ज़ाकिर नाईक: मुस्लिम उपदेशक या नफ़रत फैलाने वाले?

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इस्लाम धर्म के प्रचारक ज़ाकिर नाईक की संस्था इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन पर पांच साल की पाबंदी के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी मुंबई में उनसे जुड़े 10 जगहों पर छापे मारे हैं.

एनआईए ने विवादास्पद उपदेशक और उनके कुछ साथियों के ख़िलाफ़ अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट के तहत शुक्रवार को केस दर्ज किया था.

आईआरएफ़ के एक प्रवक्ता ने कहा कि वो इस पाबंदी को अदालत में चुनौती देने पर विचार कर रहे हैं. संस्था के टीवी चैनल पीस टीवी पर पहले से ही पाबंदी लागू है.

कहा जाता है कि 1 जुलाई को ढाका में हुए आतंकवादी हमले में शामिल एक युवा नाईक के भाषणों से प्रभावित था. कई और चरमपंथियों के भी उनसे प्रभावित होने के दावे किये गए हैं.

बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद की उनके विचार और उनकी निजी ज़िन्दगी पर एक नज़र.

मैं ज़ाकिर नाईक से कभी नहीं मिला.

यूट्यूब पर उन्हें धर्म पर बहस करते और लोगों के सवालों के जवाब देते कई बार देखा है पर कभी मुलाक़ात नहीं हुई. हाँ, एक बार मिलते-मिलते रह गया.

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इसके बावजूद उनके क़रीब के लोगों से कई महीनों से बातें करके और उनसे मुलाक़ात कर चुके उनके भक्तों और विरोधियों की राय सुनकर मेरी नज़रों में उनकी एक छवि बनी है.

वो एक बार बोलना शुरू करते हैं तो रुकते नहीं जिसके कारण वो कभी-कभी मुश्किल में भी पड़े हैं. वो अपने ख़ास और नज़दीकी लोगों के मशविरों को अक्सर नहीं मानते.

इस्लामिक विद्वान होने पर उन्हें नाज़ है. पीस टीवी पर उनके मुरीदों की संख्या 20 करोड़ (ये उनका दावा है) होने पर उन्हें बहुत गर्व है.

खाड़ी देशों में उनकी बड़ी इज़्ज़त है. वो जहां जाते हैं उनके बॉडीगार्ड उनके साथ होते हैं. फ़ैसला करने में संकोच करते हैं. मीडिया से घबराते हैं. मीडिया को किए गए वादे आख़िरी लम्हे में तोड़ देने से हिचकिचाते नहीं.

जुलाई के महीने से मैं उनका इंटरव्यू करने की कोशिश कर रहा हूं. काफी कोशिशों के बाद दुबई में उनके साथ इंटरव्यू तय हुआ. मैंने दुबई जाने की तैयारी कर ली, टिकट और होटल बुक कर लिया. अगले दिन उन से मुलाक़ात होनी थी. तभी उनके दफ्तर से पैग़ाम आया कि उन्होंने इंटरव्यू रद्द कर दिया है. इसका कारण मुझे आज भी नहीं मालूम.

ज़ाकिर नाईक से मिले बग़ैर मैं ये कह सकता हूँ कि उन्हें आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. टाई और सूट पहने, टेलीविज़न के माध्यम से अंग्रेज़ी ज़बान में इस्लाम का प्रचार करने वाले उपदेशक कम ही मिलेंगे.

मुंबई के डॉक्टर ज़ाकिर नाईक जिस तेज़ी और आसानी से क़ुरान की पंक्तियों के उदाहरण दे सकते हैं उतनी ही गीता और बाइबिल से भी. हर सवाल के जवाब में कई धर्मों की पुस्तकों की मिसालें उनकी तरह शायद कोई नहीं दे सकता. उनका दिमाग़ एक कंप्यूटर की तरह काम करता है.

इन्हीं कारणों से मुस्लिम समाज में उनकी लोकप्रियता बढ़ी. उनको मुस्लिम युवाओं ने भी एक आधुनिक मुस्लिम के रूप में देखा, एक पारम्परिक मुल्ला की तरह से नहीं.

लेकिन उन्हें केवल सुन्नी मुस्लिम के एक बड़े तबक़े ने ही स्वीकार किया. सुन्नी बुद्धिजीवियों ने उन्हें और उनकी राय से इत्तेफ़ाक़ नहीं किया.

शिया मुसलमानों ने उन्हें इस्लामिक समाज को विभाजित करने वाला व्यक्ति माना.

मुंबई के एक शिया मुस्लिम अब्बास रिज़वी जो पेशे से इंजीनियर हैं कहते हैं, "भारत में किसी मौलवी या इमाम को फ़र्राटे से अंग्रेजी बोलते सुना है? सूट और टाई में उन्हें देखा है? एक मुस्लिम धर्म गुरु को हिन्दू धार्मिक किताबों से उदाहरण देते सुना है? नहीं ना? यही कारण बने ज़ाकिर नाईक की लोकप्रियता के."

ज़ाकिर नाईक की लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही. उन्होंने दुनिया के कई देशों का दौरा किया और इस्लाम और धर्मों की तुलना करके मुस्लिम समाज में अपनी जगह बनायी. उनके प्रशंसकों और दर्शकों में कई मुस्लिम देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी शामिल हुए.

लेकिन जहां उन्होंने नाम कमाया वहीं अपने विवादास्पद बयानों से वो आलोचना के भी शिकार हुए.

उन्होंने अल-क़ायदा के संस्थापक ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी मानने से इनकार किया, न्यूयॉर्क में 11 सितंबर 2001 के दिन हुए आतंकवादी हमले का ज़िम्मेदार त्तकालनी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को ठहराना और इस्लाम को दूसरे सभी धर्मों से बेहतर होने का दावा करना वग़ैरह.

इस कारण अमरीका, कनाडा और ब्रिटेन ने उन्हें अपने देश में आने की इजाज़त नहीं दी.

भारत सरकार ने 2012 में उनके पीस टीवी चैनल पर प्रतिबन्ध लगा दिया जिसे उन्होंने 2006 में शुरू किया था.

ज़ाकिर नाईक सोलह आने मुंबइया हैं. उनकी हिंदी के उच्चारण से भी ये साफ़ होता है. वो मुंबई में 1965 में पैदा हुए. वहीं से डॉक्टरी की पढ़ाई की.

उनकी इस्लाम में दिलचस्पी 1991 के बाद बढ़ी. उन्होंने 1994 में स्थानीय स्तर पर धार्मिक मुद्दों पर बहस में हिस्सा लेना शुरु किया.

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