नेहरू को माला पहनाने की सज़ा भुगत रही महिला

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Image caption बुधनी मंझिआईन मोबाइल में नेहरू को माला पहनाती तस्वीर दिखाती हुई. उन्होंने यह तस्वीर अख़बार से खींची है.

तारीख़ थी छह दिसंबर. साल 1959. दिन-रविवार. धनबाद ज़िले के खोरबोना गांव की बुधनी मंझिआईन काफ़ी ख़ुश थीं. उन्होंने अच्छी साड़ी पहनी. प्रिंटेड ब्लाउज़. कान में झुमके और संथालियों के पारंपरिक हार. उस वक़्त उनकी उम्र महज़ 15 साल थी.

झारखंड में दामोदर वैली कॉरपोरेशन (डीवीसी) के अफ़सरों ने उन्हें प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के स्वागत के लिए चुना था.

उस दिन नेहरू झारखंड में बने पंचेत बांध का उद्घाटन करने आने वाले थे. पंचेत पहुंचने पर बुधनी मंझिआईन ने उनका पारंपरिक तरीक़े से स्वागत किया. उन्हें माला पहनाई गई. चंदन लगाकर आरती उतारी गई. प्रधानमंत्री नेहरू ने पंचेत बांध का उद्घाटन बुधनी से ही कराया.

वे चाहते थे कि बांध के निर्माण में लगा मज़दूर ही इसका उद्घाटन करे. इसलिए प्रधानमंत्री नेहरू की मौजूदगी में बुधनी ने बटन दबाकर पंचेत बांध का उद्घाटन किया.

इसके साथ ही वे सुर्खियों में आ गईं. कोलकाता से प्रकाशित 'स्टेट्समैन' और 'आनंद बाज़ार पत्रिका' समेत कई अख़बारों ने प्रधानमंत्री नेहरू के साथ उनकी तस्वीरें और उद्घाटन की ख़बर पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापीं.

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बुधनी मंझिआईन भारत की शायद पहली मज़दूर होंगी, जिनके हाथों किसी परियोजना का उद्घाटन कराया गया. इस समारोह की एक और दिलचस्प कहानी सिर्फ़ पंचेत क़स्बे में दबकर रह गई. मैं इसी कहानी की तलाश में पुरुलिया (बंगाल) और पंचेत (झारखंड) गया.

छह दिसंबर, 1959 की रात बुधनी की ज़िंदगी में तूफ़ान लेकर आई. दिन में प्रधानमंत्री के साथ मंच सांझा करने वाली बुधनी को उनके गांव के लोगों ने रात में गालियां दीं. समारोह के बाद घर लौटने पर बुधनी के साथ काफ़ी बुरा व्यवहार किया गया.

बुधनी मंझिआईन ने बीबीसी से कहा, "उस रात खोरबोना गांव में संथाली समाज की बैठक हुई. मुझे बताया गया कि मैं नेहरू की पत्नी बन चुकी हूं. लोगों ने कहा कि पंडित नेहरू को माला पहनाने के साथ ही आदिवासी परंपरा के मुताबिक़ मैं उनकी पत्नी बन गई. क्योंकि पंडित नेहरू आदिवासी नहीं थे, इसलिए एक ग़ैर-आदिवासी से शादी रचाने के आरोप में संथाली समाज ने मुझे जाति और गांव से बाहर निकालने का फ़ैसला सुना दिया."

क्या आपने नेहरू को माला पहनाई थी? इस सवाल पर बुधनी मंझिआईन असहज हो गईं.

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बुधनी ने कहा, "मैंने नेहरू को माला नहीं पहनाई थी. मैंने सिर्फ़ उनसे हाथ मिलाया था. बस, इतनी-सी ख़ता की क़ीमत मुझे गांव और जाति से बाहर होकर चुकानी पड़ी. मैं डीवीसी के पावर हाउस में मज़दूर थी. पंचेत आ गई, ताकि यहां रहकर नौकरी कर सकूं. अपना पेट पाल सकूं. लेकिन, साल 1962 में मुझे डीवीसी ने भी नौकरी से निकाल दिया."

बुधनी मंझिआईन बताती है कि इस दौरान पंचेत में उनकी मुलाक़ात सुधीर दत्त से हुई. वे उनके साथ रहने लगीं, लेकिन समाज के डर से सुधीर दत्त से उनकी औपचारिक रूप से शादी नहीं हो सकी. इन दोनों को एक बेटी हुई. बुधनी इन दिनों अपनी बेटी रत्ना और दामाद के साथ पंचेत में रहती हैं.

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आदिवासी मामलों के शोधकर्ता अश्विनी पंकज ने बीबीसी को बताया कि साल 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री और नेहरू के नाती राजीव गांधी ने बुधनी की खोज करवाई, तो उन्हें इनकी बेरोज़गारी का पता चला. उन्हें नेहरू से जुड़े प्रसंगों की रिसर्च के दौरान बुधनी के बारे में पता चला.

इस बारे में बुधनी मंझिआईन ने बताया कि राजीव गांधी के बुलावे पर वे उनसे मिलने भिलाई गईं. इसके बाद डीवीसी ने उन्हें फिर से नौकरी पर रख लिया. राजीव गांधी ने इसकी पहल की थी. अब वे रिटायर हो चुकी हैं.

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अब आप क्या चाहती हैं? इस सवाल पर बुधनी मंझिआईन कहती हैं, "राहुल गांधी से कहकर मेरे लिए घर बनवा दो. मेरी बेटी को नौकरी दिलवा दो, ताकि, हम बची ज़िंदगी आराम से काट सकें."

बुधनी मंझिआईन के साथ नेहरू का स्वागत करने वाले रावोण मांझी ने बीबीसी से कहा, "नेहरू जी ने कहा था कि मुफ़्त बिजली मिलेगी. घर बनेगा. लेकिन हम लोगों का कुछ नहीं हुआ."

वे पंचेत में ज़रूर रहते हैं, लेकिन बुधनी मंझिआईन से जुड़ी बातों को याद करना नहीं चाहते.

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