जिसे कचरा समझते हैं, उससे भर सकता है पेट!

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जस्टिन हॉर्न उन दिनों एक निजी शेफ़ के तौर पर काम करते थे.

लंदन के बेलग्रेविया में एक रूसी व्यापारी ने अपने मेहमानों के भोज पर 28 हज़ार पाउंड यानी क़रीब 24 लाख रुपये ख़र्च किए.

जस्टिन हॉर्न के लिए खाने को कचरे में बदलते देखने का वो आख़िरी मौक़ा था.

उस भव्य रात्रिभोज में कैवियार (मछली के अंडे) फा ग्रा (बत्तख़ से तैयार होने वाला पकवान) और ट्रफ़ल्स (कुकुरमुत्ते) शामिल थे. रात ढलते-ढलते खाने से भरे आठ बॉक्स फेंक दिए गए. हॉर्न को लगा कि इसके लिए कुछ करना चाहिए.

वो कहते हैं, "उम्दा डिनर में जिस क़दर बर्बादी होती है, वो चौंकाने वाली है."

अब वो अपनी सहयोगी एलिस जिल्सनैन के साथ दक्षिणी लंदन की एक फूड मार्केट में पॉप-अप रेस्त्रां 'टिनी लीफ़' चलाते हैं.

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रेस्त्रां के ज़रिए जो विचार रखा जा रहा है, उसे ज़ाहिर करने वाला बैनर काउंटर के ऊपर लगा है, जिस पर लिखा है "ज़ीरो वेस्ट" यानी बर्बादी क़तई नहीं.

उनका मैन्यू उस सामान के आधार पर तैयार होता है जिसे दुकानदार या फिर थोक विक्रेता बेच नहीं पाते और अमूमन उसकी जगह कचरे का डिब्बा ही होती.

इसमें आमतौर पर मुख्य रुप से टेढ़ी-मेढ़ी गाजरें, छिलके पर काले चित्ते वाले केले, दबे-पिचके से सेब, पुरानी ब्रेड और क्रोइसैन शामिल होता है.

एलिस कहती हैं, "ये सब खाने के क़ाबिल होता है लेकिन इतना ख़ूबसूरत नहीं दिखता जिसे उनकी (सुपरमार्केट) दराज़ों में बेचने के लिए रखा जाए."

ये हॉर्न और एलिस का दूसरा रेस्त्रां है. ये विचार काम कर सकता है, इसे साबित करने के लिए उन्होंने थोड़े वक्त की लीज़ पर पहले भी एक रेस्त्रां चलाया था. अब वो एक स्थायी ठिकाने की तलाश कर रहे हैं.

एलिस कहती हैं, "हम साबित कर चुके हैं कि इसमें व्यापार की संभावना हैं."

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वो शेफ़, किसानों और खाने की दुनिया से जुड़े उस बढ़ते समुदाय का हिस्सा हैं जो कचरे के पहाड़े के बीच से कुछ स्वादिष्ट तैयार करने की कोशिश में हैं.

हैरानी हो सकती है कि दुनिया भर में इंसानों के खाने के लिए तैयार होने वाले उत्पाद में से एक तिहाई बर्बाद हो जाता है. ये आंकड़ा क़रीब 1.3 अरब टन है.

ब्रिटिश सरकार और ईयू समर्थित एजेंसी 'रैप' के आंकड़ों के मुताबिक़ हर घर में सालाना क़रीब 470 पाउंड क़ीमत का खाने का सामान बर्बाद हो जाता है.

'टिनी लीफ़' का उद्देश्य है कि कुछ भी फेंका न जाए. मसलन गाजर की छीलन को सुखाकर कुरकुरा कर लिया जाता है और नींबू के छिलके का इस्तेमाल चीज़केक या फिर पेय बनाने में होता है.

एलिस कहती हैं कि इसके बाद जो कुछ बर्बाद होता है, उसकी ख़ास गिनती नहीं की जा सकती.

रेस्त्रां को 70 से 80 फ़ीसदी सामान दुकानों और थोक विक्रेताओं से दान में मिलता है.

