आपको छोटू कहने में मज़ा क्यों आता है?

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आपको छोटू कहने में मज़ा क्यों आता है?

भारत होके पाकिस्तान मिडिल क्लास घरानों में कामकाज़, सफाई, सौदा सुलफ़ लाने, छोटे बच्चों को बहलाने, बीमार बूढ़ों का ख़याल रखने, दफ़्तर तक खाना पहुंचाने जैसे बीसियों ऐसे काम हैं जिनके लिए हेल्पर रखा जाता है. बहुत कम हेल्पर ऐसे होते हैं जो 24 घंटे घरों में रहते हों.

अक्सर सुबह आते हैं और शाम को चले जाते हैं. कहीं उन्हें पग़ारखाना, उतरन के कपड़े और होली-दिवाली, ईद-बकरीद पर थोड़ी बहुत खर्ची भी मिल जाती है और कहीं सिर्फ़ पग़ार मिलती है. ज़्यादातर हेल्पर 10-15 साल तक के ग़रीब बच्चे-बच्चियां होते हैं क्योंकि वो कोई ख़ास डिमांड नहीं करते.

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Image caption हेल्पर्स को लोग असली नाम से क्यों नहीं पुकारते?

उन्हें कंट्रोल करने और ज़्यादा काम लेना आसान होता है. परिवार में कोई भी नापसंद करे तो काम से एक मिनट में छुट्टी कराई जा सकती है. जितनी कम या ज़्यादा पग़ार दे दो ये चुप रहते हैं. कुछ बोले तो अगले दिन कोई और बच्चा या बच्ची उनकी जगह ले लेगा. इन हेल्पर्स का कोई न कोई नाम- रामचंद्र, रागिनी, मोहम्मद अली, शफिया वग़ैरह उनके मां-बाप ने ज़रूर रखा होगा.

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मगर अक्सर मालिकों को उनका असल नाम जानने और पुकारने से कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती.

उन्हें छोटू, छूटिया, लड़के, कप्पू, कालिया, नत्थु-फत्थु जैसे नाम से पुकारने में किसी को कोई दिक्क़त नहीं होती. हममें से अक्सर ये सोचकर ये आराम से हो जाते हैं कि इन हेल्पर्स की न आंखें होती हैं, न कान, न ज़बान, न दिल, न दिमाग़ और न ज़ज्बात. बस खाना और चंद सौ रुपल्लियां टिकाओ और महीना भर अहसान जताते रहो.

पाकिस्तान में ऐसे हेल्पर्स जिन्हें ख़ाला, बीबी, बेटा या बेटी के बजाय कामवाली, मासी और छोटू वग़ैरह कहा जाता है, इनकी तादाद 90 लाख से अधिक होने का आंकड़ा है. ये वर्कर ज़्यादातर किसी के रेफ़रेंस से आते हैं या फिर ख़ुद दरवाजा खटखटाके मालूम कर लेते हैं कि काम चाहिए या नहीं.

पिछले सप्ताह मेरी नज़र एक इंडियन वेबसाइट पर पड़ी. नाम देखके जी खुश हो गया. 'बुक माइ छोटू'.

ये वेबसाइट 18 वर्ष से ऊपर के छोटू प्रति घंटा पग़ार की बुनियाद पे घरेलू कामकाज़ के लिए मुहैया करती है. आप इन छोटुओं से टॉयलेट की सफाई और कपड़ों की धुलाई के सिवा हर छोटा मोटा काम करवा सकते हैं. कोई चीज़ ग़ायब होने की जिम्मेदार कंपनी नहीं होगी. काम पर आते और जाते वक़्त छोटू की तलाशी आपकी जिम्मेदारी है.

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Image caption ये बच्चे अक्सर सुबह आते हैं और शाम को चले जाते हैं

कई लोग ऐतराज कर सकते हैं कि भई इस वेबसाइट का नाम बुक माय छोटू क्यों है. जैस हम अब चपरासी को नायब कासीद, नाई को हेयर ड्रेसर, कसाई को बड़े साहब और गवइए को ख़ान साहब कहना सीख गए हैं वैसे छोटू का नाम साहिक या मददगार क्यों नहीं हो सकता?

शायद इसीलिए वेबसाइट ने अपने हर पन्ने पर लिखा है कि 'बुक माय छोटू' एक ब्रैंड नेम है.

इसका मक़सद किसी की बेइज्जती करना नहीं और हम 18 साल से ऊपर के जो छोटू रखते हैं उन्हें इस नाम से कोई आपत्ति नहीं. अग्रेज़ी भाषा में ये वेबसाइट सत्यजीत सिंह बेदी और गोविंद कंधारी जी ने बनाई है. अगर कोई भी छोटू कहने पे बुरा नहीं मनाता तो क्या मैं इस वेबसाइट के मालिकान को छोटू बेदी और गोविंद छोटू या कप्पू कह लूं? कोई आपत्ति तो नहीं होगी?

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