशिश होगी. प्रोफेसर मायर्स कहते हैं कि अमरीका में ऐसी धांधली बहुत मामूली तौर पर ही होती है.

इसके मुक़ाबले सरकारी तौर पर होने वाली धांधली से ज़्यादा नुक़सान होता है. जब स्थानीय प्रशासन किसी ख़ास उम्मीदवार के समर्थन में होता है तो या तो बैलट बॉक्स में नक़ली वोट भर देता है. या फिर बैलट बॉक्स को ही गुम कर देता है.

हालांकि अब तो ये भी बहुत कम हो गया है.

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