पेमेंट करने के लिए अब कार्ड की ज़रूरत नहीं

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Image caption प्लास्टिक कार्ड

भारत में नोटबंदी के बाद सरकार का कहना है कि वो धीरे-धीरे कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना चाहती है. मतलब ये कि किसी भी ख़रीद-बिक्री या किसी भी सर्विस के लिए कैश पैसे के बजाए कार्ड के ज़रिए पेमेंट किया जाए.

भारत में भले ही कैश से कार्ड की ओर जाने की बहस चल रही हो लेकिन विदेश में प्लास्टिक कार्ड से भी आगे जाने की बात हो रही है.

ज़रा सोचिए आप किसी सुपरमार्केट में जाएं, रोज़मर्रा की ज़रुरत की चीज़ों को बास्केट में रखें और बिना कोई पेमेंट किए सामान लेकर बाहर निकल आएं.

ये कोई चोरी का मामला नहीं है बल्कि आने वाले दिनों में अब इसी तरह से पेमेंट की बात हो रही है.

ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है जो ख़ुद बख़ुद आपकी पहचान कर लेगी, आपके ज़रिए चुने गए सामान की स्कैनिंग कर लेगी और आपके एकाउंट से पैसे भी पेमेंट करा लेगी.

ब्रिटेन में क्रेडिट कार्ड शुरु करने वाली कंपनी बर्क्लेकार्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आमिर साजिद कहते हैं कि उनकी कंपनी ने ब्रिटेन में लगभग 50 साल पहले जो क्रेडिट कार्ड शुरु किया था नई तकनीक के आने के बाद अब उस कार्ड सिस्टम का धीरे-धीरे ख़ात्मा हो जाएगा.

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साजिद कहते हैं, ''लोग बिना किसी तकलीफ़ के, बड़ी आसानी के साथ किसी वेबसाइट या ऐप या किसी शॉपिंग स्टोर में शॉपिंग कर सकते हैं.''

साजिद कहते हैं कि इस तकनीक के आने के बाद बैंकों और टेकनोलोजी कंपनियों में इस बात की होड़ शुरू हो जाएगी कि इस डिजिटल वॉलेट को कौन कंट्रोल करेगा, और फिर लोगों की निजता और साइबर सुरक्षा को लेकर भी बहस शुरू हो जाएगी.

क्रेडिट कार्ड की शुरूआत 1966 में हुई थी लेकिन उसके पेमेंट का जो तरीक़ा है वो लगभग अब भी वही है. साजिद कहते हैं कि अब इसमें बदलाव हो रहा है.

Image caption कीरिंग में सबकुछ

बर्क्लेकार्ड के स्टाफ़ को प्रशिक्षण देते हुए वो एक प्लास्टिक रिंग, एक ब्रेस्लेट और एक कीचेन दिखाते हैं जिनमें एक चिप लगा होता है जिसके ज़रिए शॉपिंग करने वाला आसानी से क्रेडिट पेमेंट कर सकता है.

साजिद कहते हैं कि ये चिप भी दरअसल उस तकनीक तक पहुंचने का एक पुल है जिसमें पेमेंट करने के लिए लोग अपनी आंखों या फ़िंगरप्रिंट के ज़रिए पहचाने जाएंगे.

उनके स्मार्टफ़ोन के ज़रिए उनकी पहचान होगी और फिर बिना किसी लाइन में लगे हुए आप अपनी ख़रीदारी कर सकते हैं.

साजिद कहते हैं कि पेमेंट के लिए कैश, चेक और कार्ड का इस्तेमाल अभी भी होता रहेगा लेकिन अगले दस सालों में पेमेंट के इन तय तरीक़ों के इस्तेमाल का चलन बहुत तेज़ी से बढ़ेगा.

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लेकिन इस तकनीक से लोगों को एक डर भी है. लोगों को लगता है कि हैकर्स का डर तो है ही साथ ही ये डर भी रहेगा कि कंपनियां आपके बारे में सबकुछ जान लेंगी कि आप कहां हैं और किन चिज़ों में कितना ख़र्च करते हैं.

हालांकि साजिद कहते हैं कि कुछ भी लोगों की इजाज़त के बिना नहीं किया जाएगा.

वह कहते हैं कि इससे तो और भी फ़ायदा होगा कि कार्ड कंपनी को पता होगा कि आप इस समय कहां हैं और आपने ही पेमेंट के लिए इजाज़त दी है. उनके अनुसार इससे साइबर जालसाज़ी को रोकना और आसान होगा.

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Image caption यूके में 1966 में क्रेडिट कार्ड शुरु किया गया था

लेकिन एक बहस ये भी हो रही है कि क्या अपनी रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए क्रेडिट या उधार ख़रीदना सही तरीक़ा है?

कुछ लोगों का कहना है कि रोज़मर्रा की ज़रूरतों की ख़रीदारी के लिए क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल से इस बात का ख़तरा बना रहता है कि आप ज़रूरत से ज़्यादा ख़रीद सकते हैं और चीज़ें कंट्रोल से बाहर हो सकती हैं.

इसके जवाब में यूके कार्ड्स एसोसिएशन का कहना है कि क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने वालों में से 80 फ़ीसदी वो लोग हैं जो अपना पेमेंट समय पर करते हैं और कोई भी पिनाल्टी या व्याज नहीं देते हैं.

लेकिन स्टेपचेंज चैरिटी संस्था का कहना है कि वो ऐसे लोगों के बारे में बहुत चिंतित हैं जो हर महीने अपना पेमेंट नहीं कर पाते हैं और बढ़ते क़र्ज़ के बोझ तले दबते जा रहे हैं.

यूके कार्ड्स एसोसिएशन का कहना है कि इस नई तकनीक के दूरगामी परिणाम क्या होंगे इसका अभी अंदाज़ा लगाना तो मुश्किल है लेकिन पेमेंट करने के तरीकों में आ रही क्रांति से ये तो साफ़ है कि क्रेडिट कार्ड इंडस्ट्री में बहुत से ऐसे बदलाव होंगे जिनके बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है.

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