ट्रंप के सपने! कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना?

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कहां बढ़ रहे हैं ट्रंप समर्थक ?

पिउ रिसर्च के अनुसार, इस बार के चुनावों में अर्थव्यवस्था अमरीकी वोटरों के लिए अहम मुद्दा है. ख़ासतौर से डोनल्ड ट्रंप के 90 फ़ीसद समर्थकों के लिए यह सबसे बड़ा मुद्दा है.

पूरे देश में हुए कुछ और सर्वेक्षणों में भी अर्थव्यवस्था को सुधारने के मामले में वोटरों की राय थी कि ट्रंप हिलेरी क्लिंटन से बेहतर साबित होंगे.

अमरीकी चुनावों पर हमारी विशेष श्रृंखला की दूसरी कड़ी में बीबीसी ने इसी मुद्दे पर देश के अलग-अलग हिस्सों में आम अमरीकियों से बात की.

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अमरीकी चुनाव में पेनसिलवेनिया की भूमिका

न्यूयॉर्क राज्य के बफ़ेलो शहर में कभी हज़ारों को रोज़ी रोटी देनेवाला बेथलेहेम स्टील प्लांट लगता है जैसे आज अपनी क़िस्मत पर रो रहा है. गर्म पिघलते लोहे की जगह यहां सीलन से भरी दीवारें और ज़ंग लगे ढांचे दिखते हैं.

ऐसी ही कुछ बंद पड़ी और कुछ अभी भी धुंआ उगल रही मिलों के साए तले स्वानि हाउस अर्थव्यवस्था की गाड़ी को बरसों से रुकते-बढ़ते देख रहा है. यह यहां के सबसे पुराने शराबख़ानों में से है. इसके मालिक टिम वाइल्स एक कोने में बैठकर हर दिन इस शहर से रूबरू होते हैं.

जिस दिन मैं वहां पहुंचा, उस दिन वहां एक बड़ा आइस हॉकी मैच था, जिसकी वजह से बार में ख़ासी रौनक़ थी. लेकिन उस माहौल में भी ट्रंप और क्लिंटन की बहस सुनाई दे रही थी.

वाइल्स का कहना था कि बरसों से सिर्फ़ डेमोक्रेट्स को अपनाने वाला यह इलाक़ा, इस बार ट्रंप का नाम जप रहा है.

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वे कहते हैं, "ट्रंप बेबाक बातें करते हैं. इस शहर के लोग वैसी ही बातें सुनना चाहते हैं. ट्रंप के पास इतना है कि उन्हें इन राजनेताओं की तरह बात करने की ज़रूरत नहीं पड़ती."

उनके बार में आनेवाले ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो या तो ख़ुद या फिर उनका कोई अपना इन बड़ी-बड़ी मिलों में काम कर चुका है और उनके बंद होने पर उन्हें रोज़ी-रोटी के लिए दूसरे रास्ते तलाशने पड़े.

यह अमरीकी मिडल क्लास का वो चेहरा है, जिसे लगता है कि अमरीका की महानता इस बात में थी कि वह बड़ी-बड़ी चीज़ें बनाता था और उसमें पसीना बहानेवाले लोग ही सही मायने में इस देश की अर्थव्यवस्था की धुरी थे.

इन्हें उम्मीद है कि ट्रंप ने जिस तरह से अपना बिज़नेस खड़ा किया है, उसी तरह वो इन कारख़ानों को वापस ले आएंगे.

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बार में अपनी पत्नी के साथ वहां आए एक साहब, जिन्होंने कई बार आग्रह करने पर भी अपना नाम नहीं बताया, पिछले पचास सालों से हर दिन एक फ़ैक्ट्री में सुबह तीन बजे की शिफ़्ट में जाते हैं. वे कहते हैं कि उन्हें स्टील के अलावा न तो कुछ बनाना आता है और न ही वे सीखना चाहते हैं.

वे कहते हैं, "ट्रंप की कई बातें मुझे पसंद नहीं हैं, ख़ासतौर से जिस तरह से वे औरतों के बारे में बात करते हैं. लेकिन आज अगर अर्थव्यवस्था की कमान मुझे किसी के हाथ में सौंपनी हो तो वो ट्रंप ही होंगे."

स्वानि हाउस से कुछ ही दूरी पर जहां कभी बंद कारख़ाने होते थे, वहां बन रहा है सोलर सिटी. इससे हज़ारों नौकरियां पैदा होने के आसार हैं. लेकिन लाल पिघलते लोहे के सामने इस तबक़े को इस नई अर्थव्यवस्था के ये रंग फीके लगते हैं.

देखा जाए तो ओबामा के आठ सालों में अर्थव्यवस्था काफ़ी बेहतर हुई है और बेरोज़गारी की दर नीचे गई है. लेकिन रस्टबेल्ट कहलानेवाले इन इलाक़ों से बड़े कारख़ानों का पलायन पिछले 40-50 सालों से लगातार चल ही रहा है.

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Image caption ज़्यादातर अमरीकी यह मानते हैं कि नई अर्थव्यवस्था में पुराने कारखनों की वापसी नहीं हो सकती

ओहायो के यंग्सटाउन इलाक़े में एक से एक बड़ी स्टील मिलों के कंकाल नज़र आते हैं. कभी उन्हीं में से एक में काम करने वाले मार्क जिलेट आज स्कूल बस चलाते हैं.

उनका कहना है कि बड़ी फ़ैक्ट्रियां तो सत्तर-अस्सी के दशक में ही बंद होनी शुरू हो गई थीं. लेकिन उसके बाद जिस तरह के वाणिज्य समझौते हुए, उसने उनके वापस खड़े होने की उम्मीद ख़त्म कर दी.

