'पेट बाइज़्ज़त हल्का कैसे हो, ये जनता जाने!'

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सेहत और सफाई पर काम करने वाले एक एनजीओ वाटर ऐड ने पिछले सप्ताह एक रिपोर्ट जारी की है.

रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया के 70 करोड़ लोगों के लिए ऐसा साफ-सुथरा शौचालय एक सपना है, जिसके कमोड पर बैठकर वो मेरी तरह अख़बार पढ़ सकें.

इस विश्व के वो देश जहाँ एक बाइज़्ज़त शौचालय से वंचित लोग सुबह ही सुबह ख़ुद को हल्का करने के बारे में सोच में पड़ जाते हैं, उनमें भारत तो चोटी पर है ही, उससे ज़रा नीचे पाकिस्तान और बांग्लादेश भी हैं.

और अच्छी ख़बर ये है कि हम तीनों देश अकेले नहीं हैं. हमारे साथ चीन, रूस, ब्राज़ील और इंडोनेशिया जैसे देश भी आगे-पीछे जुड़े हुए हैं.

कैसी आश्चर्यजनक बात है कि सब सरकारों को ये परेशानी तो रहती है कि जनता का पेट भरा रहना चाहिए. मगर पेट बाइज़्ज़त तरीके से खाली कैसे किया जाए, ये जनता जाने...

ज़रा सोचिए कि वो कैसा मंज़र होगा कि एक व्यक्ति भारत या पाकिस्तान में किसी झाड़ी में छुपकर या रेलवे ट्रैक पर मुंह फेरकर इधर-उधर देखते हुए खुद को हल्का कर रहा हो और ऊपर से पृथ्वी या गौरी मिसाइल गुज़र जाए, और वो उठकर खुशी से नारे लगाना शुरू कर दे!

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मेरी तो समझ में नहीं आता कि रोटी, कपड़ा, मकान, सेहत और रोज़गार के साथ टॉयलेट की ज़रूरत को भी मूलभूत अधिकारों की सूची में कैसे शामिल किया जाए, ताकि हम कम से कम ये कहने योग्य हो सकें कि इंसान और घोड़े में बुनियादी फ़र्क़ ये है कि घोड़े के पास टॉयलेट नहीं होता.

क्या भोंडा मज़ाक है कि इस दुनिया में हर साल साढ़े तीन लाख बच्चे सिर्फ इसलिए दस्त और पेट की दूसरी बीमारियों से मर जाते हैं कि उनकी क़िस्मत में एक साफ-सुथरा शौचालय ही नहीं, जहां वो पेट हल्का करने के बाद ढंग से हाथ धो सकें.

कहने को भारत-पाकिस्तान के बड़े-बड़े शहरों में नाम को पब्लिक टॉयलेट बने हुए हैं, मगर मैंने तो आज तक इनमें किसी महिला को आते-जाते नहीं देखा.

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ज़रा सोचिए आपको घर से पांच या छह घंटे घर से बाहर रहना पड़ जाए और आप महिला भी हों तो आपके दिल-दिमाग और बदन की क्या हालत होगी.

इस दुनिया में करोड़ों महिलाएं हर रोज़ इसी अत्याचार से गुज़रती हैं और पुरुषों की दुनिया को अहसास तक नहीं होता.

अगर प्रगति इसे कहते हैं कि किस देश के पास कितने परमाणु बम और मिसाइल हैं तो ये इसलिए क्योंकि जो लोग ये सब कुछ बना रहे हैं और उनके बारे में निर्णय ले रहे हैं, उन्हें ख़ुद एक साफ-सुथरे टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध है.

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ज़रा तसव्वुर करें कि यदि मोदी जी या नवाज़ शरीफ किसी ऐसी जगह 24 घंटे के लिए फंस जाए जहां दूर-दूर तक सिवाय खेतों के कोई टॉयलेट ना हो.

कोई-कोई पत्रकार उनके साथ-साथ दौड़ता हुआ पूछ ले कि श्रीमान टॉयलेट को डालिए नरक में और ये बताइए कि काला धन कैसे ख़त्म होगा....? और कश्मीर की समस्या का आपकी नज़र में क्या समाधान है...?

सोचिए कैसा क़रारा जवाब मिलेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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