बेटी बचाना है तो दक्षिण कोरिया से सीखिए

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भारत में जन्म लेने वाली प्रत्येक 100 बेटियों पर 111 बेटे हैं. चीन में यह अनुपात 100 पर 115 का है. कुछ ऐसी ही तस्वीर 1990 में एक और देश की थी लेकिन आज की तारीख़ में इस देश की आबादी संतुलित हो गई है.

आख़िर दक्षिण कोरिया ने इसे कैसे अंजाम दिया? यवेट्टे तान की रिपोर्ट-

''एक बेटी 10 बेटों के बराबर है.'' दक्षिण कोरियाई सरकार ने इस संदेश को बहुत सख्ती से लोगों के बीच फैलाया.

यह संदेश दो दशक पहले दिया गया था, जब दक्षिण कोरिया में लैंगिक असंतुलन डराने वाला था. तब 116.5 लड़कों पर मात्र 100 लड़कियां थीं.

कोरियाई परंपरा में बेटों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति सदियों पुरानी है. यहां बेटियां परिवार के लिए अहम हैं. बेटों को बुढ़ापे में अपने माता-पिता की देखभाल करने हैं और वित्तीय मदद करने वाला समझा जाता था.

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Image caption दक्षिण कोरिया में तब बेटियां उपेक्षित थीं

कोरियाई वुमन असोसिएशन यूनाइटेड की निदेशक पार्क-चा ओक्कयुंग ने कहा, ''पहले यह माना जाता था कि शादी के बाद बेटियां पराई हो जाती हैं.'' सरकार ने इसी पर अपना ध्यान फोकस किया. सरकार ने इसके लिए जल्द समाधान खोजने की कोशिश की.

कन्या भ्रूण हत्या के मामलों को रोकने के लिए दक्षिण कोरिया ने 1988 में क़ानून बनाया था. इस क़ानून के तहत डॉक्टर नहीं बता सकते थे कि गर्भ में लड़का है या लड़की. इसे अवैध कर दिया गया था.

इसके साथ ही महिलाओं को शिक्षित करने की मुहिम चलाई गई. दक्षिण कोरिया के कामकाज़ी वर्ग में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने लगी. इस वजह से वह मिथक टूटने लगा कि पुरुष ही नौकरी कर सकते हैं और वही घर का सहारा बनते हैं.

लड़कियों के होने पर गर्भपात मामले में असर तो पड़ा लेकिन केवल यही कारण नहीं था. विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक़ कोरिया की आबादी से लैंगिक असंतुलन ख़त्म होने की कई वजहें हैं.

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Image caption दक्षिण कोरिया में अब भी महिलाओं से भेदभाव थमा नहीं है

एशिया में दक्षिण कोरिया पहला देश बना जिसने लिंग अनुपात के ट्रेंड को बदल कर रख दिया. 2013 में यह अनुपात 105.3 पर पहुंच गया. यही तस्वीर कनाडा समेत कई पश्चिमी देशों की है.

तेजी से शहरीकरण

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेरीलैंड में सामाजिक विज्ञान की रिसर्च प्रोफ़ेसर मोनिका दास गुप्ता ने एशिया भर में लैंगिक विषमता पर स्टडी की है. मोनिका दासगुप्ता का कहना है कि इसके कई कारण हैं.

इसे कम करने में क़ानूनी प्रतिबंध का योगदान बहुत कम है. उन्होंने कहा कि गर्भपात को रोकने वाला क़ानून बनने के सात साल बाद भी यह थमा नहीं था. मोनिका दास गुप्ता का कहना है गर्भ में बेटियों को मारने का ट्रेंड दक्षिण कोरिया में तेज़ी से शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण थमा है.

मोनिका ने कहा, ''दक्षिण कोरिया में मुख्य रूप से ग्रामीण समाज का दबदबा था. यहां पुरुषों की प्रधानता थी और लड़के ही अपने बाप-दादा के वारिस बनते थे. लेकिन कुछ दशकों में देश की बड़ी आबादी अपार्टमेंट ब्लॉक में रहने लगी. यह आबादी उनके साथ शिफ्ट हुई जो एक दूसरे से अनजान थे. ये फैक्ट्रियों में काम कर रहे थे. ऐसे में यह एक औपचारिक समाज बना जहां एक दूसरे के बीच टोकाटाकी नहीं थी.''

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हालांकि चीन और इंडिया में अब भी लैंगिक असंतुलन है, जबकि भारत में गर्भपात और भ्रूण हत्या रोकने के लिए क़ानून है और चीन ने भी इस पर नियंत्रण करने के लिए क़ानून बनाए हैं. आख़िर इन देशों में क्यों नहीं सुधरा लैंगिक अनुपात?

दासगुप्ता का मानना है कि चीन में पिछले साल तक घरों के रजिस्ट्रेशन का नियम था. इसे हुकोऊ सिस्टम कहा जाता है. इसमें सुनिश्चित किया जाता है आप किस गांव से हैं. जिस शहर में आप काम करते हैं उसकी परवाह नहीं की जाती है. ज़ाहिर है यह पुरुष वंशावली और ज़मीन के स्वामित्व को तवज्ज़ो देने वाली व्यवस्था है लेकिन अब यहां भी बदलाव शुरू हो गया है.

मोनिका ने यह भी कहा कि बदलाव हमेशा सीधा नहीं होता है. जिन्हें अर्थव्यवस्था का फ़ायदा मिला उन्हें गर्भ में बच्चा है या बच्ची इसे जानने की सुविधा तक पहुंच भी बढ़ी. जो बेटे चाहते हैं या जो कम बच्चे चाहते हैं वे आज भी गर्भ में क्या पल रहा है उसकी जानकारी हासिल कर रहे हैं.

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साल 1961 में भारत में सात साल के कम उम्र वाले वर्ग में 976 लड़कियों पर 1,000 लड़के थे. 2011 में जारी जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ अब यह आंकड़ा 914 पर पहुंच गया है. कैंपेनरों का कहना है कि यह गिरावट इसलिए है क्योंकि प्रसव पूर्व लिंग जांच करने की व्यवस्था बढ़ी है.

ऐसा तब है जब 1994 में ही इसे ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया था. इनका कहना है कि केवल पिछले एक दशक में भारत में 80 लाख महिला भ्रूणों की हत्या की गई. लेकिन मोनिका कहती हैं कि भारत में कई कारणों से महिलाओं के प्रति लोगों के नज़रिए में बदलाव आ रहा है.

''मीडिया में महिलाओं की भागीदारी, घरों से बाहर औरतों का काम करना, पैतृक संपत्तियों में महिलाओं को बराबरी का हक़ और चुनावों में एक तिहाई आरक्षण के कारण स्थिति बदल रही है.''

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ओक्कयुंग का कहना है कि दक्षिण कोरिया की आबादी में लैंगिक संतुलन फिर स्थापित होने का मतलब यह कतई नहीं है कि लैंगिक विषमता ख़त्म हो गई.

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Image caption भारत की महिला वैज्ञानिक

उन्होंने कहा, ''कोरिया में लिंग अनुपात सामान्य है फिर भी महिलाओं के साथ भेदभाव ख़त्म नहीं हुआ है. हमें संख्या में बराबरी से आगे देखने की ज़रूरत है. सभी विकसित देशों में महिलाओं को दी जाने वाली तनख़्वाह पुरुषों के मुक़ाबले दक्षिण कोरिया में सबसे कम है. 2013 में दक्षिण कोरिया में यह गैप 36 प्रतिशत का था. इसकी तुलना में न्यूज़ीलैंड में यह गैप महज 5 प्रतिशत है.''

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