'सात समंदर पार भी हिंदुओं की जाति कर रही पीछा

इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत की जाति व्यवस्था सामाजिक विभाजन के मामले में दुनिया की सबसे पुरानी जीवित व्यवस्था है और कुछ ब्रिटिश एशियाई लोगों का कहना है कि वो इसके कारण आज भी भेदभाव का सामना कर रहे हैं.

सुदेश रानी दो साल पहले ख़रीदारी कर रही थीं जब उनका इस भेदभाव से सीधा सामना हुआ.

ब्रेडफोर्ड में रहने वाली 42 साल की सुदेश रानी खुद को रविदासिया बताती हैं. जाति व्यवस्था में इसे नीचे के स्तर का माना जाता है.

ब्रिटेन में हिंदुओं की बड़ी क़ानूनी जीत

'...तो मैं मुसलमान न बनती'

उनका कहना है कि वो एक सुपरमार्केट में थीं जब दो महिलाओँ ने उन्हें अपशब्द कहना शुरू कर दिया.

सुदेश बताती हैं, "वो मेरे लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने लगीं. उस वक्त मैं थोड़ा डर गई."

सुदेश का कहना है कि उनमें से एक महिला ने उनको पहले एक शादी में देखा था. उस महिला ने सुदेश और उनके नौ साल के बेटे का कार तक पीछा भी किया.

सुदेश कहती है, "मेरा बेटा बार-बार पूछता रहा कि मम्मी वो हमें ऐसा क्यों बोल रही थी?"

रानी कहती हैं कि पुलिस को भी नहीं पता कि ऐसे मामलों में क्या करना है क्योंकि उन्हें जाति के बारे में कुछ नहीं पता.

सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं इस तरह के मामले बताते हैं कि ब्रिटेन में जाति क़ानून की कितनी जरूरत है.

Image caption सुदेश रानी

हालांकि बहुत से हिंदू संगठन इस क़ानून के खिलाफ़ हैं.

जाति व्यवस्था को भारत की सामाजिक व्यवस्था का प्राचीन समय से ही हिस्सा माना जाता है. हालांकि समाज विज्ञानियों में इस बात को लेकर विवाद है कि मौजूदा व्यवस्था कब शुरू हुई.

कुछ जानकारों का मानना है कि आज जो जाति व्यवस्था दिखाई देती है वो अंग्रेजों के औपनिवेशिक काल में लागू हुई. ऐसी राय रखने वाले समाज विज्ञानियों की दलील है कि भारतीय समाज को बेहतर ढंग से समझने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने ये व्यवस्था लागू की.

ब्रिटिश मुसलमानों को लेकर चिंता

उनके मुताबिक़ भारतीय लोगों ने जाति व्यवस्था के हिसाब से व्यवहार करना इसलिए शुरू किया क्योंकि उन्हें ऐसा सिखाया गया.

जाति पर क़ानून बनाना एक जटिल काम है. कई हिंदू नहीं मानते कि जाति हिंदू धर्म का हिस्सा है. इसका नतीजा ये हुआ है कि बहुत से लोग चाहते हैं कि ये मामला दबा ही रहे.

ब्रिटेन के नेशनल काउंसिल ऑफ हिंदू टेंपल्स के चेयरमैन सतीश शर्मा इस क़ानून का सख़्त विरोध करते हैं. सतीश मानते हैं कि जाति आधारित भेदभाव कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है.

इसके साथ ही वो ये भी मानते हैं कि जाति व्यवस्था का उनके धर्म से कोई लेना-देना नहीं और अगर इसे लेकर नया क़ानून बना तो यह मुद्दा एक हिंदू समस्या के रूप में सामने आएगा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कई हिंदुओँ के साथ उनका भी यही मानना है कि आज की जो जाति व्यवस्था है वो ब्रिटिश उपनिवेश राज की देन है ना कि प्राचीन धर्म की.

सतीश कहते हैं, "यह हमारी विचारधारा या आस्था से जुड़ा मसला नहीं है. हमारे ग्रंथ और कुछ सौ साल पुराने हमारे इतिहास में जाति व्यवस्था नहीं है. यह हमारे कंधों पर डाल दिया गया है."

सतीश शर्मा का कहना है कि जाति क़ानून के लिए दबाव बनाने वाले लोग हिंदुओं के प्रति डर पैदा करने का एजेंडा चला रहे हैं.

उधर, जाति आधारित भेदभाव का शिकार हुए लोगों का कहना है कि जाति व्यवस्था कब शुरू हुई ये जानने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है वो तो बस लोगों की रक्षा के लिए नया क़ानून चाहते हैं.

ब्रिटेन की एक और नदी में हो सकेगा अस्थि विसर्जन

जाति व्यवस्था के खिलाफ़ मुहिम चला रहे सामाजिक संगठन कास्टवॉच यूके से जुड़े सतपाल मुमान कहते हैं, "हिंदुओं को वास्तव में इस मामले पर अपनी आत्मा में झांकने की ज़रूरत है. साथ ही खुद के प्रति ईमानदार होने और इसका सामना करने की ज़रूरत है."

उनका कहना है कि जो हिंदू मानते हैं कि जाति व्यवस्था उनके धर्म में नहीं है उन्हें अपने इतिहास में झांकना चाहिए.

सतपाल कहते हैं, "मुझे समझ में नहीं आता कि हिंदू बराबरी की इस मुहिम का विरोध क्यों कर रहे है. मैं तो यही अंदाज़ा लगा सकता हूं कि वो बराबरी में यकीन नहीं रखते. हिंदू खुद को पीड़ित क्यों महसूस करते हैं ये मेरी कल्पना से परे है. अगर आप ऐतिहासिक सच्चाई का सामना नहीं कर सकते तो आप कभी इस समस्या का हल नहीं निकाल सकेंगे."

जाति क़ानून के लिए अभियान चला रहे लोगों का अनुमान है कि ब्रिटेन में क़रीब पांच लाख दलित रहते है जो जाति से जुड़े पूर्वाग्रह का शिकार हो सकते हैं.

इमेज कॉपीरइट NATIONAl COUNCIL OF HINDU TEMPLES
Image caption नेशनल काउंसिल ऑफ हिंदू टेंपल्स के चेयरपर्सन सतीश शर्मा

हालांकि यहां की जनगणना में जाति को शामिल नहीं किया जाता इसलिए इनकी संख्या के बारे में पुख़्ता आंकड़े नहीं हैं.

इसके अलावा इस क़ानून की राह में एक अड़चन ये भी है कि बहुत से ब्रिटिश भारतीय ये नहीं जानते कि चार वर्णों वाली जाति व्यवस्था में वो कहां फिट होते हैं.

42 साल की दीना भुडिया का अनुभव भी इस मामले में अनोखा है. उन्होंने स्कूल में धार्मिक शिक्षा की क्लास में तो जाति व्यवस्था की पढ़ाई की, लेकिन धर्म के मामले में निजी तौर पर उन्हें ये कहीं भी नज़र नहीं आया.

वो कहती हैं, "मैंने कभी भी किसी मंदिर या पुजारी से जाति व्यवस्था के बारे में नहीं सुना."

हालांकि सुदेश रानी ने जो कुछ अपनी जाति की वजह से झेला वो अब भी उससे उबर नहीं पाई हैं.

रानी बताती हैं, "मैं सदमें में थी और बहुत विचलित, मेरा बेटा कई दिनों तक नहीं सो सका, ना हीं मैं. मैं यहां पली-बढ़ी हूं, अच्छी पढ़ी-लिखी हूं, मैं क्यों भेदभाव झेलूं? हम दूसरे लोगों जैसे ही हैं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे