यहां जेल तो हैं, लेकिन क़ैदी नहीं!

जहां एक ओर भारत, ब्रिटेन और दूसरे देशों की जेलों में क़ैदियों की संख्या बढ़ने की वजह से जेल की व्यवस्था ख़राब हो रही है. वहीं नीदरलैंड में हालात ठीक इसके उलट हैं.

भारत के जेलों में करीब साढ़े तीन लाख क़ैदियों को रखने की व्यवस्था है, लेकिन इन जेलों में फिलहाल करीब सवा चार लाख क़ैदी रह रहे हैं.

इसका मतलब है कि यहां की जेलों में क्षमता से 114 फ़ीसदी ज़्यादा क़ैदी क़ैद है.

वहीं भारत के कुछ राज्यों की जेलों के बारे में बात करें, तो दादर और नागर हवेली में सबसे ज़्यादा 277 फ़ीसदी और उसके बाद छत्तीसगढ़ की जेल में 234 फ़ीसदी ज़्यादा क़ैदी रह रहे हैं.

दिल्ली की जेलों में क्षमता से 227 फ़ीसदी ज़्यादा क़ैदी रह रहे हैं.

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वहीं नीदरलैंड की जेलों में इतने कम क़ैदी आ रहे हैं कि पिछले कुछ सालों में 19 से ज़्यादा जेल बंद करने पड़ गए हैं और अगले साल कई और जेल बंद करने की योजना है.

लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था. करीब एक दशक पहले नीदरलैंड की जेलों में बड़े पैमाने पर क़ैदी थे और यूरोप में जेल जाने वालों की सबसे बड़ी तादाद नीदरलैंड में ही थी.

अब हालात ऐसे हैं कि यहां जेल जाने वाले की दर एक लाख लोगों पर सिर्फ़ 57 की है, जो इंग्लैंड और वेल्स की तुलना में बेहद कम है.

इंग्लैंड और वेल्स में हर एक लाख की आबादी में 148 लोग जेल की हवा खाने वाले हैं.

अब सवाल उठता है कि नीदरलैंड में यह बदलाव कैसे संभव हो पाया.

इसकी एक बड़ी वजह क़ैदियों को सुधारने को लेकर किए गए प्रयास हैं. लेकिन नीदरलैंड में अपराध कम करने में एकमात्र यही वजह नहीं है.

नीदरलैंड में साल 2005 से लेकर पिछले साल तक क़ैदियों की संख्या 14,468 से घटकर 8,245 पर आ गई है. मतलब वहां क़ैदियों की संख्या में 43 फ़ीसदी कमी आई है.

साल 2005 में नीदरलैंड में बड़े पैमाने पर ड्रग माफियाओं के पकड़े जाने की वजह से क़ैदियों की संख्या में इतनी बढ़ोत्तरी देखी गई थी.

क्रिमिनल लॉ की प्रोफेसर पॉलिन स्कॉट के मुताबिक़ अब नीदरलैंड की पुलिस की प्राथमिकताएं सिर्फ़ ड्रग्स तक ही सीमित नहीं रह गई हैं.

वो कहती हैं, "पुलिस अब ड्रग्स पर नहीं, बल्कि मानव तस्करी और चरमपंथ पर अपना ध्यान लगा रही है."

नीदरलैंड में जज अक्सर क़ैदियों को जेल की सज़ा देने के बजाय समाजसेवा और जुर्माना जैसी सज़ाएं देते हैं.

नीदरलैंड में जेलों की व्यवस्था देखने वाली डायरेक्टर एंजेलीन वान डैक का कहना है कि जेल सिर्फ़ उन्हीं क़ैदियों को भेजा जाता है, जिनसे इस बात का ख़तरा रहता है कि वो बाहर जाकर ख़तरनाक साबित होंगे.

वो कहती हैं, "कभी-कभी बेहतर यही होता है कि लोग अपने परिवार और अपने काम-धंधों को करते हुए ही दूसरे तरीकों से सज़ा भुगतें."

आगे वो जेल में क़ैदियों की कम संख्या होने के बारे में बताती हैं, "चूंकि हमारे यहां कम समय के लिए जेल की सज़ा होती है और अपराध दर भी कम हो रहा है, इसलिए हमारे जेलों में अब क़ैदियों की संख्या कम होती जा रही है."

लेकिन कुछ लोग अलग ही दलील देते हैं और अपराध दर कम होने की बात से सहमत नहीं दिखते.

पिछले आठ सालों में अपराध दर में यहां 25 फ़ीसदी की गिरावट आई है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसकी वजह यह है कि बजट कम करने की वजह से पुलिस स्टेशन बंद हो रहे हैं और इसके कारण सभी अपराध पुलिस स्टेशनों में दर्ज नहीं हो पा रहे.

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