भुट्टो के नाम का केक खाइए और गुम हो जाइए

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सोशल मीडिया पर हर साढ़े चौथा मीडियाकर लिख रहा है कि भुट्टो साहब ज़िंदा होते तो 88 साल के होते.

एक दिलजले ने क्या ख़ूब लिखा है, "हां जीवित होते तो 88 साल के होते लेकिन यह भी तो सोचो कि मौत ने भुट्टो को उम्र ख़िज़्र (यानी अमर) अता कर दी."

लोग पूछते हैं आज भुट्टो के चाहने वाले कितने लोग हैं? शायद उतने ही जितने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फार ख़ान के चाहने वाले.

या फिर उतने जितने चीन में माओ त्से तुंग के प्रशंसक सांसें गिन रहे हैं, या उतने ही जो मास्को के लाल चौक में सोवियत युग के तमगे सजा कर अपने पड़पूतों के सहारे लड़खड़ाते हुए प्रत्येक सात नवंबर को लेनिन को श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचते हैं.

भुट्टो को लगता था उन्हें फांसी नहीं हो सकती

'पास वालों को घास नहीं डालते, दूर वालों को...'

भुट्टो ऐसी शख़्सियत थे, जो उनके चाहने वाले वो उन्हें बेपनाह चाहते थे और जो उनसे नफ़रत करते थे वो उनसे बेहद नफ़रत. अब ऐसे लोग कहां?

ऐसे लोग और उनके चाहने वाले सन 50 और 60 के दशक में पैदा हुए थे जब दुनिया उम्मीदों से भरी थी.

जब उस दौर के बुत त्रस्त युवा दुनिया बदल देने के नशे में डूबे हुए थे, जब नौजवान अपने सपनों का अर्थ तलाशने की कोशिश करते थे.

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वह दुनिया चे ग्वेरा, कास्त्रो, जमाल नासिर, सुकार्नो, हो ची मिन्ह, अराफ़ात, मंडेला, नेहरू, सात्र, रसेल, बीटल्स और प्रेस्ली जैसों की दुनिया थी और उसी में एक भुट्टो भी थे.

एक खुली दुनिया के कद्दावर लोग. जैसे जैसे दुनिया तंग होती चली गई, अपने अपने क्षेत्रों के लहीम शहीम भी घटते चले गए और बौने उभरते चले गए.

दिल ने पहले दिमाग को और फिर कैलकुलेटर ने दिमाग को रिप्लेस कर दिया. आज जो कुछ भी भुगता जा रहा है, उसी रिप्लेसमेंट की देन है.

मैं जितने भी नाम गिनवाए वे सब अपने दौर में नई विचारों की उपज थे और उन विचारों को अपने आकर्षक व्यक्तित्व में लपेट लोगों तक पहुंचते थे.

लोग उन्हें छू सकते थे और वह लोगों को गले लगा सकते थे. मीडिया उनके पीछे था और वो मीडिया के पीछे नहीं थे.

भुट्टो और उनके अधिकांश समकालीन वे मछलियां थे जो जनता के समुद्र में ही जीवित रह सकते थे.

जरा सोचिए अगर भुट्टो की ज़िंदगी से नश्तर पार्क, ग़द्दाफ़ी स्टेडियम, इब्न कासिम बगीचे मुल्तान, नासिर गार्डन लाहौर और लियाकत बाग रावलपिंडी जैसे स्थानों को हटा दिया जाए तो बाक़ी कहने को क्या बचेगा?

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आज की राजनीतिक पीढ़ी के जीवन से अगर 21 इंच के टीवी स्क्रीन को शून्य कर दिया जाए तो बाक़ी क्या बचेगा? तो यह अंतर था भुट्टो जैसों की राजनीतिक पीढ़ी और आज की हाइब्रिड और आभासी राजनीतिक पीढ़ी में.

आज तो ढंग का राजनीतिक कार्यकर्ता देखने को नहीं मिलता और हम भुट्टो की आत्मा तलाश करते फिर रहे हैं.

मुझसे पूछो तो कहूँ कि भुट्टो भाग्यशाली थे कि भरा मेला छोड़ गए. मगर उन्हीं भुट्टो के कारण करोड़ों लोग तकलीफ में हैं क्योंकि भुट्टो आम आदमी को आत्मज्ञान के पथ पर लगाकर खुद तो चले गए लेकिन अपने पीछे ऐसा लोग छोड़ गए जिन्होंने भुट्टो की आंख के तारे 'आम आदमी' को ठेले पर बिठाकर बाज़ार में घुमा दिया.

जिन गलियों में कभी 'भुट्टो दे नारे वज्जण होगा' सुनाई देता था आज उन्हीं गलियों के नुक्कड़ पर पीपुल्स पार्टी नामक एक पार्टी का कोई भी पोस्टर देख लें तो सबसे बड़ी तस्वीर उनकी होगी जिन्होंने ये पोस्टर छपवाया होगा, उसके दाहिने तरफ़ आसिफ़ ज़रदारी, बायीं ओर बिलावल भुट्टो और बीच में फ़रियाल तालपोर और कहीं बहुत पीछे भुट्टो और बेनजीर की परछाई टिमटिमा रही होंगी.

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ऐसे पोस्टर देखकर मुझे अपना कवि दोस्त अली बख्श रंजिश बहुत याद आते हैं. उन्होंने अपनी वेबसाइट पर एक तस्वीर छापी है, जिसका कैप्शन था, "ओस्लो के मित्रों ने प्रमुख पाकिस्तानी कवियों अली बख्श रंजिश के साथ एक शाम मनाया. दाएँ से बाएँ तीसरे नंबर पर अहमद फ़राज़ भी नुमाया हैं."

मैं किन लोगों में रहना चाहता था,

और किन लोगों में रहना पड़ गया है.

हां, आज भुट्टो का एक ही इस्तेमाल हो रहा है. पांच जनवरी को उनके नाम का केक खाया जाता है और चार अप्रैल को उसके नाम की बिरयानी.

सो केक खाइए और 'जिए भुट्टो' का नारा लगाते हुए अगले दिन में गुम हो जाइए, क्योंकि वह पार्टी नहीं रही जिसपे भरोसा था.

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