आपको क्या सामान मिलेगा, इसकी जानकारी न होने की स्थिति में रेस्त्रां चलाना कितनी बड़ी चुनौती है, इस सवाल पर एलिस कहती हैं, यही तो इसका मज़ा है.

फ़िलहाल उनके रेस्त्रां में हफ्ते भर के दौरान 250 से 350 तक ग्राहक आते हैं. एलिस के मुताबिक़ ज़्यादातर लोगों की प्रतिक्रिया सकारात्मक ही मिलती है.

वो कहती हैं, "कुछ लोगों ने हमें कहा कि ये तो कचरा है लेकिन असल में ये कचरा नहीं है. कचरे को लेकर हमारी जो समझ है, उसे बदलने की ज़रुरत है."

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'रूबीज़ इन द रबल' की संस्थापक जेनी कोस्टा लोगों की ओर से मिलने वाली ख़राब प्रतिक्रिया के डर से शुरुआत में अपनी चटनी को तैयार किए जाने के तरीक़े पर चुप्पी साधे रहीं. ये चटनी कचरे के डिब्बे में फेंके जाने लायक़ फलों और सब्जियों से तैयार होती है.

वो कहती हैं, "साल 2011 में फ़ूड वेस्ट यानी कचरे में फेंके जाने लायक़ खाने के सामान को लेकर धारणा ऐसी बदली कि लोग कचरे से कुछ मतलब का सामान निकालने के बारे में सोचने लगे."

पांच साल के बाद आज 'रुबीज़ इन द रबल' एक स्टॉल से आगे निकलकर कई जगह जैम्स और चटनी सप्लाई कर रहा है. अगले साल वो कई तरह के कैचअप्स लाने जा रही हैं.

इस फर्म के ग्राहकों में 'वर्जिन ट्रेन्स' भी शामिल है. ये वर्जिन से हर हफ्ते छांट दिए गए सेब लेती है. उनसे चटनी तैयार करती हैं और बाद में सेंडविच में इस्तेमाल के लिए उसे दोबारा बेच देती हैं.

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पहले 'रुबीज़ इन द रबल' के लिए फल और सब्जियों के थोक बाज़ार से छांट दिए गए सामान की ख़रीद होती थी लेकिन व्यवसाय के विस्तार के बाद अब सीधे किसानों से कीमत में छूट के आधार पर ख़रीद की जाती है.

ब्रिटेन के ज्यादातर सुपरमार्केटों ने, फल और सब्जियां किस तरह नज़र आते हैं, इसे लेकर अपने सख़्त नियम बदले हैं लेकिन अब भी काफ़ी सामान बर्बाद होता है.

जेनी कोस्टा कहती हैं, "हम कम मात्रा में सब्जियां इस्तेमाल करते हैं लेकिन हमारे पास खाने के बर्बाद होने वाले सामान के लिए एक वास्तविक निदान है."

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'टू गुड टू गो' एप के सहसंस्थापक क्रिस विल्सन को रेस्त्रां उद्योग में बर्बाद होने वाले सामान से निपटने की चाहत ने प्रेरित किया. ये एप लोगों को रेस्त्रां से डिस्काउंट पर खाना ख़रीदने का मौक़ा देता है. ये ऐसा खाना ऐसा होता है, जो बिक्री नहीं होने पर फेंका ही जाता. ये एप सबसे पहले डेनमार्क में लॉन्च किया गया था.

जून में ब्रिटेन में लॉन्च होने के बाद से ये आठ शहरों के क़रीब 200 रेस्त्रां से सौदे हासिल कर चुका है.

ग्राहकों को खाना लेने के लिए तय वक़्त दिया जाता है. सामान्य तौर पर ये समय रेस्त्रां बंद होने के ठीक पहले या फिर लंच ख़त्म होने के बाद का होता है. 'टू गुड टू गो' हर बिक्री पर तय रकम लेता है.

एप लॉन्च होने के 20 हफ्तों के अंदर इसे 80 हज़ार बार डाउनलोड किया जा चुका है और इसके ज़रिए 10 हज़ार खाने के आर्डर बेचे गए हैं.

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