इसमें वो ख़ास तौर से बिल क्लिंटन के नॉर्थ अमरीकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी नैफ़्टा समझौते का ज़िक्र करते हैं.

कहते हैं, "ट्रंप ने कहा है कि वे सभी व्यापार समझौतों को रद्द करेंगे और अमरीका के हितों को सबसे ऊपर रखेंगे. हिलेरी अभी तो कह रही हैं कि वे हमारे हितों का ख़्याल रखेंगी, लेकिन वे वॉल स्ट्रीट के हाथों बिकी हुई हैं."

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यह नारा काफ़ी हद तक प्राइमरी चुनावों में हिलेरी के ख़िलाफ़ खड़े उनके डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंदी बर्नी सैंडर्स ने दिया था. ट्रंप ने इसे और ज़ोरदार ढंग से बुलंद किया.

इस बार के चुनावों में एक तरह से अमरीका के चारों ओर न सिर्फ़ ईंट और गारे की दीवार बनाने की बात हो रही है, बल्कि एक संरक्षणवादी (प्रोटेक्शनिस्ट) अर्थव्यवस्था की दीवार की बुनियाद डालने की कोशिश भी की जा रही है.

हिलेरी क्लिंटन को काफ़ी हद तक प्राइमरी चुनावों के दौरान अपने रूख़ में बदलाव लाना पड़ा और फ़िलहाल वे भी इसी तरफ़ झुकती नज़र आ रही हैं. जहां बड़े-बड़े कारख़ाने थे वहां यह सोच वोटरों को काफ़ी भा रही है.

जब ट्रंप चीन और मेक्सिको से नौकरियां वापस लाकर यहां के कारख़ानों को फिर से शुरू करने की बात करते हैं, तो तालियों की गूंज थमती नहीं है. लेकिन आर्थिक जानकारों की मानें तो ट्रंप जो ख़्बाब दिखा रहे हैं, उसे आज की दुनिया में पूरा करना असंभव सा है.

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Image caption कैलीफ़ोर्निया स्थित टेस्ला कारखान में बिजली से चलने वाली गड़ियां बनती हैं

इसी माहौल में नई अर्थव्यवस्था, एक नई सोच भी पैदा हो रही है.

पेंसिलवेनिया के ईरी शहर में रेडियस कोवर्क के नाम से अपनी कंपनी शुरू करनेवाले बिल शॉल्ज़ और शॉन फ़ेडोर्को का मानना है कि ट्रंप जितने भी वादे कर लें, बड़े कारख़ाने अब वापस नहीं आ रहे. अब तो सारा खेल कुर्सी, कंप्यूटर और टेक्नॉलॉजी का है.

शॉन फ़ेडोर्को कहते हैं, "मेरे और बिल दोनों ही के पिता मिलों में काम करते थे. लेकिन वो अर्थव्यवस्था अब मर चुकी है."

इन दोनों ने एक ख़ाली पड़े फ़्लोर को कम्युनिटी वर्कस्पेस में तब्दील कर दिया है, जहां आकर कोई भी बहुत छोटी सी रक़म देकर इंटरनेट पर अपना बिज़नेस शुरू कर सकता है.

ईरी शहर की आबादी अब मुश्किल से एक लाख की रह गई है, सड़कें सूनी दिखती हैं. रेल की पटरियां बनानेवाली जी ई कंपनी में 15,000 कामगार थे. अब यहां सिफ़ 2,500 लोग काम करते हैं.

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वेलोसिटी नेटवर्क के नाम से एक इंटरनेट कंपनी चलानेवाले जोएल डिउटरमैन कहते हैं कि एक बड़ी कंपनी बंद होती है तो जैसे पूरे शहर को सदमा लग जाता है.

वे कहते हैं, "मैं तो चाहूंगा कि एक साथ 2500 लोगों को नौकरियां देने वाली एक कंपनी की जगह सौ-सौ लोगों को नौकरियां देने वली 25 कंपनियां लगें. यह आज के वक़्त की ज़रूरत है."

वे कहते हैं यहां सब कुछ अभी सस्ता है, इमारतें ख़ाली पड़ी हैं. अमरीकी कंपनियां जो काम बेंगलुरु में करवाती हैं, वे रस्टबेल्ट के ऐसे शहरों में भी हो सकता है. लेकिन ट्रंप लोगों को वह रास्ता नहीं दिखा रहे हैं.

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शहर में कई ऐसे लोग हैं, जिनके अपनों ने यहां के बड़े कारख़ानों में काम किया है. लेकिन वे अब उधर नहीं देख रहे. उनका मानना है कि अमरीकन ड्रीम अब अगर पूरा हो सकता है तो इस नई डिजिटल इकॉनॉमी की वजह से.

नई अर्थव्यवस्था की बात करनेवाले इन लोगों में से ज़्यादातर हिलेरी क्लिंटन को वोट देने की बात कर रहे हैं. काफ़ी हद तक रस्टबेल्ट के वोट नई और पुरानी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बंट रहे हैं.

एक बड़ा तबक़ा है, जो मानता है कि ट्रंप बंद पड़े कारख़ानों में जान डाल देंगे, दूसरा वर्ग वह है, जो कहता है कि ये यू टर्न मुमकिन नहीं है.

(अगली कड़ी में बात होगी कि 2016 में भी नस्लवाद क्यों ज़िंदा हैं अमरीका में और काले वोटरों के लिए इस चुनाव के क्या मायने हैं. आप अपनी राय @bbchindi या @brajup पर ज़ाहिर कर सकते हैं.)

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