ब्लॉग- 'लाहौर-कराची में इतनी फ़िल्में नहीं बनतीं कि साल भर पेट भर सके'

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आज शाम मैं नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी की फ़िल्म 'फ़्रीकी अली' देखने कराची के किसी सिनेमा हॉल में जाऊंगा.

लेकिन दिल में डर सा लगा रहता है कि नहीं सिनेमा हॉल तक पहुंचते पहुंचते पॉलिसी बदल न जाए और टिकट वाला बाबू ये न कह दे- 'हां, आज शो तो होना था लेकिन ऊपर से ऑर्डर आ गए कि शो बंद कर दो.'

उड़ी हमले के बाद इंडियन मोशन पिक्चर्स एसोसिएश की तरफ़ से पाकिस्तानी आर्टिस्टों को बॉलिवुड की फ़िल्मों में न लेने का जो फ़ैसला किया गया, उसके जवाब में पाकिस्तानी सिनेमाघर के मालिकों ने भी 30 सितंबर से भारतीय फ़िल्मों का बॉयकॉट कर दिया.

उसके बाद से पाकितान में सिनेमाघर वीरान होने लगे.

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पाकिस्तानी सिनेमा उद्योग बॉलीवुड के बगैर अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगता है. वुसत की बेबाक बात.

ये भी कहा गया ,''अगर भारतीयों को हमारे फ़नकार नहीं चाहिए, तो बॉलिवुड के बग़ैर मर नहीं जाएंगे. ईरान और तुर्की से फ़िल्में इम्पोर्ट करेंगे वैसे भी पाकिस्तानी टर्किश ड्रामों के दीवाने हैं. ''

मगर अंदर से सबको पता था कि ये सब होने वाला नहीं.

और अगर जल्द भारतीय फ़िल्मों के बारे में कोई फ़सैला नहीं किया गया, तो इतनी मुश्किल से उभरने वाला पाकिस्तानी सिनेमा फिर बैठना शुरू हो जाएगा.

लाहौर और कराची में इतनी फ़ीचर फ़िल्में बहरहाल नहीं बनतीं कि साल भर पेट भर सके, 70 प्रतिशत रेवेन्यू भारतीय फ़िल्मों से ही आता है.

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Image caption शाहरुख और पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा की 'रईस' अब पाकिस्तान में रिलीज हो पाएगी.

शाहरुख और पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा की 'रईस' अब पाकिस्तान में रिलीज हो पाएगी.

मगर पाकिस्तानी ये भी जानते हैं कि बॉलिवुड में अगर डंडा दिखाए बग़ैर रेफ़रेन्डम करवा लिया जाए तो करण जौहर, महेश भट्ट, राहुल अग्रवाल, ओम पुरी, आमिर खान और शाहरुख़ खान समेत 70 प्रतिशत प्रोड्यूसर, डारेक्टर और एक्टर इसके हक़ में वोट देंगे कि फ़िल्मों की तिजारत और अंधी देशभक्ति के सवाल को एक दूसरे से अलग-अलग रखना ही अक्लमंदी है.

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Image caption पाकिस्तान सितारे फवाद खान बॉलीवु़ड में सोनम कपूर के साथ खूबसूरत में लीड रोल में थे.

मैंने तो आज तक नहीं देखा कि बॉलविड फ़िल्मों का कोई पाकिस्तानी रसिया रेखा और अनुष्का का दीवाना होने की वजह से भारत के भी गुण गाता फिरे.

या फ़वाद खान या माहिरा खान का कोई फ़ैन पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाता फिरे.

ये राज़ डंडे के ज़ोर पर बात मनवाने वाले भी जानते हैं कि किसी भी चीज़ पर रोक लगाने से रोक नहीं लग सकती है.

हमारे यहां एक कहावत है कि बाल काटने से मुर्दे का वज़न हल्का नहीं होता.

मुझे बिल्कुल भी अजरज न होगा अगर कोई ये कहे कि हाफ़िज़ सईद अजय देवगन के फ़ैन हैं और राज ठाकरे यूट्यूब पर पाकिस्तानी ड्रामे देखते हैं.

मगर इससे क्या फ़र्क पड़ता है?

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ज़िया-उल-हक़ शत्रुघ्न सिन्हा के भी दोस्त थे और एटम बम भी बना रहे थे.

दो दिन के पहले पाकिस्तान के एक फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर आदिल मांडवीवाला ने बहुत पते की बात कही कि हम भारतीय फ़िल्मों पर से रोक हटाकर ताली एक हाथ से बजाने की कोशिश कर तो रहे हैं, मगर दूसरे हाथ के बग़ैर बहुत देर तक नहीं बजा पाएंगे.

मगर कभी न कभी किसी न किसी को तो पहला कदम उठाना ही पड़ता है.

बस दुआ करें कि आज शाम सिनेमा के चौकीदार से ये न सुनना पड़े ,''साहब जी किधर, हमारे पास तो ऐसी कोई ख़बर नहीं है.''

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