आख़िर क्यों ट्रेंड कर रहा है #MuslimsLikeUs

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ब्रिटेन में इन दिनों मुसलमानों पर आधारित एक कार्यक्रम काफ़ी सुर्ख़ियां बटोर रहा है. बीबीसी 2 पर प्रसारित ये डॉक्यूमेंट्री ब्रिटिश मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह चर्चा का विषय बनी हुई है.

इस कार्यक्रम में दस मुसलमानों को एक घर में जगह दी गई है. इनमें पुरुष और महिलाएं, दोनों शामिल हैं. ये सभी अलग-अलग बैकग्राउंड से आते हैं, ऐसे में उनका साथ आना भी दिलचस्प है.

सोशल मीडिया पर इसे लेकर चर्चा का दौर शुरू हो चुका है. @PopsyClover ने लिखा है, ''बीबीसी 2 का #muslimslikeus बेहतरीन है. दो रातें नहीं, मैं इसे दो सप्ताह देख सकता हूं. लव इट.''

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कुछ लोगों को इस कार्यक्रम के ज़रिए लोगों के अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं.

दाऊद मसूद ने ट्वीट किया, ''#muslimslikeus दिखाता है कि ज़़िंदगी के अनुभवों और इस्लाम को लेकर हमारी समझ की वजह से हम एक-दूसरे से कितने अलग हैं.''

लेकिन कुछ लोगों ने इस कार्यक्रम को लेकर नाराज़गी भी जताई है.

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हारून ने ट्विटर पर लिखा, ''बिलकुल बेकार. ये प्रोग्राम ग़लत है. ये सिर्फ़ दिखाता है कि मुस्लिम एक-दूसरे से कितना टकराव रखते हैं और इस्लाम के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बताता.''

बीबीसी ने कार्यक्रम के बारे में बताया, ''एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नज़रिया रखने वाले दस ब्रिटिश मुसलमानों को एक मकान में रखिए और फिर उसे रिकॉर्ड कीजिए. नतीजे में हमें भावनात्मक बहसें, ईमानदार असहमति, हास-परिहास और वो जानकारी मिलेगी जो बताती है कि ब्रिटेन में मुस्लिम होने का मतलब क्या है.''

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चैनल के अनुसार, ''सतही तौर पर देखें तो ब्रिटेन के 27 लाख मुस्लिम आस्था के सूत्र में बंधे नज़र आते हैं. लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे ब्रिटेन के मुस्लिम घरों में इस बात पर बहस जारी है कि इस्लाम की नुमांइदगी असल में कौन सही तरह से करता है. 'शिया', 'सुन्नी', 'उदारवादी' और 'कट्टर सोच वाले' जैसे तमग़े न्याय नहीं कर पाते. क्या असली ब्रिटिश मुस्लिम सामने आएंगे?''

इसमें कहा गया, ''सवाल कई सारे हैं. कुछ का कहना है कि ब्रिटेन में मज़हब का परंपरावादी स्वरूप चाहिए. दूसरों का कहना है कि मुसलमानों को समाज में घुलने-मिलने के लिए समझौते करने होंगे.

चैनल के मुताबिक- ''इस ख़ास और साहसी सामाजिक प्रयोग के तहत बीबीसी की दो हिस्सों वाली सीरीज़ 'मुस्लिम्स लाइक अस' में ये पूरी असमंजस और असलियत हमारे सामने आ जाती है.''

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